बिजनेस स्टैंडर्ड - सीएसआर पर नए सिरे से गौर करने की दरकार
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सीएसआर पर नए सिरे से गौर करने की दरकार
जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  July 22, 2010

कुछ साल पहले एक पेय पदार्थ विनिर्माता अपने उत्पादों के सुरक्षित होने पर संदेह किए जाने से विवाद के घेरे में आ गई थी। ऐसे में उसके एक अधिकारी ने  सलाह दी थी कि कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) से जुड़ी गतिविधियां पूर्वी दिल्ली में चलाई जाएं जहां राजधानी के अधिकतर पत्रकार रहा करते थे। ऐसा करने का मकसद यह था कि इस काम का अधिक से अधिक प्रभाव हो सके।
 
बाद में इसके कॉरपोरेट कम्युनिकेशन प्रमुख ने बेंगलुरु की यात्रा की और उदासीन मीडिया में जोश भरने की खातिर शहर के विभिन्न हिस्सों में कूड़ेदान लगाने के अपने अभियान के बारे में बताया।पश्चिमी भारत में एक कंपनी बड़ी फैक्टरी स्थापित कर रही थी, वहां राज्य सरकार ने उसे आदेश दिया था कि इस वजह से जंगल की हुई कटाई की भरपाई वह एक खास इलाके में पौधे लगाकर करेगी। कंपनी ने आंतरिक प्रगति रिपोर्ट को अपनी सालाना सीएसआर में जोड़ दिया था और इसमें किसी खास समयावधि में लगाए गए पौधों और सावधानीपूर्वक तैयार किए गए लक्ष्य व कामयाबियों का जिक्र किया गया था।
 
इस रिपोर्ट का एक वाक्य दिलचस्प था : इसमें कहा गया था कि जितने पौधे लगाए गए थे उनमें से आधे जीवित नहीं रह पाए। हालांकि इस पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी कि नाकामियों की ऐसी ऊंची दर का उपचार किए जाने की दरकार है या नहीं। ये घटनाएं उस समय से चली आ रही हैं जब से भारत में सीएसआर की अवधारणा शुरू हुई थी। जैसा कि ऊपर के उदाहरणों से पता चलता है कि इसके नतीजों से संकेत मिलता है कि कुछ कंपनियों ने इस शब्दावली के वास्तविक निहितार्थ को पूरी तरह समझ लिया था। 

इस हफ्ते की शुरुआत में ऐसा ही सबूत मिला जब समाचार कक्षों को भारत में मौजूद सात बहुराष्ट्रीय फूड कॉरपोरेशन की संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति प्राप्त हुई। इसमें बच्चों के लिए विपणन की जिम्मेदारी की खातिर एकसमान वादे की घोषणा की गई थी। इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कोका-कोला इंडिया, जनरल मिल्स इंडिया, केलॉग इंडिया, नेस्ले इंडिया, मार्स इंटरनैशनल, पेप्सीको और हिंदुस्तान यूनिलीवर शामिल थीं। 'इंडिया प्लेज' के नाम से जाने जाने वाला उनका यह संकल्प 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए खाद्य व पेय उत्पादों को टेलीविजन या प्रिंट या इंटरनेट या प्राथमिक विद्यालयों में विज्ञापित न करने के बारे में था। (अपवाद के तौर पर वे उत्पाद जो वैज्ञानिक तौर पर पोषण आधारित मानदंड में हों, स्वीकार्य राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देशों को पूरा करते हों या संबंधित स्कूल या संस्थान द्वारा इस बाबत खास तौर से निवेदन किया गया हो)। सातों कंपनियां 11 जनवरी से स्वतंत्र रूप से कार्यान्यन पर निगरानी अध्ययन भी करेंगी।

प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया था कि यह कवायद इसी तरह की अंतरराष्ट्रीय पहल के मुताबिक है। विज्ञापन के मामले में स्वत: नियमन वाली संहिता में इसे शामिल किया गया है, जो कि एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा बनाई गई है।उद्योगों का स्वत: विनियमन प्रशंसायोग्य और वांछनीय दोनों है। वास्तव में, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसे कारोबार में यह चमत्कार पैदा कर देगा। लेकिन यह प्रेस विज्ञप्ति कई वजहों से ध्यान देने लायक थी। पहली वास्तविकता यह थी कि ये कंपनियां मीडिया को बयान जारी करने के लिए अपने आपको विवश पा रही थीं। 

संवाद का अभिप्राय यह है कि सहज भाव से इन कंपनियों के सामाजिक उत्तरदायित्व पर ध्यान केंद्रित करने के लिए ऐसा किया गया था। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पहल इस तरह के प्रचार को न्यायसंगत ठहराती है। क्या इन कंपनियों को बच्चों के सामने जंक फूड व पेय पदार्थों को प्रचारित करने से हमेशा परहेज नहीं करना चाहिए? इस मायने में यह संयुक्त बयान बताता है कि भारत में सीएसआर अब तक परोपकार व अच्छे कामों की सतह से आगे नहीं बढ़ पाया है।
 
सीएसआर के दिशा-निर्देशों पर डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक एंटरप्राइजेज की प्रस्तुति के मुकाबले में यह अनजाने में की गई अभिव्यक्ति से ज्यादा और कुछ नहीं है। ये दिशा-निर्देश सरकारी कपनियों के लिए पिछले साल दिसंबर में पेश किए गए थे। सरकारी कामकाज के तरीके के लिए यह सच है, दिशा-निर्देश खास तौर पर बताते हैं कि इन सरकारी कंपनियों को सीएसआर के बजट के लिए कितनी रकम अलग रखनी चाहिए (लाभ का प्रतिशत जो कि उसके आकार पर निर्भर करता है)। हालांकि इसके क्रियान्वयन की बाबत खास तौर से बताया जाता है कि ऐसी गतिविधियां विशेषीकृत एजेंसियों के जरिए करवाई जानी चाहिए (एनजीओ, ट्रस्ट, मिशन आदि), न कि सीपीएसई कर्मचारियों के द्वारा।

यह वास्तव में उस अवधारणा से काफी दूर ले जाता है जब पहली बार 1970 के दशक में इसने अमेरिका में लोकप्रियता हासिल की। यह उस सुझाव से काफी दूर है कि कंपनियां अपने साख को अच्छे कामों में निवेश के जरिए भुनाती है, इस अवधारणा का वास्तव में मतलब यह है कि कंपनियों को अपने संचालन के प्रति जिम्मेदार होने की दरकार है। जैसा कि जनसंपर्क उद्योग के गुरु हेरॉल्ड बर्सन ने 1973 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी ग्रैजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस में भाषण देते हुए कहा था कि कंपनी का पहला कर्तव्य अपनी गतिविधियों व लाभदायकता के प्रबंधन करने का है। 

यह सबसे बड़ी सेवा है, जिसका यह प्रदर्शन कर सकता है...। इसका कर्तव्य यह भी है कि कार्य के लिए अनुकूल वातावरण बनाए और वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन इस तरह से करे कि सुरक्षा व विश्वसनीयता के मानदंडों को पूरा करे। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि अच्छा प्रबंधन सभी सामाजिक तकलीफों का जवाब है। लेकिन मैं यह कह रहा हूं कि कमजोर प्रबंधन वाली कंपनी अपनी कमियों की भरपाई अच्छे समझौते के साथ नहीं कर सकती, जिसका कि इसके रोजाना के संचालन से अभिप्राय न हो। संक्षेप में, सीएसआर को कंपनियों के संचालन दर्शन से जोड़े जाने की दरकार है। इसके अलावा कोई भी चीज सिर्फ अतिरिक्त चीज है।

Keyword: CSR, Corporate communication, Multinational Companies,
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