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गरीबों को मुफ्त भोजन से जुड़ा है उनका आत्मसम्मान
अनसुनी आवाज
श्रीलता मेनन /  July 05, 2010

जब किसी गुरुद्वारे में लंगर का प्रसाद वितरित किया जाता है तब राष्ट्राध्यक्ष समेत हर कोई व्यक्ति उसे श्रद्धा के साथ ग्रहण करना पसंद करता है लेकिन खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत सामुदायिक रसोईघर की योजना के पैरोकार क्या इन जगहों पर खाना पसंद करेंगे जो कि खास तौर से गरीबों के लिए है?

अगर वे इन रसोईघरों में खाते हुए देखे जाना पसंद करेंगे तो यह अवधारणा कुछ हद तक अच्छी नजर आ सकती है। लेकिन एक ऐसे देश के साथ निश्चित रूप से कुछ न कुछ गड़बड़ी जरूर है जो असहाय जानवरों के पोषण की तरह ही सरासर भूखे लोगों के लिए भोजन का प्रबंध करने की इच्छा रखता है।

राष्ट्रीय राजधानी में मजदूरी करने वाली पश्चिम बंगाल की एक प्रवासी से जब पूछा गया कि वह पूर्वी दिल्ली में पूजा के बाद आयोजित भंडारे में पूरी सब्जी खाने क्यों चली गई थी। उसने जवाब दिया - यह प्रसाद था, इसलिए मैं वहां चली गई थी। उनसे पूछा गया कि क्या वह राज्य सरकार के सामुदायिक रसोई घर में खाने जाएगी, तो उसने कहा कि ज्यादा हताश लोग ऐसा करेंगे क्योंकि गरीबों के पास भी आत्मसम्मान होता है और वे अपने ऊपर गरीब का तमगा लगाना पसंद नहीं करते।

केरल के गुरुवायूर मंदिर, मीनाक्षी मंदिर और इस तरह के कई और मंदिरों में हर किसी के लिए खाना परोसा जाता है और वहां धन की कमी नजर नहीं आती है। खुद के भोजन के लिए समुदाय रकम मुहैया कराता है।दिल्ली सरकार ने गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था करने की खातिर खुद के प्रयोग का आयोजन किया। इसे उम्मीद थी कि उद्योगों के दिग्गज इस योजना को धन मुहैया कराएंगे, लेकिन इसने पाया कि उनमें उत्साह का अभाव है।

शहर में अब तक 13 सामुदायिक रसोई घर खोले गए हैं और इसका संचालन आध्यात्मिक संगठन करता है, अब तक सिर्फ दो निजी साझेदार इसके स्पॉन्सरशिप के लिए सामने आए हैं। सरकार अब अपना हाथ खींच रही है, वह सोच नहीं पा रही है कि अपनी रसोई वाली के नाम से मशहूर इस योजना का क्या किया जाए। एक लाख लोगों को भोजन कराने के लिए इसे 2 करोड़ रुपये सालाना खर्च करना पड़ रहा है।

परिस्थितियां बिल्कुल अलग होती, अगर सरकार ने गुरुद्वारा से गठजोड़ किया होता या इन रसोई घरों का जुड़ाव समुदायों से कर दिया होता। यहां बड़ी संख्या में अमीर लोग हैं जो गरीबों को भोजन कराना पसंद करते हैं या ऐसा करना चाहते हैं। लेकिन क्या सरकार को उनमें से एक की तरह काम करना चाहिए जब तक कि आपात स्थिति न हो?

खाना खिलाने का कार्यक्रम उन देशों में चलता है जो सूखा प्रभावित होते हैं या वहां गरीब लोग होते हैं। यह काम सामान्यत: खुद समुदाय द्वारा किया जाता है। उदाहरण के तौर पर आंध्र प्रदेश में ऐसी रसोई घर गर्भवती महिलाओं के लिए स्थापित की जा रही हैं, ताकि उनके स्वास्थ्य की देखरेख हो सके यानी उनका स्वास्थ्य ठीक रह सके।
अगर लोगों को खाना खिलाना शर्मनाक है तो फिर सब्सिडी के बारे में भी ऐसी ही बात कही जा सकती है? चाहे शर्मनाक है या नहीं, पर भिक्षा देने के लिए बुनियादी ढांचा बनाने के मुकाबले सूखे व अभाव को रोकना बेहतर विचार हो सकता है।

लोगों को मछड़ी पकडऩे व अपने संग्रह को लाभकारी बनाने की शिक्षा देने के अलावा राइट टु फूड कानून को दिल्ली सरकार की अपनी रसोई योजना की नाकामी और गुरुद्वारा के लंगर की सफलता या कामयाबी से सबक लेना होगा। भोजन को स्वादिष्ट व गैर-भेदभावपूर्ण बनाने के लिए भोजन कराने को आत्मसम्मान से जोडऩे की खातिर इसे रास्ता तलाशना होगा।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में चमकीले पेंट से चमकते रिक्शे तेजी से बढ़ रहे हैं और यह लाखों झंडे की तरह है जो उन गरीबों के आनंद को रेखांकित करते हैं जो बेहतर जीवन की तलाश में शहर चले आए हैं। वे भिक्षा नहीं चाहते। उन्हें काम की दरकार है और किसी के दान दिए बिना वे इसे हासिल कर सकते हैं, कम से कम सरकार की तरफ से।

Keyword: free meal to poors, gurudwara, self dignity,
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