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जिरह: क्या एमऐंडए के लिए सेबी की सिफारिशें सही हैं?
कौशिक चटर्जी/के बालकृष्णन /  07 28, 2010

तरक्की के लिए अहम हैं विलय- अधिग्रहण

कौशिक चटर्जी, टाटा स्टील समूह के सीएफओ

विलय और अधिग्रहण (एमऐंडए) का सीधा ताल्लुक कारोबारी विकास की रणनीति को आगे बढ़ाने से है। इसके अलावा कॉर्पोरेट गवर्नेंस, व्यावहारिक वित्त, कॉर्पोरेट नियंत्रण, पूंजी और वित्तीय बाजार, वित्तीय रिपोर्टिंग, निवेशक संबंध और संचार जैसे मसले जुड़े होते हैं। मैं सेबी की अधिग्रहण नियमन सलाहकार समिति (टीआरएसी) का सदस्य हूं जिसने हाल ही में अधिग्रहण के मौजूदा नियमों की समीक्षा करते हुए कुछ बदलावों की सिफारिश की है।

बाजार नियामक की इस समिति ने भविष्य के मद्देनजर अपनी बात रखी है जिसमें अधिग्रहण के दौरान निवेशकों के हित पूरी तरह से सुरक्षित रहें। अधिग्रहण के लिए जो मसौदा तैयार किया गया है उसमें मुख्य ध्यान शेयरों की खरीद और कंपनी पर नियंत्रण पर दिया गया है। इसके अलावा कर, कंपनी कानून और पूंजी बाजार नियामक से जुड़े जैसे अन्य जटिल मसलों को भी आसान बनाने की कोशिश की गई।

दरअसल निवेशकों को भरोसा दिलाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि भविष्य में अधिग्रहण के लिए नियामक स्तर पर एक कारगर तंत्र मौजूद है। प्रस्तावित अधिग्रहण नियमन के लिए जो मसौदा पेश किया गया है वह अगले दशक में वक्त की कसौटी पर कसा जाएगा। भारत को अगर 9 फीसदी की दर से विकास करना है तो कॉर्पोरेट गवर्नेंस और नियामक स्तर पर वैश्विक मानदंडों के अनुरूप नियम बनने चाहिए जो देसी और विदेशी दोनों तरह के निवेश को लुभा सके।

देश की तरक्की और एक बेहद आकर्षक बाजार के इसके दर्जे को बरकरार रखने के लिए विलय और अधिग्रहण बेहद अहम भूमिका अदा करेंगे। इस लिहाज से विलय और अधिग्रहण के लिए सेबी की समिति ने जो सिफारिशें की हैं उन्हें इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए कि यह भविष्य में ऐसी गतिविधियों के लिए एक सक्षम ढांचा मुहैया कराएंगी।

समिति ने सबसे अहम सिफारिश खुली पेशकश को लेकर की है जिसे मौजूदा 15 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी किए जाने का प्रस्ताव है। यह सीमा भारत में एक दशक पहले तक तो जायज थी जब ज्यादातर कंपनियों कम हिस्सेदारी के साथ ही नियंत्रित होती थीं। समिति की सिफारिशों से कंपनी में हिस्सेदारी बेचने वालों और खरीदने वाले दोनों पक्षों को फायदा पहुंचेगा।

हालांकि इस बात को लेकर उंगलियां उठ रही हैं कि क्या भारतीय वित्तीय तंत्र इस तरह की जरूरतों के हिसाब से ढल पाएगा। इस पर मेरा मानना है कि न केवल ऐसा हो पाएगा बल्कि इससे भारतीय पूंजी बाजार कामयाबी के नए मानदंड स्थापित करेगा। मुझे उम्मीद है कि भारतीय रिजर्व बैंक भी इस मामले के लिए बैंकों को धन मुहैया कराने के लिए मंजूरी देगा क्योंकि यह कोई अटकलबाजी का मामला नहीं सेबी के नियमों के तहत निपटाई जाने वाली प्रक्रिया होगी। हालांकि इससे सेबी के ऊपर भी जिम्मेदारी कुछ ज्यादा बढ़ जाएगी।


छोटे शेयरधारकों का भी रखा जाए ख्याल

के बालकृष्णन, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक लाजार्ड इंडिया

वैश्विक स्तर के अनुभवों से यह बात साफ होती है कि एकीकरण के कारण क्षमता बढ़ती है, संसाधनों का उचित इस्तेमाल होता है और आखिरकार उपभोक्ताओं को भी इससे फायदा पहुंचता है। जैसे-जैसे भारतीय बाजार में वैश्विक आकर्षण बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे विलय और अधिग्रहण भी ज्यादा प्रासंगिक होते जा रहे हैं।

हाल ही में अधिग्रहण कोड विलय और अधिग्रहण में विलय और अधिग्रहण के लिए नई सिफारिशें की गई हैं। बाजार की बदलती दिशा के लिहाज से इसकी जरूरत भी है। अधिग्रहण कोड में जिन बदलावों की सिफारिश की गई वह एकदम सटीक हैं और बाजार की जरूरत के लिहाज से बेहतर नियामक ढांचे के मद्देनजर तैयार किए गए हैं। इसमें इस बात का ख्याल रखा गया है कि सभी निवेशकों के सभी स्तर पर हित सुरक्षित रहें।

इसमें दो अहम सिफारिश की गई हैं। एक तो इसमें मौजूदा 15 फीसदी के दायरे को बढ़ाकर 25 फीसदी किया गया है और दूसरा कि जिस कंपनी का अधिग्रहण करना है उसके पूरी तरह से अधिग्रहण के लिए खुली पेशकश लानी होगी। लेकिन क्या कम हिस्सेदारी रखने वाले के लिहाज से ये सिफारिशें न्यायसंगत हैं?

इसके मुताबिक अगर कोई अंशधारक या अंशधारकों का समूह बिना किसी खुली पेशकश के ही किसी सूचीबद्घ कंपनी में 24.99 फीसदी हिस्सेदारी हासिल कर सकता है। भारतीय कानूनों के तहत कुछ महत्वपूर्ण कंपनियों में किसी फैसले के लिए 75 फीसदी अंशधारकों की मंजूरी लेनी पड़ती है। ऐसे में 24.99 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले अंशधारक कंपनी के बड़े फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं।

ऐसे में यही सवाल उठता है कि क्या कम हिस्सेदारी रखने वाले के लिहाज से इस तरह के अधिकार सही हैं और क्या एक स्थायित्व वाले प्रबंधन के लिए ठीक हैं? इसी तरह से 15 फीसदी हिस्सेदारी के दायरे से भी हालात कितने अलग हैं। मैं कह सकता हूं कि मुश्किल हालात में इस तरह के प्रावधानों को नहीं माना जाना चाहिए। एक आक्रामक स्थिति में गलत इरादों वाला कोई भी अंशधारक अपने हित साधने लायक हिस्सेदारी हासिल कर सकता है।

इस लिहाज से 15 फीसदी या फिर 25 फीसदी की सीमा के क्या डराने का काम करेगी। इस बात को स्वीकार करने में गुरेज नहीं है कि वैश्विक बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कई मामलों में भारतीय कंपनियों पर बढ़त हासिल है।

खासतौर से उनके अपने देशों में अधिग्रहण के लिए जरूरी वित्त हासिल करने में उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं होती। ऐसे में छोटे अंशधारकों की कीमत पर उनके लिए अधिग्रहण की राह आसान बनाना कहां तक ठीक है। मेरे ख्याल से छोटे अंशधारकों के हितों का भी ख्याल रखा जाना चाहिए। कुल मिलाकर अगर वृहद परिप्रेक्ष्य में देखें तो सेबी की समिति की सिफारिशें कई मामलों में काफी बढिय़ा हैं जो अहम भूमिका अदा कर सकती हैं।

Keyword: SEBI, Merger and Acquisition, India,
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