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नई क्षमता की दरकार
संपादकीय /  October 07, 2010

भारत का यात्री कार बाजार स्टेरॉयड पर सवार नजर आ रहा है। मौजूदा वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में यात्री कारों (कार व बहुद्देश्यीय वाहन समेत) की बिक्री में 26 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। अप्रैल-सितंबर 2010 की छमाही में 14 लाख कारें बिक चुकी हैं, ऐसे में देश का ऑटोमोबाइल उद्योग मार्च 2011 के आखिर तक 30 लाख की बिक्री के जादुई आंकड़े तक पहुंच सकता है। साल की दूसरी छमाही में पहली छमाही के मुकाबले सामान्यत: 10-15 फीसदी ज्यादा बिक्री होती है। अगर घरेलू बाजार में मांग में बढ़त जारी रहती है तो ऑटोमोबाइल विनिर्माता भारतीय यात्री कार केज्यादातर अनुमानों को पार कर सकते हैं। इन अनुमानों के अनुसार 2015 तक देश में 50 लाख कारों से ज्यादा की बिक्री होगी।

पहले छह महीने के बढ़त वाले आंकड़ों पर ध्यान दीजिए। 26 फीसदी बढ़त साल 2009-10 में दर्ज निर्यात के मजबूत आधार के ऊपर हासिल की गई है, जब पूरे साल के लिए बिक्री में 27 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। विशेषज्ञों ने तर्क दिया था कि इसे बढ़त की उचित दर नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि यह कामयाबी साल 2008-09 में 6.7 फीसदी की अपेक्षाकृत कम विकास दर के ऊपर हासिल की गई थी, जब भारतीय बाजार पर वैश्विक मंदी का असर था। इसलिए चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही की बिक्री भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़त में आए सुधार को प्रतिबिंबित करता है, जहां बढ़त के अनुमानों को समय-समय पर संशोधित कर बढ़ाया जाता है, शेयर बाजारों में नए तरह का आशावाद टपक रहा है और उपभोक्ता की मनोदशा में सुधार आया है।
इस पुनरुत्थान को इस वास्तविकता के साथ रखकर देखने की दरकार है कि 2010-11 की पहली छमाही में बिक्री में 26 फीसदी की बढ़त निर्यात में 4 फीसदी से कम बढ़त के बावजूद हासिल हुई है। आने वाले सालों में बिक्री में बढ़त का परिदृश्य गुलाबी नजर आ सकता है, अगर यूरोपीय बाजारों (जहां अधिकांश निर्यात होता है) में सुधार होता है या भारतीय ऑटो निर्माता अगले कुछ वर्षों में पश्चिम के विकसित देशों में गोचर मंदी के प्रभाव को दूर कर अपने वाहनों के लिए निर्यात के नए बाजार बनाते हैं। ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए रुख में परिवर्तन का वक्त आ गया है। विकसित बाजारों पर ध्यान केंद्रित करने केबजाय इसे विकासशील एशियाई बाजारों में अपनी मौजूदगी में सुधार करना चाहिए। अच्छी खबर यह है कि भारत से ऑटो निर्यात का आंकड़ा अभी भी देश में होने वाली कुल बिक्री के पांचवें हिस्से से थोड़ा कम है, जो इनके लिए ऐसी गुंजाइश छोड़ते हैं कि जब भी निर्यात बाजार सूख जाए या रुपये की मजबूती निर्यात को कम उत्साहवर्धक बनाए तो उद्योग को परेशानी न हो। यहां तक कि भारतीय ऑटोमोबाइल के निर्यात में उच्च आयात की तीव्रता विनिमय दर में उतारचढ़ाव के विपरीत प्रभाव को कुछ हद तक कम कर देती है। यह समय घरेलू क्षमताओं के निर्माण का भी है, न सिर्फ वाहनों या इसके कलपुर्जों के उत्पादन के लिए बल्कि सार्वजनिक बुनियादी ढांचों के विस्तार का भी, मसलन बेहतर सड़कें और सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था। घरेलू बाजार में बढ़त और मजबूत इंजीनियरिंग क्षमता के साथ वाहनों व कलपुर्जों के लिए बेहतर सड़क व सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था के साथ मजबूत विनिर्माण का आधार बनाना अच्छी रणनीति होगी, जिसका फल न सिर्फ उद्योग के खिलाडिय़ों बल्कि अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा, जो अगले कुछ साल में लगातार उच्च बढ़त हासिल करने के लिए तैयार है। बेहतर सड़कें और सार्वजनिक परिवहन की भरोसेमंद व्यवस्था संपन्न ऑटो उद्योग की पूरक होगी और इसकी बढ़त को और टिकाऊ बनाएगा।

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