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जिरह: परमाणु हादसे में जिम्मेदारी का दायरा बढ़ाना सही है?
नीलेंद्र कुमार/जी डी मित्तल /  09 02, 2010

संशोधन से कंपनियां होंगी ज्यादा जवाबदेह

नीलेंद्र कुमार, निदेशक, एमिटी लॉ स्कूल

वर्ष 2008 में अमेरिका के साथ हुए नागरिक परमाणु समझौते को अमली जामा पहनाने की दिशा में परमाणु दायित्व विधेयक बेहद अहम है। अनुच्छेद 17 में संशोधन कर आपूर्तिकर्ता की जवाबदेही तय करके एक अच्छा कदम उठाया गया है। मूल विधेयक में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं था जिसमें परिचालन करने वाले को आपूर्तिकर्ता के खिलाफ कोई कदम उठाने का अधिकार हो।

और न ही इस विधेयक में परमाणु हादसे के पीडि़त मुआवजे के लिए आपूर्तिकर्ता को अदालत में घसीट सकते थे। इस तरह से अनुच्छेद 17 में संशोधन से इन कई असमानताओं को खत्म करने की कोशिश की गई है। यह केवल परिचालन करने वाले (सरकार)  को तय करना है कि वह आपूर्तिकर्ता से हर्जाने की मांग करे।

संशोधित विधेयक के मुताबिक परिचालक के पास इस बात का पूरा अधिकार है कि वह नुकसान के लिए आपूर्तिकर्ता से धन की मांग कर सके क्योंकि उसे पहले ही लोगों को नुकसान के लिए भुगतान करना पड़ सकता है। आपूर्तिकर्ता के खिलाफ ऐसा कोई भी कदम उपकरण या सेवाओं में खामियों की बुनियाद पर उठाया जा सकता है।

इससे पहले विवादित मसौदे में यह प्रावधान उसी स्थिति में दिया मौजूद था जब इस बात के सबूत हों कि किसी अप्रिय घटना को जानबूझकर अंजाम दिया गया हो।
उस मसौदे में कई अन्य बातों को लेकर भी विवाद थे। संशोधित मसौदे में विधि निर्माताओं ने परमाणु हादसे के शिकार लोगों के लिए कुछ सांत्वना भरे प्रावधान किए हैं।

सबसे अहम तो यही है कि परिचालक और आपूर्तिकर्ता को एक अनुबंधीय देनदारी से जोड़ा गया है। उपबंध 4 (4) में किया गया बदलाव भी बेहद अहम है। यह परिचालक पर सख्ती से जिम्मेदारी तय करता है जिसमें गलती की कोई गुंजाइश नहीं है। अगर किसी आपूर्तिकर्ता का कोई कर्मचारी भी गलती करता है तो उसका खामियाजा आपूर्तिकर्ता को भुगतना होगा। इससे कंपनियां ज्यादा जवाबदेह होंगी और इसका असर भी दिखेगा।


कड़े प्रावधानों में सीमित हो जाएगी दिलचस्पी

जी डी मित्तल, टीम लीडर, पीएम डाइमेंशंस

सवाल बेहद दिलचस्प है और पिछले कुछ दिनों में लोगों ने संचार माध्यमों के जरिये भी अपने विचार रखे हैं। शुरुआत करते हैं 20 अगस्त को 'द हिंदू' में छपे सुब्रत राजू और एम वी रामन्ना के 'मोरल हेजर्ड ऑफ आइडंटिफाइंग सप्लायर्स' से। इसमें लेखकद्वय ने परमाणु क्षतिपूर्ति विधेयक में आपूर्तिकर्ताओं को भी जोडऩे की जबरदस्त वकालत की है। वैसे परमाणु मामलों से जुड़े दो अन्य प्रमुख लोगों की बात पर भी गौर फरमाना लाजिमी है।

पहले न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड में कॉर्पोरेट प्लानिंग और कॉर्पोरेट कम्युनिकेशंस के कार्यकारी निदेशक सुधींद्र ठाकुर की बात करते हैं। उन्होंने लिखा, 'निश्चित रूप से सरकार के पास कानून बनाने का अधिकार है। लेकिन सरकार को कानून बनाने वक्त इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि जिस मकसद के लिए कानून बनाया जा रहा है उसके हित प्रभवित न हों। मौजूदा 17 बी प्रावधान के तहत न तो कोई देसी और न ही कोई विदेशी कंपनी परमाणु बिजली उद्योग को सेवाएं मुहैया कराने में दिलचस्पी नहीं दिखाएगी।'

इस पक्ष से जुड़े दूसरे शख्स हैं लार्सन ऐंड टुब्रो के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक ए एम नाइक। देश की दिग्गज इंजीनियरिंग कंपनी के मुखिया नाइक कहते हैं कि एक परमाणु संयंत्र से आम तौर पर छोटे-बड़े 300 से 400 आपूर्तिकर्ता और सेवा प्रदाता जुड़े रहते हैं। इस विधेयक में अनुच्छेद 17 को जोड़ा गया है जिसमें ऑपरेटर को मुआवजे के लिए मांग करने को अधिकार दिया गया है।

नाइक कहते हैं कि इस अनुच्छेद में आपूर्तिकर्ता की जिम्मेदारी उनकी आपूर्ति से कहीं अधिक तय कर दी गई है। नाइक ने कहा, 'अगर असंगत देनदारी की मांग की जाएगी तो कोई भी बड़ा आपूर्तिकर्ता इसके लिए तैयार नहीं होगा।' भारत में परमाणु उद्योग का दामन एकदम पाक साफ रहा है। ऐसे में उन पर ज्यादा सख्ती करके इस उद्योग की तरक्की प्रभावित हो सकती है।

Keyword: Nuclear Liability Bill, Company, Govt.,,
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