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'विदेशी निवेशक नियमों पर स्पष्टता चाहते हैं'
सवाल-जवाब
सिद्घार्थ /  09 03, 2010

यू के सिन्हा, विदेशी निवेश से संबद्घ कार्यदल समूह के अध्यक्ष

इस हफ्ते यू के सिन्हा समिति की रिपोर्ट सरकार ने जारी की जिसमें विदेशी निवेशकों के रुझान के बारे में कुछ अनुमान लगाया गया है और साथ ही इसमें विदेश में निवेश करने वाले निवेशकों की सुरक्षा के लिए कुछ कदम उठाने की सलाह दी गई है। यू के सिन्हा यूटीआई परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक हैं उन्होंने सिद्घार्थ से समिति की सिफारिशों के बाबत बात की-

इस रिपोर्ट में अंतनिर्हित बातें क्या हैं?
मुख्य बात यह है कि पिछले 15-18 सालों में जब से विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के नियमन से देश ने काफी तरक्की की है। तब से लेकर अब तक कई तरह की चीजें हुई हैं और नियामक के साथ सरकार ने विभिन्न तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दी है। मिसाल के तौर पर जब प्लांटेशन क्षेत्र में दिक्कत हुई तब प्रवासी भारतीयों के निवेश को इस क्षेत्र के लिए बंद कर दिया गया। कभी कभी हम पार्टिसिपेटरी नोट्स को प्रोत्साहित करते हैं और कभी उन पर पाबंदी लगा दी जाती है। डेरिवेटिव जैसे मसले पर सरकार और नियामक का रुख ज्यादा स्पष्ट नहीं है। हम ऐसी स्थिति में पहुंच चुके हैं जहां विदेशी निवेशकों के लिए नियम अब बेहद जटिल हो गए हैं। नियमों पर स्पष्टïता नहीं है और जिन नतीजों की व्याख्या की जा रही है वह बेहद भारी पड़ सकता है। हमें ऐसा लगता है कि ग्राहकों को जानने की प्रक्रिया (नो योर कस्टमर, केवाईसी) को अच्छी तरह से बनाया है। लेकिन वैश्विक जरूरतों के मुताबिक हमारी यह क्षमता बेहद कम है।

लेकिन पिछले कुछ सालों में कई खिलाड़ी भारत में आए हैं....
भारतीय अर्थव्यवस्था का अंतरराष्ट्रीयकरण बड़े तरीके से हुए और इस बाबत खबरें भी आती हैं। मिसाल के तौर पर चालू खाता में सकल निवेश की पोजीशन में 1990 के दशक में 23 फीसदी और वर्ष 2000 से 2008 के बीच 40 फीसदी का इजाफा हुआ है। वर्ष 2000-08 के दौरान पूंजीगत खाता में सकल निवेश 90 के दशक के 12 फीसदी से बढ़कर 43 फीसदी तक हो गया। भारतीय कंपनियों ने विदेशी परिसंपत्ति में 5 गुना की बढ़ोतरी देखी है जिसे वे अपने बैलेंसशीट पर बनाए रखना चाहते हैं। ऐसे में हमें वैश्विक एकीकरण को पहचानना चाहिए और उसी के मुताबिक नीतियां बनानी चाहिए। हमने यह पाया है कि हमारी मौजूदा व्यवस्था में कई खामियां हैं जिससे यह काफी महंगी साबित होती है इसलिए यहां से वैधानिक अनिश्चितता को खत्म करने की जरूरत है। विदेशी निवेशकों के लिए एकल खिड़की होनी चाहिए जिसे हम पात्र वित्तीय निवेशक कहते हैं। हमें निवेश उपकरणों के मुकाबले अपनी परिसंपत्ति वर्ग का नियमन करने की जरूरत है। अगर आप इक्विटी का नियमन करना चाहते हैं तो उसे करिए। नियामक की भूमिका बाजार की अखंडता को सुनिश्चित करने की है जिससे समझौता नहीं किया जाना चाहिए। विदेशियों और भारतीय निवेशकों के लिए अलग-अलग मार्जिन जरूरतें क्यों होनी चाहिए।

आपका कहना है कि अगर किसी संस्था को निवेश करने की इजाजत दे दी गई तो उसके साथ एक तरह का बर्ताव होना चाहिए?
हां। अगर एक बार किसी को इजाजत दे दी गई तो उसके साथ एक जैसा बर्ताव होना चाहिए। इससे उस निवेशक को सहूलियत होगी। फिलहाल हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत है और हम 1991-92 के दौर में नहीं हैं।

आपने ज्यादा सख्त केवाईसी नियम के बारे में बात की, क्या इससे निवेशक हतोत्साहित नहीं होंगे?
ज्यादा सूचनाओं के साथ नियम को मजबूत बनाना चाहिए। हमें एफएटीएफ (फाईनैंशियल एक्शन टास्क फोर्स) और ओईसीडी (आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन) का अनुसरण करना चाहिए जो बेहतर प्रणाली को दर्शाती हैं। मौलिक निवेशकों को हतोत्साहित नहीं किया जाएगा। लेकिन इसका वैधानिक उपाय भी होना चाहिए। इस वक्त यह व्यवस्था बेहद जटिल हो चुकी है।

Keyword: FII, OECD, UK Sinha Committee Report,
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