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जिरह: क्या केंद्र ही निपटे नक्सलियों से?
विजयरामा राव/मनीष तिवारी /  July 08, 2010

राज्यों के साथ तालमेल जरूरी

विजयरामा राव पूर्व निदेशक, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो

यह सही है कि नक्सलवाद की समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार की ओर से पर्याप्त धन और अद्र्घसैनिक बलों के लिए उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित किए जाने के साथ-साथ राज्यों के साथ समन्वय स्थापित करने की जरूरत है, लेकिन जमीनी स्तर पर जो तैयारी की जानी है उसमें राज्य सरकारों की अहम भूमिका होनी चाहिए।

वर्ष 1946 से लेकर अब तक देश में किसी न किसी रूप में नक्सलवाद की समस्या रही है, हालांकि इसके पहले और दूसरे चरण के बीच 15-20 वर्षों का अंतर रहा है। पहले चरण में तत्कालीन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने सत्ता हथियाने के लिए हैदराबाद के निजाम के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को कृषि आंदोलन का रूप दे दिया। लेकिन ऐसा कहना ठीक नहीं होगा कि इस आंदोलन का मौजूदा स्वरूप बिलकुल बदल गया है।

पुलिस थानों पर हमले, छापामार युद्घ और सशस्त्र भूमिगत लड़ाके तैयार करने जैसी गतिविधियों में माओवादी पहले भी लिप्त थे। वर्ष 1948 में हैदराबाद के मुक्त हो जाने के बाद भी वर्ष 1952 तक भाकपा का संघर्ष जारी रहा। 15 वर्षों के अंतराल के बाद एक बार फिर नक्सल आंदोलन सक्रिय हुआ और अब यह कई दूसरे राज्यों में भी अपनी जड़ें जमा चुका है।

इसके फैलने की कई वजहें रहीं, जिनमें तंत्र का विफल होना, गरीबों और अमीरों के बीच बढ़ती हुई खाई, राज्य की ओर से सेवाओं की आपूर्ति नहीं हो पाना और विशेषकर ग्रामीण इलाकों से राजनैतिक नेतृत्व की दूरी शामिल है। चूंकि कानून-व्यवस्था राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र का मसला है इसलिए राज्यों की सीमाएं नक्सलवाद के फलने-फूलने के लिए उर्वर जमीन साबित होती हैं क्योंकि वहां कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी विवादास्पद होती है।

इस परिदृश्य में सेवाओं की आपूर्ति, आर्थिक गैर-बराबरी एवं कानून-व्यवस्था की समस्या से निपटने की जिम्मेदारी राज्यों की बनती है। हालांकि इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए नीतिगत ढांचा तैयार करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है, लेकिन कानून-व्यवस्था के अलावा सामाजिक-आर्थिक मसले सुलझाने का काम राज्य सरकारों का है।


राज्यों को बढ़ानी चाहिए क्षमता

मनीष तिवारी प्रवक्ता, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी

यह कहना खतरनाक होगा कि आंतरिक सुरक्षा से निपटने के लिए केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के विकल्प के तौर पर काम करना चाहिए। यदि राज्य सरकारें इस चुनौती से निपटने में सक्षम नहीं हैं, तो उन्हें नए सिरे से चुनाव कराने की पहल करनी चाहिए। भारत में लिखित संवैधानिक ढांचा है, जिसमें कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को दी गई है।

यह पहली दफा नहीं है, जब देश आंतरिक सुरक्षा की चुनौती का सामना कर रहा है। पहले भी उत्तर-पूर्व और उत्तर-पश्चिम के राज्यों ने आंतरिक सुरक्षा का सामना किया है और इस समस्या से प्रभावी तरीके से निपटे हैं। नक्सलवाद के मामले में भी वर्ष 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन से निपटने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार केंद्रीय अद्र्घसैनिक बलों और भारतीय सशस्त्र बलों की मदद से सफल कार्रवाई की और वर्ष 1971 में नक्सलवादियों को अलग-थलग करने और इस आंदोलन को विफल बनाने में सफल हुई।

आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के सरकारों ने भी जंगलों में एंटी-नक्सल बलों को प्रशिक्षित कर नक्सलियों के खिलाफ सफल कार्रवाई की। छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल के मामले में राज्य सरकारों को नक्सलवाद से निपटने की क्षमता हासिल करने की जरूरत है। यह सही है कि इन राज्यों की जनता पिछले एक दशक से पीडि़त रही है। लेकिन यह भी सही है कि पंजाब को आंतरिक सुरक्षा की चुनौती से निपटने में 15 वर्ष लगे। जम्मू कश्मीर में यह समस्या 2 दशकों तक रही। हालांकि वहां की स्थिति अलग थी, जहां केंद्र सरकार ने मोर्चा संभाला।

लेकिन जबसे वहां चुनी हुई सरकार ने जिम्मदारी संभालना शुरू किया, वह आतंकवाद की समस्या से निपटने का काम कर रही है। इसलिए कोई कारण नहीं है जिसके चलते राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी से बच जाएं। यह कहना खतरनाक होगा कि आंतरिक सुरक्षा से निपटने के लिए केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के विकल्प के तौर पर काम करना चाहिए। यदि राज्य सरकारें इस चुनौती से निपटने में सक्षम नहीं हैं, तो उन्हें नए सिरे से चुनाव कराने की पहल करनी चाहिए।

यदि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री यह कहते हैं कि नक्सलवाद की समस्या से केंद्र सरकार को निपटना चाहिए, तो उन्हें कुर्सी छोड़ देनी चाहिए। यदि वे इस समस्या की वजह से तनाव में हैं, तो उनके लिए यही बेहतर है।ध्यान देने वाली बात है कि छत्तीसगढ़ के गठन के बाद पहले 3 वर्षों तक (2000-2003 के बीच) स्थिति नियंत्रण में थी।

Keyword: Naxalite problem,
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