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रफ्ता-रफ्ता नागरिकों की सेहत में हो रहा है सुधार
सरकारी पहलों को राजनीतिक व प्रशासनिक सहयोग मिलने से सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार की संभावना बढ़ी है। स्वास्थ्य सेवाओं पर लिखी एक किताब में इसका जिक्र है
शंकर आचार्य /  September 10, 2010

पिछले नौ वर्षों से अधिक समय में मैंने 150 से अधिक आलेख लिखे हैं। इनमें से महज दो ही देश के स्वास्थ्य क्षेत्र पर केंद्रित रहे हैं और यह तीसरा है। ये तीनों आलेख पिछले तीन वर्षों के दौरान ही आए हैं जब मैं वरिष्ठï नागरिक बन चुका हूं। स्वाभाविक तौर पर उम्र बढऩे के साथ ही स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की परेशानियां और उससे जुड़ी अन्य बातें सामने आने लगती हैं। वर्ष 2004 के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के मुताबिक 60 वर्ष से अधिक आयु के 31 फीसदी लोगों को सर्वे से एक पखवाड़े पहले किसी न किसी तरह की बीमारी ने तंग किया था जबकि 10 से 34 साल के लोगों में से महज पांच फीसदी और 45 से 59 साल के लोगों में से 13 फीसदी बीमार हुए थे। इस आलेख को लिखने का ताजा कारण पिछले सप्ताह बीएस बुक्स से आई इंडिया हेल्थ रिपोर्ट 2010 (आईएचआर 10) है। पुस्तक का संपादन और लेखन अजय महल, विवेेक देबरॉय और लवीश भंडारी ने किया है। कोई भी व्यक्ति जो देश में स्वास्थ्य के हालात, स्वास्थ्य सुविधाओं और दवाओं की स्थिति, उभरती स्वास्थ्य समस्याओं, स्वास्थ्य सेवाओं की बुनियादी स्थिति, चिकित्सकीय नैतिकताओं, स्वास्थ्य सेवा फाइनैंसिंग, सरकारी कार्यक्रमों और नियमनों की जानकारी चाहता है, उसके लिए 138 पृष्ठï की यह रिपोर्ट बहुत अच्छी है।

प्रस्तुत हैं इस रिपोर्ट के कुछ ऐसे चुनिंदा हिस्से जो पाठकों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं और उन्हें समूची रिपोर्ट पढऩे के लिए प्रेरित कर सकते हैं। किताब के पहले अध्याय में स्वास्थ्य संबंधी नीतियों पर ध्यान दिया गया है। कई वर्षों से विश्लेषकों ने किसी देश की प्रति व्यक्ति आय और उसके लोगों की जीवन प्रत्याशा के बीच सकारात्मक संबंध स्थापित किया है। साथ ही उन्होंने प्रतिव्यक्ति आय और शिशु मृत्यु दर के बीच नकारात्मक संबंध भी स्थापित किया है। बीस वर्ष पहले तक आम धारणा थी कि आर्थिक विकास और जीवन स्तर में सुधार के साथ ही जीवन प्रत्याशा बढ़ती है और शिशु मृत्यु दर कम होती है। इस बीच हुए तमाम शोधों से पता चला है कि अगर सही नीतिगत हस्तक्षेप हो तो कम आय स्तर के बीच भी इनके स्तर को बेहतर किया जा सकता है। यही वजह है कि 1980 के दशक में जब भारत और चीन में प्रति व्यक्ति आय लगभग एक थी, उस समय भी चीन में शिशु मृत्यु दर भारत से 40 फीसदी कम थी। दरअसल चीन में शुरू से ही प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और बेहतर सफाई तथा जल आपूर्ति सहित समेकित ग्रामीण विकास पर ध्यान दिया गया था। इसके उलट हमारी नीतियों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बहुत कम संसाधन इस्तेमाल किए गए। एक शर्मनाक तथ्य यह भी है कि बांग्लादेश में वर्ष 1980 से 2007 के बीच शिशु मृत्यु दर में भारत की अपेक्षा तेजी से कमी आई है।

अगर हम बच्चों की बात करें तो स्वास्थ्य और पोषण का जिक्र एक साथ आता है। सन 1980 के बाद भारत में जहां बाल पोषण में सुधार आया वहीं आईएचआर10 के मुताबिक लैटिन अमेरिका और चीन, फिलीपींस और श्रीलंका में स्थिति अपेक्षाकृत खराब है।

आईएचआर10 के हवाले से अगर देश के विभिन राज्यों की विविध सामाजिक आर्थिक स्थिति की चर्चा करें तो वर्ष 2005-07 के दरम्यान मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु दर प्रत्येक 1000 पर 65-70 के बीच थी जबकि केरल में यह 13, महाराष्टï्र में 34 और तमिलनाडु में 35 थी। निश्चित रूप से देश के पिछड़े राज्यों में मृत्यु दर की स्थिति कई अफ्रीकी देशों से बेहतर नहीं है। क्या हम एक आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर देश से ऐसी ही उम्मीद करते हैं?

स्वास्थ्य सेवा संबंधी भाग में बहुउपयोगी आंकड़े पेश किए गए हैं जो हमें बेहद महत्वपूर्ण निष्कर्षों तक पहुंचाते हैं। इसके मुताबिक देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनकी पहुंच स्तरीय स्वास्थ्य सेवा तक नहीं है। इनमें भी गरीब, आदिवासी और महिलाओं की संख्या ज्यादा है। दूसरी बात, संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं का प्रभुत्व है। तीसरी बात इस क्षेत्र में अप्रशिक्षित लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है। एक और चिंताजनक बात यह है कि सात-आठ फीसदी घर तो गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिता रहे हैं क्योंकि उनका मासिक चिकित्सकीय खर्च बहुत अधिक है। कुल मिलाकर प्रशिक्षित कर्मचारियों और स्वास्थ्य केंद्रों के रूप में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का अब भी अभाव है।

किताब का चौथा अध्याय अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी चीजों जैसे प्रशिक्षित और समर्पित स्वास्थ्यकर्ताओं, स्वास्थ्य सेवा केंद्रों और अस्पतालों के पर्याप्त विकसित नेटवर्क की जरूरत पर बल देता है। अच्छी जलापूर्ति और सफाई व्यवस्था, बढिय़ा पोषण आदि के बारे में है। कहने की जरूरत नहीं कि देश में इन तमाम चीजों की सख्त आवश्यकता है। यह अध्याय इस मशविरे के साथ समाप्त होता है कि जन स्वास्थ्य पर बहुत अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी नीतियों की बढिय़ा योजना बनाने और उन पर अमल के लिए जिन क्षमताओं की आवश्यकता है, अभी देश का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय उनसे लैस नहीं है।

भले ही यह एक तार्किक निष्कर्ष हो लेकिन यह बात को आगे नहीं बढ़ाता है। आईएचआर10 में यह भी बताया जाना था कि अच्छे सार्वजनिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में में राज्यों की क्या भूमिका हो सकती है?

अध्याय सात में हमें इस संबंध में सरकारी नियमों और कार्यक्रमों की संक्षिप्त लेकिन शिक्षापरक जानकारी मिलती है। इसके मुताबिक स्वास्थ्य मंत्रालय देश में 42 स्वास्थ्य कार्यक्रम चला रहा है। इनमें एड्स, टीबी, कुष्ठï और कैंसर जैसी बीमारियों का इलाज किया जाता है। इस खंड में राष्टï्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के बारे में संक्षेप में जरूरी जानकारी दी गई है।

किताब के अंतिम खंड में देश के स्वास्थ्य सेवा सुधारों को ऐतिहासिक परिदृश्य में देखा गया है। इसमें बताया गया है कि 1946 में भोरे समिति के बाद से अब तक 21 समितियां  और आयोग स्वास्थ्य के क्षेत्र में गठित किए जा चुके हैं। यह किताब विद्वानों, नीति निर्माताओं समेत स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र से मिले तमाम लोगों के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसके मुताबिक इस अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र में सुधारों के लिए जरूरी जांच और अनुशंसाओं की कमी नहीं है। समस्या यह है कि जरूरी अनुशंसाओं को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है।

किताब में बताया गया है कि किस तरह हाल के दिनों में एनएचआरएम तथा अन्य सरकारी पहलों को राजनीतिक तथा प्रशासनिक सहयोग मिलने से सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार की संभावना बढ़ी है। हम आशा करते हैं कि ऐसा ही हो।
(लेखक इक्रियर में मानद प्रोफेसर हैं।)

Keyword: indian health sector, national sample survey,
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