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खराब विचार को दफन करें
संपादकीय /  July 22, 2010

क्या वित्त मंत्रालय अहं के रास्ते पर है? जिस तरह से इसके अधिकारी पर्याप्त संदेह जाहिर किए जाने के बाद भी दृढ़ निश्चय के साथ खराब विचार को आगे बढ़ाते हुए नजर आ रहे हैं, उससे तो यही लगता है। यह अखबार पहले ही यूलिप के अधिकार क्षेत्र से जुड़े मुद्दे पर 18 जून को राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी किए जाने के तरीके और इसके पीछे की मंशा पर सवाल उठा चुका है।
 
नियामकों के अधिकार आपस में टकराने से जुड़े सवालों से निपटने के लिए वित्त मंत्रालय ने रिजर्व बैंक समेत वित्तीय क्षेत्र के विभिन्न नियामकों के सापेक्ष खुद को नई शक्ति से लैस कर लिया। सरकार के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण काम यह होता कि वह इस संबंध में की गई टिप्पणियों पर ध्यानपूर्वक गौर करती, विधेयक के मसौदे को वित्त से संबद्ध संसद की स्थायी समिति केपास भेजती और केंद्रीय बैंक के अधिकार व स्वायत्तता से जुड़े मुद्दों का उचित रूप से निपटारा करती। 

केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने मौखिक आश्वासन दिया है कि सरकार रिजर्व बैंक का दर्जा कम करने के लिए कुछ नहीं करेगी। लेकिन इस आश्वासन का मतलब तब होता जब सरकार अध्यादेश पर फिर से गौर करने की पेशकश करती। दो महत्त्वपूर्ण मुद्दे दांव पर लगे हुए हैं। पहला, वित्त मंत्री के संयुक्त समिति की अध्यक्षता करने से केंद्रीय बैंक के गवर्नर की हैसियत एकदम बदल जाएगी। इस समिति में केंद्रीय वित्त मंत्रालय के विभिन्न सचिवों, आईआरडीए व सेबी और पेंशन फंड (पीएफआरडीए) के चेयरमैन और आरबीआई गवर्नर को शामिल किया जाना है। 

समिति को मुद्रा बाजार के निवेश के अवयव वाले या प्रतिभूति बाजार के उपकरण या बीमा के अवयव वाले या कोई अन्य हाइब्रिड प्रॉडक्ट या कंपोजिट इंस्ट्रूमेंट के अधिकार क्षेत्र के मुद्दों का निपटारा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन सभी उत्पादों की देखरेख आरबीआई, आईआरडीए, सेबी या पीएफआरडीए करता है। इसका मतलब यह होगा कि वित्त मंत्रालय इन मुद्दों पर निर्णायक फैसला करेगा। यह अच्छा विचार नहीं है (ऐसा इसलिए क्योंकि इन संस्थानों के प्रमुख भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व सदस्य होंगे)। इस संयुक्त समिति का चेयरमैन आरबीआई गवर्नर को बनाना सबसे अच्छा तरीका होता। 

एक ओर जहां यह गवर्नर के ओहदे को बराबरी पर ला देगा, वहीं वित्त मंत्रालय को इसके दो वरिष्ठ सचिवों के जरिए अपनी राय जाहिर करने की अनुमति भी देगा और संबद्ध पक्ष उनकी राय पूरे सम्मान के साथ सुनेंगे। दूसरा, यह विचार गलत है कि सरकारी मशीनरी के जरिए अंतर-नियामक संस्थान का समन्वय किया जा सकता है। नियामकों के बीच मतभेद बढऩा और अधिकार क्षेत्र का मुद्दा उठना भी तय है। अच्छा तरीका यह होगा कि अधिकार क्षेत्र को बेहतर तरीके से स्पष्ट कर दिया जाए, जैसा कि यूलिप के मामले में किया गया और आरबीआई गवर्नर की अध्यक्षता में नियामकों को अपने अनुभव व बुद्धिमत्ता के मुताबिक इन मतभेदों को दूर करने के लिए छोड़ दिया जाए।
 
इसमें वित्त मंत्रालय को शामिल करने से यह न सिर्फ प्रक्रिया को राजनीतिक रंग देगा बल्कि सभी तरह की बहस की गुंजाइश को समाप्त भी कर देगा। किसी मुद्दे पर वित्त मंत्री का शब्द आखिरी होता है। संस्थागत स्वायत्तता के मुद्दे पर मंत्री के अधिकारों के खुले प्रदर्शन से आर्थिक प्रशासन पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

Keyword: Finance ministry, ULIP, RBI, PFRDA,,
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