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जिरह: क्या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में कम सार्वजनिक हिस्सेदारी ही ठीक है?
निर्मल जैन/यू डी चौब /  August 19, 2010

सार्वजनिक हिस्सेदारी से फायदे

निर्मल जैन, अध्यक्ष, इंडिया इन्फोलाइन लि.

वित्त मंत्री ने बजट पेश करने के दौरान ही ऐलान कर दिया था कि सभी कंपनियों को अपनी कम से कम 25 फीसदी हिस्सेदारी तो सार्वजनिक करनी होगी। यह सीमा सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की सभी सूचीबद्घ कंपनियों पर लागू होती है। हालांकि इन कंपनियों को इस कवायद को अंजाम देने के लिए तीन से पांच वर्ष की मोहलत दी गई है लेकिन हर साल कम से कम 5 फीसदी हिस्सेदारी तो सार्वजनिक तौर पर बेचनी ही होगी।

सरकारी कंपनियों को भी इसकी जद में लिए जाने के तमाम फायदे गिनाए जा सकते हैं। अधिक सार्वजनिक हिस्सेदारी से कंपनी का बाजार में दायरा और तरलता दोनों बढ़ेंगी जिससे लंबे समय के लिए निवेश करने वालों को भी आकर्षित किया जा सकेगा। सभी जानते हैं कि ऐसे निवेशक कॉर्पोरेट गवर्नेंस को बढ़ावा देने में अहम भूमिका अदा करते हैं।

ज्यादा सार्वजनिक हिस्सेदारी की वजह से शेयरों की कीमतों को प्रभावित करना मुश्किल हो जाता है। एक चिंता यह भी जाहिर की जा रही है कि कुछ सार्वजनिक कंपनियों में इस तरह से बेची जाने वाली हिस्सेदारी सरकार को उन कंपनियों में विनिवेश करने से रोकने का काम करेगी जिनमें सरकार विनिवेश की प्रक्रिया शुरू करना चाहती है क्योंकि उन कंपनियों के लिए वित्तीय तंत्र में कम रकम बचेगी।

मेरा मानना है कि यह एक गलत धारणा है। वास्तव में बाजार में पूंजी की कोई कमी नहीं है। खासतौर से विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के पास रकम की कोई कमी नहीं है। अगर आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) की कीमत वाजिब है तो पैसा लगाने वालों कि किल्लत नहीं है। ज्यादातर सरकारी कंपनियां बेहतर तरीके से चल रही हैं और कमाई से लेकर मुनाफे के मोर्चे पर भी बढिय़ा प्रदर्शन कर रही हैं।

ये कंपनियां काफी मोटी रकम जुटाने में सक्षम हैं। हमें हाल ही में चीन के एग्रीकल्चर बैंक ऑफ चाइना (एगबैंक) के आईपीओ से सबक लेना चाहिए। इसके आईपीओ ने रिकॉर्ड 22.1 अरब डॉलर की रकम जुटाई है। वहीं अगर हम अपने यहां की तस्वीर देखें तो मंजर जरा जुदा नजर आता है। नए नियमों के हिसाब से सरकारी कंपनियां अगले तीन से पांच साल में अपनी तय हिस्सेदारी बाजार में बेचती हैं तब भी यह आंकड़ा हर साल 10 अरब डॉलर से ऊपर पहुंचता नहीं दिखता।

बड़ी, नामचीन और सम्मानित कंपनियों की अधिक सार्वजनिक हिस्सेदारी के भी कई फायदे हैं। इससे वैश्विक सूचकांकों में भारत का दबदबा भी बढ़ेगा और साथ ही निवेशकों को आकर्षित करने में भी मदद मिलेगी।

पीएसयू के हिसाब से हो फैसला

यू डी चौबे, महानिदेशक, स्कोप

भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां (पीएसयू) एक तंत्र के तहत खास तरीके से काम करती हैं। इस लिहाज से अनिवार्य सूचीबद्घता उनकी साख, बाजार में उनकी हैसियत और स्वायत्तता पर असर डाल सकती है। पीएसयू सूचीबद्घता के मानकों को पूरा करने से मना नहीं करतीं लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें वक्त भी दिया जाना चाहिए।

उन्हें कब सूचीबद्घ होना है, कितनी राशि का निर्गम बाजार में लाना है, मूल्यांकन और बाजार के माहौल पर फैसला करने के लिए इन कंपनियों के बोर्ड को जरूरत के हिसाब से मोहलत दी जानी चाहिए।

देश में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की स्थापना दो मकसदों के लिए की गई थी। इन्हें आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय में समन्वय कर आगे बढऩे की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। आजादी के बाद कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को उद्योग केंद्रित अर्थव्यवस्था में तब्दील करने की जरूरत थी। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए मुनाफा अर्जित करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है बल्कि सामाजिक-आर्थिक समीकरणों के लिए यह कम मुनाफे से भी काम चला लेती हैं।

उदारीकरण की प्रक्रिया के बाद पीएसयू में हुए सुधारों ने इन कंपनियों को मजबूत आधार मुहैया कराने का काम किया। इस तरह से पीएसयू देश के लिए धन कमाने का बड़ा जरिया बन गईं।वर्ष 1990 से 2010 के बीच सरकारी कंपनियों ने दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की की। इस दौरान इन कंपनियों ने जबरदस्त तेजी का दम दिखाया।

यहां तक कि आर्थिक मंदी के दौर में भी इन कंपनियों की कमाई में 10 फीसदी की तेजी और मुनाफे में औसतन 35 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली। यही वजह है कि मंदी के दौर में देश की सार्वजनिक कंपनियां पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गईं। मौजूदा दौर में सरकार की कुल कमाई का एक तिहाई सरकारी कंपनियों के जरिये ही आता है।

करीब 4,000 सरकारी कंपनियों में से एक फीसदी सूचीबद्घ भी हैं जिनके पास कुल बाजार पूंजीकरण का 25 फीसदी है। दरअसल बाजार को अपने इशारों पर नचाने वालों को नापने के लिए नियामक और नैतिक मानकों की जरूरत है। इसलिए ही अनिवार्य सूचीबद्घता का नियम बनाया गया है। लेकिन इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को अलग चश्मे से देखने की जरूरत है।

एक बात तो यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बाजार को चढ़ाने-गिराने का काम नहीं करतीं। दूसरी बात यह है कि कई पैमानों और मानकों के लिहाज से इन कंपनियों पर पैनी नजर रखी जाती है। इनमें आंतरिक और वाह्य लेखा तंत्र तो होता ही है, बोर्ड और ऑडिट समिति भी होती है। कैग और सतर्कता आयोग की भी नजर होती है।

Keyword: Public sector companies, share, IPO, FII,
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