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विदेश में मिले वेतन पर देश में कर
विदेशी उद्यम
एच पी अग्रवाल /  August 29, 2010

विदेशी जब काम करने भारत आते हैं तो कई बार उन्हें भारत में वेतन दिया जाता है और कई बार वेतन विदेश में मिलता है। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि उन्हें उनकी तनख्वाह का कुछ हिस्सा भारत में दिया जाता है और  कुछ बाहर।

ऐसी सूरत में यह बात साफ होनी चाहिए कि विदेशी कर्मचारी को विदेशी मुद्रा में तनख्वाह विदेश में ही क्यों न दी जाए, अगर वह भारत में उसके काम के एवज में दी जा रही है तो उस पर भारत में ही कर का भुगतान करना होगा। अब सवाल यह उठता है कि जिस भारतीय नियोक्ता ने कर्मचारी को वेतन नहीं दिया है, क्या कानूनन वह कर्मचारी की कमाई में से टीडीएस (स्रोत पर कर कटौती) के जरिये कर काटने के लिए बाध्य होगा।

यही मसला कर्नाटक उच्च न्यायालय में सीआईटी बनाम इंडो निसिन फूड्स लिमिटेड (325 आईटीआर 451) मामले में सामने आया। इस मामले में एक भारतीय कंपनी ने एक जापानी कंपनी के साथ समझौता किया था। समझौते में कहा गया था कि जापानी कंपनी कुछ जापानी तकनीकी विशेषज्ञों को भारत में काम के लिए भेजेगी।

उनके वेतन का एक हिस्सा जापानी कंपनी देगी और बाकी वेतन उन्हें भारतीय कंपनी से मिलेगा। आयकर विभाग का कहना था कि भारतीय कंपनी ने इन कर्मचारियों को जापानी कंपनी की ओर से मिले वेतन पर टीडीएस नहीं काटा।

भारतीय कंपनी ने दलील दी कि उसने कर्मचारियों को दी गई तनख्वाह पर टीडीएस काट लिया था और जापानी कंपनी की ओर से दी गई तनख्वाह पर टीडीएस काटने की उसे जरूरत नहीं है। ऐसे में उच्च न्यायालय के सामने यह मामला आया कि जापानी कंपनी ने विदेश में जो तनख्वाह कर्मचारियों को दी है, उस पर भारतीय कंपनी को टीडीएस काटने की जरूरत है या नहीं।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जब तनख्वाह की यह रकम भारतीय कंपनी ने नहीं दी है या विदेशी कंपनी ने भी भारतीय कंपनी के जरिये यह रकम अपने कर्मचारियों को नहीं दी है तो भारतीय कंपनी को उस पर टीडीएस काटने की कोई जरूरत नहीं है। कुछ ऐसी ही फैसला दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी सीआईटी बनाम वुडवार्ड गवर्नर प्राइवेट लिमिटेड (295 आईटीआर 1) मामले में सुनाया था।

दिलचस्प है कि इससे मिलते-जुलते सीआईटी बनाम एली लिली ऐंड कंपनी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड मामले में उच्चतम न्यायालय का आदेश कुछ और ही था। न्यायालय ने कहा, 'भारत में कर काटने वाले को विदेशी कंपनी की ओर से विदेश में दिए गए वेतन या भत्तों में टीडीएस काटना ही होगा, खास तौर पर जब उस वेतन के एवज में काम विदेशी कंपनी के लिए न किया गया हो और पूरा वेतन भारत में किए गए काम के बदले ही दिया गया हो।'

उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि विदेश में दिए गए वेतन और भत्तों में से टीडीएस की कटौती करनी ही होगी। जब इस तरह का कोई भी भुगतान भारतीय कंपनी करती है तो वह कंपनी खुद ही टीडीएस काट लेगी। लेकिन अगर विदेशी कंपनी वेतन या भत्ते कर्मचारियों को देती है, तब भी भारतीय कंपनी टीडीएस काटेगी और यह कटौती उसे उस रकम से करनी होगी, जो उन कर्मचारियों को वह स्वयं दे रही है।

इस तरह उच्चतम न्यायालय ने जो फैसला सुनाया, उससे यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो गई है कि भारतीय कंपनी विदेशी कर्मचारी को जो वेतन या भत्ते देती है, उन पर टीडीएस काटने के लिए तो वह कानूनन बाध्य है ही, उस अवधि के दौरान भारत में अपनी सेवाओं के बदले उन कर्मचारियों को अगर विदेशी नियोक्ता की ओर से वेतन या भत्ते दिए जाते हैं तो उन पर भी टीडीएस काटने का काम भारतीय कंपनी का ही होगा।

यहां गौर करने लायक बात है कि उच्चतम न्यायालय ने सीआईटी बनाम एली लिली ऐंड कंपनी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड मामले में जो फैसला सुनाया था, कर्नाटक उच्च न्यायालय में सीआईटी बनाम इंडो निसिन फूड्स लिमिटेड मामले की सुनवाई के वक्त उसका जिक्र नहीं किया गया।

इसीलिए उच्च न्यायालय का पूरा सम्मान करते हुए यह कहा जाएगा कि उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का जिक्र नहीं किया था और यह फैसला सही नहीं है। उच्चतम न्यायालय का फैसला इस मामले में अंतिम है और उसके मुताबिक भारतीय कंपनी किसी विदेशी कर्मचारी को भारत में काम करने के एवज में मिले वेतन पर टीडीएस काटने के लिए बाध्य है चाहे वेतन उसने दिया हो या विदेशी कंपनी ने।

(लेखक एस एस कोठारी मेहता ऐंड कंपनी से जुड़े हैं।)

Keyword: TDS, Abroad, Salary, India, tax,
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