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मौजूदा तेजी की आंच में जल न जाएं हाथ
जितेंद्र कुमार गुप्ता /  September 26, 2010

शेयर बाजारों में मौजूदा तेजी को ज्यादातर विश्लेषक इस तरह से बयां कर रहे हैं: 'शायद, यह समय कुछ अलग होगा। मंगलवार को सेंसेक्स मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण 20,000 के स्तर पर पहुंच गया जो जनवरी, 2008 के इसकी सर्वाधिक ऊंचाई से महज 1200 अंक ऊपर है। हालांकि इस तेजी को उचित ठहराए जाने के पीछे मौलिक कारण हैं, लेकिन इसे लेकर कुछ चिंताएं, खासकर अल्पावधि में इस तेजी की रफ्तार के टिके रहने को लेकर, भी बरकरार हैं। सकारात्मक तथ्य यह है कि 2008 की तेजी में और मौजूदा तेजी में अंतर स्पष्टï है। एक निवेश विशेषज्ञ गुल टेकचंदानी कहते हैं, 'वर्ष 2008 में बड़े बड़े सपने देखे जा रहे थे। इसे लेकर उन्माद चरम पर था और लोग इस तेजी को लेकर इतने खुश हो रहे थे जैसे कि कल आएगा ही नहीं। इस बार इस तरह का बुलबुला नहीं है। लेकिन तेजी की रफ्तार काफी तेज हो गई है, इसलिए इसमें थोड़ी गिरावट आ सकती है।

यूटीआई ऐसेट मैनेजमेंट की उपाध्यक्ष एवं फंड प्रबंधक स्वाति कुलकर्णी कहती हैं, '2008 में सब कुछ - जिंस कीमतें, वैश्विक अर्थव्यवस्था या बाजार- चरम पर था। मौजूदा समय में ये संकेतक अभी भी रिकवरी से गुजर रहे हैं।

फंडामेंटल मजबूत बने हुए हैं। दिसंबर 2008 में समाप्त हुई तिमाही में आर्थिक विकास दर घट कर लगभग 5.8 फीसदी रह गई थी, लेकिन बाद में यह सुधर कर संकट से पूर्व के स्तरों पर आ गई और इस साल जून की तिमाही में यह 8.8 फीसदी तक पहुंच गई। इससे निवेशकों के बीच विश्वास को मजबूती मिली है। यही नहीं, औद्योगिक गतिविधियों में दोहरे अंक में वृद्घि, उम्मीद की तुलना में अच्छे मॉनसून, औद्योगिक पूंजीगत खर्च में मजबूती और कंपनियों की आय में वृद्घि की वजह से भी परिदृश्य में सुधार आया है। अगले साल भी जीडीपी वृद्घि 8-8.5 फीसदी रहने की उम्मीद है।

नकदी
बाजार की चाल तय करने के लिहाज से तरलता एकमात्र सबसे बड़ा कारक है। दोहरी गिरावट और पश्चिमी देशों में धीमे विकास के भय ने तेजी से उभरते बाजारों को वैश्विक निवेशकों की खरीद सूची में शीर्ष पर पहुंचा दिया है। अब तक भारत में एफआईआई निवेश 1,00,000 करोड़ रुपये को पार कर चुका है जो अब तक सर्वाधिक है। यह रफ्तार विकास को बरकरार रखने की भारत की क्षमता और वैश्विक खबरों के प्रवाह पर निर्भर करेगी।

मूल्यांकन सस्ता नहीं
मूल्यांकन हालांकि अब सस्ते नहीं हैं। यह भी एक वजह है जिससे अल्पावधि में अधिक उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है। सेंसेक्स के लिए आय अनुमान 2010-11 के लिए 1,046 रुपये और 2011-12 के लिए 1,257 रुपये है। 2011-12 की आय के आधार पर सेंसेक्स लगभग 16 गुना पर उपलब्ध है जो 2010-11 के आय अनुमान की तुलना में इसके 10 वर्षीय औसतन मूल्यांकन से थोड़ा अधिक है। लेकिन 2010-11 के आय अनुमान के 19 गुना पर यह महंगा है। टाटा एएमसी के प्रबंध निदेशक वेद प्रकाश चतुर्वेदी कहते हैं, 'यह नकदी आधारित तेजी है। यही वजह है कि मूल्यांकन में अल्पावधि नजरिये से बदलाव किया गया है। इसमें कमी आ सकती है। लेकिन यह कमी कब आएगी, यह हम नहीं जानते।

नजरिया
जहां विश्लेषकों का मानना है कि परिदृश्य सकारात्मक बना हुआ है, वहीं कीमतों में तेज उछाल की वजह से सतर्कता बरते जाने की भी जरूरत है। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि अल्पावधि का दृष्टिïकोण उतार-चढ़ाव से भरा होगा। आने वाले समय में 15-20 फीसदी की गिरावट देखी जा सकती है। हालांकि इस गिरावट के समय के बारे में भविष्यवाणी करना कठिन है। निवेशकों को नकदी (एफआईआई प्रवाह) पर नजर रखने और चयनात्मक दृटिकोण अपनाने की सलाह दी जाती है।

निवेश विश्लेषक गुल टेकचंदानी कहते हैं, 'समग्र नजरिया सकारात्मक है। लेकिन आपको शेयरों के चयन में सावधानी बरतनी होगी। वे कहते हैं कि बिजली, बुनियादी ढांचा, तेल एवं गैस के साथ साथ वाणिज्यिक वाहनों जैसे कुछ खास ऑटो सेगमेंट के क्षेत्रों में अवसर मौजूद हैं। मौजूदा तेजी में ये क्षेत्र वास्तविक रूप से शामिल नहीं हैं।
दूसरी तरफ मैक्वेरी के विश्लेषक इंडस्ट्रियल, मैटेरियल और हेल्थकेयर पर अधिक जोर दे रहे हैं।

Keyword: share markets, India,
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