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बीते साल के सवालों का जवाब तलाशेगा यह साल
अदालती आईना
एम जे एंटनी /  January 09, 2011

अगर पिछले साल उच्चतम न्यायालय ने भ्रष्टïाचार, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़ी याचिकाओं पर कुछ सवालिया निशान लगाए थे तो इस साल देश की सर्वोच्च अदालत अपनी इन चिंताओं से जुड़े जवाब ढूंढऩे की कोशिश करेगी।

जो लोग अदालती मामलों पर नजर रखते हैं, उनके लिए आने वाले कुछ महीने खासे दिलचस्प रहने वाले हैं। अगले महीने से ही इस सिलसिले की शुरुआत होने वाली है जब 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की जांच कर रहा केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) इस मामले में अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को सौंपेगा। राडिया फोन टैपिंग कांड की अनुगूंज अभी तक सुनाई पड़ रही है।

इसके अलावा मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के पद पर पी जे थॉमस की विवादास्पद नियुक्ति का महत्त्वपूर्ण मामला भी अदालत के सम्मुख होगा। मामलों की इस फेहरिस्त में सामाजिक मुद्दों की भी कोई कमी नहीं है। मसलन राष्टï्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और अतिरिक्त खाद्य पदार्थों को सस्ती दरों पर बेचने से जुड़े मसले की सुनवाई भी अदालत के एजेंडा में होगी।

न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़े सूचना के अधिकार के एक मामले में तो उच्चतम न्यायालय खुद याची है। निजता के उल्लंघन से जुड़ी रतन टाटा की याचिका पर भी अदालत सुनवाई करेगी। अयोध्या मामले से जुड़े इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ पीठ के फैसले को भी सर्वोच्च अदालत अपनी कसौटी पर कसेगी जिस पर आरोप लगाया गया कि फैसला इतिहास और धर्म से प्रेरित है। बहरहाल मुकदमेबाजी के इस माहौल में कारोबारी दुनिया के लिए क्या खास है?

खासतौर से सरहदों के पार लगातार हो रहे विलय और अधिग्रहण के दौर में। इन्हीं मामलों में से एक अहम मामला है वोडाफोन बनाम आयकर विभाग का। करीब 2.5 अरब डॉलर के इस मुकदमे की सुनवाई अगले महीने शुरू होगी। हालांकि इस मामले में कई पेंच फंसे हैं। लेकिन वोडाफोन पूरी तरह से भारतीय कानून के तहत पूंजीगत लाभ कर देने से मना कर रही है। कंपनी का तर्क है कि इस मामले में लेन-देन भारत से बाहर और दो गैर-भारतीय कंपनियों के बीच हुआ है और इस लिहाज से यह मामला भारतीय कर प्राधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। वहीं इस मामले में आयकर विभाग के अपने तर्क हैं। विभाग का दावा है कि भले ही लेन-देन दो विदेशी कंपनियों के बीच हुआ हो लेकिन यह किसी भारतीय कंपनी में बहुलांश हिस्सेदारी के लिए किया गया लेन-देन था। इस लिहाज से इस पर कर बनता है।

बंबई उच्च न्यायालय भी आयकर विभाग के इस पक्ष पर अपनी मुहर लगा चुका है। इसके बाद ही कंपनी ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। एक अन्य मामला जिस पर अंतरराष्टï्रीय निगाहें होंगी, वह है 1984 में भोपाल में हुई गैस त्रासदी के मामले में सरकार द्वारा दायर संशोधित याचिका की सुनवाई। केंद्र सरकार पहले ही 47 करोड़ डॉलर के मुआवजे को लेकर सहमति जता चुकी है और और उच्चतम न्यायालय ने भी इस समझौते को 1989 में मंजूरी दे दी थी।

इस मामले में आरोपी कंपनियां अपना चोला बदल चुुकी हैं। इस गैस कांड में हजारों लोगों की जान लेने की जिम्मेदार कंपनी यूनियन कार्बाइड ने 1990 के दशक में अपनी भारतीय सहयोगी कंपनी की हिस्सेदारी बेच दी थी। वर्ष 2001 में डाऊ केमिकल ने इसका अधिग्रहण कर लिया।

हालांकि अब सरकार का कहना है कि जो शुरुआती निपटान हुआ था वह बिलकुल भी न्यायसंगत नहीं था। अब सरकार अतिरिक्त 1.1 अरब डॉलर के मुआवजे की बात इस बुनियाद पर कर रही है कि इस मामले में शुरुआती आकलन वास्तविकता से काफी उलट था। इस मामले में सरकार और अदालत ने बदला हुआ रुख अपनाया उसे इन दोनों पक्षों को ही अपने इस रुख को जायज ठहराना होगा।

कंपनी के बेमन रवैये से इससे भी मुश्किल इस योजना के कार्यान्वयन की होगी। विदेशी कंपनियां इस पर काफी चौकस निगाह रखेंगी। यह हादसा 26 साल पहले हुआ था और उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश का कहना है कि नए सिरे से सुनवाई में भी इतना ही वक्त लग सकता है।

खनन कंपनियां और देश के कई इलाकों में पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील परियोजनाओं में लगी कंपनियों की भी 'जंगल से जुड़े मामलों पर बेहद करीबी नजर रहेगी। पर्यावरण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई को लेकर देश के मुख्य न्यायाधीश भी अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। लाफार्ज मामला इस मामले में लिटमस टेस्ट सरीखा होगा। बहरहाल इस मामले में हो रहा लंबा इंतजार जल्द ही खत्म होगा। पर्यावरण से जुड़े फैसलों में अदालती आदेश नीति-निर्माताओं और उद्यमियों के लिए नजीर का काम करेगा। जिनके आधार पर वे जंगल, तटीय और दूसरे संवदेनशील इलाकों में अपनी योजनाएं तैयार करेंगे।

उच्चतम न्यायालय ने करीब 50 मामले बड़े पीठों को सुपुर्द कर दिए हैं क्योंकि छोटे पीठ इन मामलों में कानून की परिधि में किसी बिंदु पर सहमत नहीं हो पाए थे। कुछ साल पहले औद्योगिक निपटान अधिनियम के तहत उद्योग की परिभाषा को स्पष्टï करने के लिए एक पीठ ने बड़े पीठ की मांग की थी। लेकिन अहम सवाल यही है कि कई क्षेत्र अभी भी दुविधा की स्थिति में जी रहे हैं।

इसके अलावा कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम मे दुकान के अर्थ को लेकर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। बहरहाल सबसे पुराना सवाल एक संवैधानिक पीठ को सौंपा हुआ है। यह मामला संपत्ति के अधिकार से जुड़ा है जिसमें 25वें संविधान संशोधन के बाद बदलाव किया गया है। कई पीठ अलग-अगल मसलों पर एकमत नहीं रहे और मामले को 9 न्यायाधाीशों के पीठ के हवाले करना पड़ा।

यह करीब 14 साल पुराना वाकया है। इसका भी कुछ हल नहीं निकला और यह अभी भी अधर में लटका है।

जिन मामलों पर खास नजर रहेगी उनमें जमीन अधिग्रहण को चुनौती देने वाली और विशेष आर्थिक क्षेत्र के खिलाफ दायर की गई याचिकाएं भी होंगी। न्यायपालिका के लिए तो यह एक बड़ा कदम होगा। लेकिन इन फैसलों से प्रभावित होने वाले अनगिनत लोगों के लिए ये ज्यादा मायने रखेंगे।

Keyword: SC, curruption, CBI, CVC,
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