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पारंपरिक हुनर के लिए किसी मसीहा की है दरकार
अनसुनी आवाज
श्रीलता मेनन /  August 09, 2010

अपने दोस्तों के साथ शहर का रुख करने का फैसला करने से कुछ महीने पहले तक मोमिन हरदोई के एक गांव में गलीचों की बुनाई किया करता था। लेकिन जब ऑर्डर मिलना बंद हो गए तो वह दिल्ली चला आया। अभी वह  दिल्ली के उपनगरीय इलाकों में किराए के रिक्शे के जरिए घूम-घूमकर सामान बेचता है। हरदोई में जहां वह प्रति गलीचा महज 1600 रुपये कमाता था और मुश्किल से जीवन गुजार पाता था, वहीं अब वह हर महीने 12 हजार रुपये कमा लेता है।

लेकिन अभी भी वह अपनी नई पहचान स्वीकार नहीं कर पा रहा है। वह अपने कारीगर दोस्तों के साथ गाजियाबाद के खोड़ा गांव की उस झोपड़ी में बुनाई का काम फिर से शुरू करने का सपना देख रहा है, जहां वह रहता है। हो सकता है, उसे शहर की निकटता का लाभ अब मिल जाए। मोमिन और उसके दोस्तों को उन कार्यक्रमों की जानकारी नहीं है या फिर उसके बारे में जानकारी नहीं है जो ग्रामीण युवाओं को कौशल उपलब्ध कराने में मददगार हैं और रोजगार खोजने में उनकी मदद करते हैं।

असल में, सवाल यह है कि जीविका और उन लोगों को कौशल प्रदान करने वाले कार्यक्रम कितने प्रासंगिक हैं जो पहले से ही अपने काम और हुनर में तो दक्ष हैं, लेकिन पर्याप्त आमदनी अर्जित नहीं कर पाते। आप इनमें कारीगर, बुनकर, दस्तकार... हरदोई के गलीचा बुनकर, बनारस केसिल्क बनाने वालों को शामिल कर सकते हैं। 
ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक योजना है, संपूर्ण ग्रामीण स्वरोजगार योजना।

इसके तहत लोगों को आमदनी जुटाने वाली गतिविधियां शुरू करने लिए ऋण मुहैया कराया जाता है। पर उत्तर भारत के राज्यों में यह योजना असफल रही है। राष्ट्रीय जीविका मिशन के तौर पर इसे नए सिरे से बहाल किया गया था और इसका एक हिस्सा दक्षता का विकास व उद्योगों के साझीदार के तौर पर इसे चलाना है। निजी कंपनियां मसलन एनआईएस स्पार्टा, डॉ. रेड्डी और आईएल ऐंड एफएस उन जगहों पर प्रशिक्षण केंद्र स्थापित कर रही हैं जहां इसकी मांग है।

और नौकरियां मुख्य रूप से रिटेल, बीपीओ और उन क्षेत्रों में है जिसके लिए लोगों को अपने कस्बों और गांवों को छोडऩा पड़ता है और दूसरी जगहों पर प्रवास करना होता है। संचार कौशल में प्रशिक्षण की बाबत प्रमाणपत्र को इग्नू द्वारा प्रमाणित किए जाने के बाद एनआईएस स्पार्टा ने शहरों में 1700 लोगों को प्रशिक्षित किया है और इन्हें नियुक्ति दिलाई है।

दक्षता विकास की पहल की बाबत श्रम मंत्रालय का भी कार्यक्रम है जो ग्रामीण युवाओं में दक्षता विकसित करने की सुविधाओं के लिए निजी कंपनियों को जोड़ रहा है। हालांकि इनमें से कोई भी कार्यक्रम बड़ी संख्या में गांवों में बड़ी तादाद में रह रहे दक्ष व्यक्तियों की तरफ नजर नहीं डाल रहा, जो कि थोड़ा सा सहारा पाकर ज्यादा कमा सकते हैं।

ये देश के ऐसे कारीगर और बुनकर हैं जिनकी दक्षता बढ़ाने के लिए उन्हें अभी तक खादी और ग्रामीण उद्योग कॉरपोरेशन से भी मदद नहीं मिली है जिससे कि दक्षता में इजाफा करके वे ज्यादा अर्जित कर सके। आंध्र प्रदेश में वेलुगु की अगुआई करने वाले और भारत भर में इसे राष्ट्रीय जीविका मिशन के तौर पर सामने रखने में मदद करने वाले विजय कुमार का कहना है कि यह कार्यक्रम अभी पारंपरिक दक्षता या बाजार से जुड़ाव की तरफ नजर नहीं डाल रहा है।

इसका जोर लोगों को संगठित करने और उन्हें ऐसे साधनों से लैस करने पर है ताकि वह व्यक्ति अपने कर्ज का इस्तेमाल बेहतरी के लिए कर सके। विजय कुमार आंध्र प्रदेश के पावरलूम कामगारों की आत्महत्याओं का उदाहरण पेश करते हैं। तब हर ग्रुप को 5 लाख रुपये दिए गए थे, जिससे उन्हें महाजनों की कर्ज की रकम का भुगतान करने और अपनी गतिविधियों को लाभदायक बनाने में मदद मिली थी।

हालांकि उनका कहना है कि बिहार में मधुबनी पेंटिंग के मामले में एशियन हेरिटेज का विकास मॉडल कामयाब साबित हुआ है और मिशन की तरफ से इसे समर्थन मिलेगा।अगर ऐसे मॉडल बुनकरों और पॉटरी बनाने वालों के लिए बनारस या खुर्जा या हरदोई में शुरू किए जाएं तो मिशन निश्चित रूप से आखिरी समाधान खोजने में मदद करेगा। उनका कहना है कि इसके लिए बाजार, कच्चे माल व अन्य सामग्री से जुड़ाव आवश्यक है।

सरकार के पास चाहे जैसी भी योजनाएं हों पर बुनकर काम की खोज में शहरों का रुख कर रहे हैं और अक्सर वे अच्छे के लिए पारंपरिक दक्षता को भी त्याग दे रहे हैं।  शहर में मोमिन और उनके दोस्तों को अपना सपना पूरा करने में कामयाबी मिल भी सकती है और नहीं भी, लेकिन यह सच है कि बहुत सारे ऐसे बुनकर हैं जिन्हें दक्षता की आवश्यकता नहीं है, पर उनकी खोज-खबर लेने वाला कोई नहीं है। पारंपरिक दक्षता की जितनी ज्यादा अनदेखी होगी, उसका अस्तित्व समाप्त होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी।

Keyword: Weaver, IGNOU, Delhi, Ministry of Rural Development,
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