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किसानों को होगा तकनीकी फायदा, बशर्ते मिले निजी क्षेत्र का सहारा
खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  July 27, 2010

वे दिन लद गए जब सार्वजनिक वित्त से पोषित कृषि अनुसंधान संगठन निजी क्षेत्र को वास्तव में अछूत मानते हुए उससे दूर रहा करते थे। अब स्थिति में बदलाव आ गया है और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) किसानों के इस्तेमाल के लिए तकनीक को फायदेमंद बनाने और इसमें सुधार लाने के वास्ते निजी क्षेत्र तक सोच समझकर पहुंचने की कोशिश कर रही है। एक तो नई आर्थिक वास्तविकता और बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) की व्यवस्था के कारण नजरिए में यह बदलाव आया है।

दूसरा यह महसूस किया जाने लगा कि पुरानी मानसिकता खेती में नई तकनीक के इस्तेमाल को रोक रही है जिससे खेती प्रभावित हो रही है।  विगत समय में ऊंची पैदावार वाले बीजों, (ब्रीडिंग संस्थान और सार्वजनिक क्षेत्र के बीज संस्थान बहुलीकरण और किसानों को वितरित करने के लिए उनका साझा करते थे) को छोड़कर ज्यादातर अन्य तकनीक किसानों या अन्य उपयोगकर्ताओं तक नहीं पहुंच पाते थे और अनुसंधान केंद्र तक ही सीमित रहते थे।

तकनीक के सृजन और अंतिम उपयोगकर्ताओं केबीच ऐसा अलगाव या वियोजन अन्य मामलों में भी समान रूप से हानिकारक साबित हुआ। उदाहरण के तौर पर, यह रिसर्च नेटवर्क को कृषि अनुसंधान एवं विकास (आरऐंडडी) पर किए गए निवेश पर किसी तरह का आर्थिक प्रतिफल पाने की अनुमति नहीं देता है, जो कि अन्यथा काफी ऊंचा होता है। वास्तव में ऐसे परिदृश्य में कोई भी लाभ हासिल करने वाला नहीं था, हर कोई नुकसान उठाने वाला था।

एक ओर जहां तकनीक का विकास करने वाले अपनी वैज्ञानिक कामयाबी पर मानसिक संतोष भी नहीं पा सके क्योंकि यह बिना इस्तेमाल केपड़ी रही। किसानों को भी इसका लाभ नहीं मिल पाया, जो कि उन्हें इन तकनीकों का इस्तेमाल करने पर मिल सकता था। इन तकनीकों के विकास में बड़ी लागत और काफी ज्यादा प्रयास किए गए थे। इसकी जड़ में थी सार्वजनिक वित्त के जरिए पोषित होने वाले आईसीएआर के तहत अनुसंधान संगठन की अनिवार्यता, जो कि उन्हें अपने शोध के नतीजों से किसी तरह का लाभ कमाने से रोकती है।

अब यह बदल गया है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की भागीदारी अब अत्यावश्यक मानी जाती है, न सिर्फ प्रभावी तकनीक के हस्तांतरण के लिए बल्कि सहयोगपूर्ण, समस्या के निदान और जरूरत आधारित शोध के लिए। आईसीएआर के सहायक महानिदेशक (आईपीआर मैनेजमेंट) एस. मौर्या के मुताबिक, आईसीएआर व्यवस्था के तहत विकसित बीजों की नई किस्मों के उत्पादन में सार्वजनिक संगठनों के अतिरिक्त निजी क्षेत्र की बीज कंपनियों को शामिल कर इसकी शुरुआत की गई। ब्रीडर्स के बीज के बहुलीकरण के लिए बीज कंपनियों के पास इसे भेजा गया और यह काम उसे उन्हीं सेवा शर्तों के हिसाब से करना था जो कि सार्वजनिक क्षेत्र के बीज उत्पादकों के लिए लागू था।

इसके परिणामस्वरूप किसानों के लिए बीजों की उपलब्धता बढ़ गईऔर इससे निजी क्षेत्र के बीज उद्योग को विकास में मदद मिली। साल 2006 में आईसीएआर निजी क्षेत्र के सहयोगियों को अन्य तरह की तकनीक के हस्तांतरण के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश के साथ सामने आया, जो कि आईपीआर के नियमों के समानुरूप था। ऐसी तकनीक के हस्तांतरण में कंपनियों द्वारा रॉयल्टी का भुगतान शामिल था, जिसने वाणिज्यीकरण के लिए आईसीएआर की तकनीक ली थी। इस रॉयल्टी को तकनीक का विकास करने वाले वैज्ञानिकों के साथ साझा किया गया, जो कि उन्हें प्रोत्साहन के तौर पर दिया गया।

शोध संस्थानों और उनकेवैज्ञानिकों को परामर्श देने का काम हाथ में लेने की अनुमति दी गई। निजी क्षेत्र केसाथ ऐसी साझेदारी करने के लिए आईसीएआर ने तकनीक के हस्तांतरण व विकास की खातिर बिजनेस मॉडल को क्रियान्वित करने के लिए सर्वोच्च, क्षेत्रीय और संस्थान केस्तर पर त्रिस्तरीय व्यवस्था की। ऐसी तथाकथित तकनीक प्रबंधन व कारोबारी योजना व विकास इकाइयों में एमबीए डिग्रीधारकों को पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी को आगे बढऩे के लिए साधन व तरीके खोजने की खातिर शामिल किया गया। वैज्ञानिकों को भी आईपीआर के मुद्दों पर प्रशिक्षण के जरिए जोखिम उठाने को कहा गया।

इन कदमों को आवश्यक माना गया क्योंकि शोध संस्थानों या वैज्ञानिकों को व्यक्तिगत रूप से कारोबारी समझौते से संबंधित बातचीत का कोई अनुभव नहीं था। इसके अलावा, संभावित उद्यमियों और निवेशकों ने उन लोगों के साथ समझौता करना सुविधाजनक पाया जिन्हें खास तौर से इस काम में लगाया गया था। इस दिशा में एक और महत्त्वपूर्ण कदम इस हफ्ते दिल्ली में आईसीएआर-उद्योगों की बैठक के आयोजन के जरिए उठाया गया, जहां वाणिज्यीकरण के लिए तैयार तकनीकों को उद्योगों केप्रतिनिधियों सामने पेश किया जाएगा। साथ ही उनकी राय भी हासिल की जाएगी कि और पब्लिक-प्राइवेट सहयोग और ज्यादा क्षेत्रों में किस तरह बढ़ाया जा सकता है।

इस पर टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है कि पेशकश के लिए आईसीएआर के पास मौजूद तकनीक आज पूरी तरह विशाखित हैं। ये तकनीक बीज व प्लांटिंग मैटीरियल, वैक्सीन, निदान व जैव तकनीकी उत्पादों, कटाई के बाद इस्तेमाल होने वाली तकनीक और वैल्यू एडिशन, फार्म इम्प्लीमेंट और मशीनरी। तत्काल हस्तांतरण के लिए चुनी हुई तकनीक के बारे में कहा जाता है कि इसकी वाणिज्यिक क्षमता का आकलन पहले ही किया जा चुका है।

कृषि क्षेत्र से जुड़े सभी हितधारकों के लाभ के लिए यह पहल आईसीएआर-उद्योग के विस्तृत सहयोग के लिए लॉन्च पैड की तरह साबित हो सकता है। आईसीएआर तकनीक का उद्योगों की तरफ प्रवाह और इसके बाद तकनीक का किसानों तक पहुंचने के अलावा, कृषि अनुसंधान में यह निजी निवेश को प्रोत्साहित कर सकता है और वह भी उद्योगों द्वारा प्रायोजित किसी खास विषय पर, जो उद्योगों के हित में हो।

Keyword: ICAR, IPR, R&D,,
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