बिजनेस स्टैंडर्ड - दूरसंचार क्षेत्र में मुकेश की वापसी
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दूरसंचार क्षेत्र में मुकेश की वापसी
मुकेश अंबानी दूरसंचार कारोबार में वापसी कर रहे हैं और उन्होंने वायरलेस ब्रॉडबैंड के क्षेत्र में ध्यान केंद्रित किया हुआ है।
सुरजीत दास गुप्ता /  July 12, 2010

हालांकि मुकेश अंबानी ने कहा है कि वह दूसरी पीढ़ी या तीसरी पीढ़ी (2जी या 3जी) नेटवर्क हासिल करने की फिराक में नहीं हैं, लेकिन ज्यादातर प्रतिस्पद्र्घी कंपनियों का कहना है कि यदि वे दूरसंचार क्षेत्र में बड़ा दखल चाहते हैं तो उनके पास कोई और विकल्प नहीं है।वर्ष 2002 में, जब मुकेश अंबानी ने सीडीएमए प्लेटफॉर्म पर मोबाइल और फिक्स्ड-लाइन की दूरसंचार सेवाएं लॉन्च की थीं तब ऐसा माना जा रहा था कि वे इस कारोबार की नई इबारत लिखेंगे।

अपने प्रतिद्वंद्वियों के विपरीत जो वॉयस कॉल के माध्यम से आमदनी बढ़ाने की कोशिश में थे, उनकी रणनीति डाटा ट्रैफिक के बाजार में दखल बढ़ाने की रही। उन्होंने फैसला किया कि वे ग्राहकों को घर पर ही तेज गति वाला इंटरनेट एक्सेस की पेशकश करेंगे। इसके साथ ही उन्होंने उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता वाले वीडियो या संगीत डाउनलोड करने की आजादी दी, वह भी तकरीबन 500 रुपये प्रति महीने की सस्ती दर पर।

उनके लक्ष्य महत्वाकांक्षी थे: अगले 5 वर्षों में रिलायंस इन्फोकॉम की कुल आमदनी की कम-से-कम 40 फीसदी मोबाइल एवं ब्रॉडबैंड से और मोबाइल फोन से होने वाली कम-से-कम 25 फीसदी आमदनी डाटा ट्रांसफर के कारोबार से आनी चाहिए। बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था, 'हम डाटा कारोबार के बारे में काफी उत्साहित हैं। हमें उम्मीद है कि यदि हम ग्राहकों को उनके घर पर और दफ्तरों में उचित मूल्य पर सेवाएं मुहैया कराएं तो इस बाजार में उछाल आ सकती है।

लेकिन वैश्विक स्तर पर डाटा ट्रांसफर कारोबार में भारत के परचम लहराने का उनका सपना असफल हो गया। वर्ष 2005 में अंबानी बंधु अलग हो गए और मुकेश अंबानी को रिलायंस इन्फोकॉम की कमान छोटे भाई अनिल अंबानी को सौंपनी पड़ी (अब इसे रिलायंस कम्युनिकेशंस के नाम से जाना जाता है)। तब मुकेश ने वादा किया था कि वह दूरसंचार कारोबार में दोबारा कभी नहीं उतरेंगे।

बहरहाल, भारती एयरटेल, वोडाफोन और टाटा टेलीसर्विसेज जैसी दूरसंचार क्षेत्र की बड़ी कंपनियां वॉयस कॉल के कारोबार पर जोर दे रही हैं। दरें फिलहाल दुनिया भर के तमाम बाजारों में दरों की तुलना में सबसे निचले स्तर पर हैं और डाटा ट्रांसफर का कारोबार कहीं पीछे छूट गया है। हालत यह है कि देश में फिलहाल 60 करोड़ से अधिक मोबाइल फोन के उपभोक्ता हैं, लेकिन इस उद्योग से होने वाली कुल कमाई का महज 10 फीसदी हिस्सा गैर-डाटा कारोबार से आता है और उसमें सबसे बड़ा हिस्सा एसएमएस का है। एमटीएनएल (मुंबई एवं दिल्ली) और बीएसएनएल (शेष भारत) की असमर्थता की वजह से देश में ब्रॉडबैंड की पहुंच महज 1 फीसदी ही हो पाई है, जिसके केवल 90 लाख उपभोक्ता हैं। जाहिर है इस क्षेत्र के बाजार के बहुत बड़े हिस्से का दोहन फिलहाल बाकी है।

लेकिन पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान वक्त का पहिया तेजी से घूमा है। अंबानी बंधुओं ने आपस में समझौता कर लिया और मुकेश अंबानी को एक बार फिर डाटा-आधारित दूरसंचार सेवाओं के क्षेत्र में अपने पुराने सपने को पूरा करने की आजादी मिल गई। उन्होंने हाल ही में महेंद्र नाहटा की कंपनी इन्फोटेल में 95 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीद ली है। यह एकमात्र ऐसी कंपनी है, जिसके पास ब्रॉडबैंड वायरलेस एक्सेस (बीडब्ल्यूए) स्पेक्ट्रम है- यह एक ऐसी तकनीक है जो देश के तमाम 22 दूरसंचार सर्किलों के ग्राहकों को तेज गति वाली वायरलेस ब्रॉडबैंड सेवाओं की पेशकश करती है।

इन्फोटेल ने यह स्पेक्ट्रम हासिल करने के लिए एक बोली के तहत 12,847 करोड़ रुपये की राशि चुकाई थी। तो इस कारोबार में दूसरी पारी के लिए कौन सी रणनीति अपनाई जाएगी? मुकेश अंबानी और उनसे जुड़े लोग फिलहाल इस बारे में आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कह रहे हैं, लेकिन आंतरिक हलचलें, विश्लेषकों और वेंडरों के साथ चर्चा और प्रमुख कार्यकारियों के साथ हुई बड़ी बैठकों से भावी रणनीति के संकेत मिल रहे हैं। निश्चित रूप से पिछले 5 वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है। अब हरेक सर्किल में 9 से ज्यादा ऑपरेटरों की मौजूदगी (वर्ष 2006 में केवल चार या पांच ऑरेटर थे) है और वॉयस दरें इतने निचले स्तर पर हैं कि यह सेवा अब कमोडिटी बन गई है। इस वजह से सेवा प्रदाता कंपनियों का मुनाफा गिर गया है।

अब यह समझा जाने लगा है कि डाटा ही एक ऐसा साधन है जिससे इस मुश्किल से उबरने में मदद मिल सकती है। इससे यह साबित होता है कि हाल ही में संपन्न हुई तीसरी पीढ़ी (3जी) के स्पेक्ट्रम की नीलामी में इतनी जोरआजमाइश क्यों हुई। अब तो बड़े शहरों में मोबाइल फोन की पहुंच तकरीबन 100 फीसदी हो चुकी है। ऐसे में इस क्षेत्र की कंपनियों के लिए आमदनी बढ़ाने और बनाए रखने के वास्ते डाटा की अहमियत बढ़ गई है। अब ऐपल आईपैड जैसे डिवाइस इस बाजार के विस्तार को गति देंगे।

वॉयस पर डाटा
स्पष्टï है कि दूरसंचार सेवाओं से जुड़ी कंपनियों के लिए वायरलेस ब्रॉडबैंड भविष्य की रणनीति बन गई है। और यही वह क्षेत्र है, जहां मुकेश अंबानी अपनी मजबूत दखल सुनिश्चित करने की कोशिश में हैं। विश्लेषकों के लिए तैयार की गई एक खास प्रस्तुति में मुकेश अंबानी के मातहतों ने कहा है कि चीन में 13 करोड़ से ज्यादा ब्रॉडबैंड ग्राहक हैं, भारत इस स्तर तक अगले तीन से चार वर्षों में पहुंच सकता है और वे इस बाजार में सबसे बड़ी हिस्सेदारी की इच्छा रखते हैं। वे ग्राहकों को डाटा की अतुलनीय गति की पेशकश से उनका रुख अपनी ओर मोड़ सकते हैं।

इसमें मुश्किल नहीं आनी चाहिए क्योंकि फिलहाल केवल 5 फीसदी मोबाइल फोन उपभोक्ता ब्रॉडबैंड वायरलेस इस्तेमाल करते हैं। उनके दावे में दम है। उनके पास बीडब्ल्यूए में 20 मेगाहट्र्ज की अतुलनीय स्पेक्ट्रम परिसंपत्ति है, जबकि 3जी की क्षमता केवल 5 मेगाहट्र्ज है। मतलब यह है कि इन्फोटेल ग्राहकों को 3जी प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में ज्यादा तेज गति वाले एप्लीकेशन की पेशकश कर सकती है। ग्राहकों को इससे 3जी की तुलना में डाटा की 5 से 7 गुनी ज्यादा तेज गति मिल सकती है।
3जी स्पेक्ट्रम के लिए सफल बोली लगाने वाली एक अग्रणी मोबाइल सेवा ऑपरेटर के एक वरिष्ठ कार्यकारी कहते हैं, 'यदि आप डाटा की बात करते हैं तो बीडब्ल्यूए इस मामले में बहुत आगे है। लेकिन वॉयस सेवा के मामले में इसकी क्षमता का आकलन फिलहाल बाकी है और भारत इस कारोबार का बहुत बड़ा बाजार है।

लेकिन विश्लेषकों और विशेषज्ञों का कहना है कि मुकेश अंबानी ने बिलकुल सही समय पर कदम बढ़ाया है। कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग के विश्लेषक हरित शाह कहते हैं, 'डाटा मार्केट फिलहाल प्रारंभिक अवस्था में है। वॉयस अब भी आमदनी का बड़ा जरिया है, लेकिन डाटा के लिए बड़ी मांग है और इस मांग के स्तर पर खरा उतरने से निश्चित रुप से सफलता हासिल होगी। शाह उम्मीद जताते हैं कि शुरुआती तौर पर मुकेश अंबानी खुदरा बाजार में नहीं उतरेंगे, वे एंटरप्राइज मार्केट से शुरुआत करेंगे।

इस मामले में इन्फोटेल ने बाजार की नब्ज पकड़ ली है- ऐसे छोटे कारोबार जो अपने कर्मचारियों को जोडऩे की जुगत में हैं, खुदरा बाजार जो करोड़ों घरों को जोडऩे और मोबाइल के माध्यम से सेवाएं मुहैया कराने की फिराक में हैं और ग्रामीण बाजार, जो ब्रॉडबैंड के लिए महंगे केबल का बोझ वहन नहीं कर सकते। प्रोटिविटी कंसल्टिंग के कंट्री हेड मृत्युंजय कपूर कहते हैं, 'लाइसेंस की लागत को ध्यान में रखते हुए जो रणनीति तैयार की गई है, उससे एक ऐसा मॉडल बनेगा जिससे ग्राहकों की एक बड़ी
संख्या आकर्षित होगी।

ज्यादातर विशेषज्ञों का कहना है कि मुकेश अंबानी ने वाईमैक्स (एक वैकल्पिक प्रौद्योगिकी, जिसका इस्तेमाल वे मध्यावधि के लिए कर सकते थे) के बजाए दीर्घकालिक प्रौद्योगिकी (एलटीई) का रास्ता चुना है। गति की तुलना करें तो फिलहाल टाटा टेलीसर्विसेज जैसी कंपनियां ग्राहकों को जो सेवाएं मुहैया करा रही हैं, उनसे केवल 3 मेगाबाइट प्रति सेकंड की गति से डाटा ट्रांसफर होता है, 3जी सेवाएं 14-20 मेगाबाइट प्रति सेकंड और चौथी पीढ़ी यानी 4जी से 80-100 मेगावॉट प्रति सेकंड की गति मिलती है। यह प्रौद्योगिकी बिलकुल नई है। इसकी वाणिज्यिक स्थापना हाल ही में टेलिया सोनेरा ने स्पेन में की है, वह भी कुछ ही शहरों में।

वेंडरों का कहना है कि शुरुआत में एलटीई पर तेज गति केवल डोंगल (टाटा फोटॉन की तरह) के माध्यम से हासिल की जा सकेगी, जिसका मतलब है कि आपको या तो लैपटॉप रखना होगा या फिर घर पर फिक्स्ड वायरलेस कनेक्शन की व्यवस्था करनी होगी। लेकिन इसके लिए मोबाइल डिवाइस बाजार में अगले वर्ष तक उपलब्ध हो पाएंगे, जो 2जी, 3जी और एलटीई नेटवर्क पर काम कर सकेंगे। इस स्तर पर हैंडसेट के आने में 2 वर्ष तक लग सकते हैं। यानी फिलहाल तो इस तरह के हैंडसेट न तो सस्ते हैं और न ही ये इन तकनीकों पर पूरी तरह खरे उतरेंगे। एंट्री लेबल के ऐसे उपकरणों की कीमत 200 से 300 डॉलर के बीच रहने की उम्मीद जताई जा रही है।

वॉयस के स्तर पर क्या होगा?
लेकिन क्या मुकेश अंबानी वॉयस कनेक्टिविटी की पेशकश नहीं करेंगे? हां उन्होंने कहा है कि वे इंटरनेट प्रोटोकॉल या नेट टेलीफोनी की पेशकश करेंगे। लेकिन यह सेवा फिलहाल वर्तमान नियामक ढांचे के तहत है और उनके ब्रॉडबैंड वायरलेस नेटवर्क पर ग्राहकों को सीमित मात्रा में उपलब्ध होगी। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि नेट टेलीफोनी कुछ पर्सनल कंप्यूटर के सीमित नेटवर्क पर होता है। आप अपने नेटवर्क से बाहर किसी व्यक्ति को इस तरीके से फोन नहीं कर सकते। लेकिन जैसा कि विश्लेषक कहते हैं, नियम बदलते रहते हैं।

यह सही है कि मुकेश अंबानी ने कहा है कि वे दूसरी पीढ़ी या तीसरी पीढ़ी के नेटवर्क हासिल करने की फिराक में नहीं हैं, फिर भी अधिकांश  प्रतिस्पद्र्घी कंपनियों को कोई और विकल्प नजर नहीं आ रहा है। लेकिन विकल्प हैं। एक विकल्प तो यह है कि शुरुआती तौर पर मुकेश अंबानी ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए डाटा सर्विस के साथ मुफ्ट नेट टेलीफोनी मिनटों की पेशकश कर सकते हैं, खास तौर पर छोटे स्तर के क्षेत्रों में। दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि वे थोक में क्षमता खरीदकर वर्चुअल नेटवर्क तैयार कर सकते हैं और इसे अपने ब्रांड के तहत बेच सकते हैं। और तीसरे विकल्प के तौर पर वे एलटीई सेवाओं के साथ 3जी की पेशकश करने के लिए किसी 3जी ऑपरेटर के साथ रोमिंग एग्रीमेंट कर सकते हैं।

मुकेश अंबानी नेटवर्क स्थापना की लागत कम रखने पर जोर देंगे। दूरसंचार विशेषज्ञ महेश उप्पल कहते हैं: मुकेश अंबानी जिस एलटीई का चुनाव कर रहे हैं, उसे इस प्रौद्योगिकी के भारत में विकास के रूप में देखा जाएगा। वस्तुस्थिति यह है कि उन्होंने बड़ी अच्छी परिसंपत्ति खरीदी है जिसके लिए उन्होंने बड़ी कीमत चुकाई है, लेकिन इसका वास्तविक आकलन केवल समय आने पर ही हो सकेगा। उनका कहना है कि मुकेश अंबानी इस बात से वाकिफ हैं कि उनकी रणनीति के समक्ष किस तरह की चुनौतियां पेश आने वाली हैं।

उन्हें पता है कि  3जी नेटवर्क की वजह से इसकी उम्मीद कम ही है कि वे प्रतिस्पद्र्घा किए बगैर इस बाजार में दखल बढ़ा सकेंगे। हो सकता है कि मौजूदा कंपनियों के पास बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम न हो, लेकिन डाटा सेवाओं के लिए 3जी पर उनकी निर्भरता आम लोगों के बाजार के लिए पर्याप्त गति मुहैया करा सकती है। संभव है कि वॉयस बाजार की तरह ही डाटा बाजार में भी गलाकाट प्रतिस्पद्र्घा देखने को मिले।    

(साथ में कात्या नायडू)

Keyword: Mukesh Ambani, 2G, 3G, BWA, LTI,,
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