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जिरह: क्या स्वतंत्र निदेशकों की भी बनती है जिम्मेदारी?
राजीव चंद्रशेखर/एस महालिंगम /  July 02, 2010


राजीव चंद्रशेखर, सांसद व अध्यक्ष, जुपिटर कैपिटल

स्वतंत्र निदेशक जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते

स्वतंत्र निदेशक अपने दायित्व से पल्ला नहीं झाड़ सकते, दुनिया भर में स्वतंत्र निदेशकों की जिम्मेदारी तय की गई है तो भारत में भी ऐसा ही होना चाहिए।

भारत के लिए 1984 का साल कई दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं वाला रहा। इसी साल देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री की हत्या हुई और इसके बाद देश में सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए जिसमें कई निर्दोषों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उसी साल भोपाल गैस हादसा हुआ जिसमें 15,000 से 20,000 लोगों की मौत हुई। इन दोनों मामलों में हजारों लोगों की जान जाने के बावजूद किसी व्यक्ति को इसके लिए दोषी मानकर सजा नहीं दी गई।

भोपाल गैस हादसा किसी दूसरे कॉरपोरेट अपराध की तरह नहीं है। इसके प्रभावितों को हर हाल में न्याय मिलना चाहिए चाहे दोषी कितना भी अमीर और शक्तिशाली क्यों न हो। अपने देश में नीतियां कॉरपोरेट लामबंदी के प्रभाव में बनती हैं। इसलिए इस बात को जानकर चौंकना नहीं चाहिए कि कंपनी कानून, 1956 में संशोधन करके कॉरपोरेट लापरवाही के खिलाफ कानून को नरम करने की कोशिश चल रही है। कुछ वाणिज्यिक और औद्योगिक संगठन यह कह रहे हैं कि स्वतंत्र निदेशकों को सजा देने से ऐसे निदेशकों की उपलब्धता पर नकारात्मक असर पड़ेगा। इस तर्क पर हंसी आती है।

यह तो कंपनी और उसके प्रबंधन पर निर्भर करता है कि उसकी साख स्वतंत्र निदेशकों को आकर्षित करने लायक है या नहीं। ऐसे निदेशकों से यह उम्मीद की जाती है कि वे प्रबंधन के दबाव से मुक्त रहकर शेयरधारकों के न्यासी के तौर पर काम करेंगे और कंपनी से प्रासंगिक मसलों पर सवाल भी करेंगे। हालांकि, कुछ प्रवर्तक स्वतंत्र निदेशकों को अपनी धुन पर नचाना पसंद करते हैं। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) जैसे कुछ संगठन गैर कार्यकारी निदेशकों को आपराधिक मामलों में जिम्मेदारी से बचाने के मकसद से जरूरी कानूनी संशोधन के लिए लामबंदी कर रहे हैं। इनके मुताबिक स्वतंत्र निदेशक को किसी भी तरह से कंपनी की किसी भी तरह की लापरवाही के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। यह किसी भी  तरह से स्वीकार्य नहीं है। स्वतंत्र निदेशक यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि प्रबंधन के कार्य से वह वाकिफ नहीं रहते। दुनिया भर में स्वतंत्र निदेशकों की जिम्मेदारी तय की गई है तो भारत में भी ऐसा ही होना चाहिए। हां, इन निदेशकों की निजी जिम्मेदारी के मसले पर अलग से बातचीत की जा सकती है।

मुझे उम्मीद थी कि स्वतंत्र निदेशकों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश होगी और यही वजह है कि दीपक पारेख के बयान में मुझे नहीं चौंकाया। उन्होंने कहा, 'मैं इस बात से सहमत हूं कि भोपाल एक भयानक हादसा था। पर हमें इस पर भावुक नहीं होना चाहिए। अध्यक्ष और मुख्य कार्याधिकारी को जेल में बंद कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इस बयान से पता चलता है कि हमारी व्यवस्था कितनी एकतरफा है। क्या किसी को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिए कि वह एक शक्तिशाली कंपनी का मुख्य कार्याधिकारी था? किसी लापरवाही के लिए जितनी जिम्मेदारी किसी आम आदमी के मामले में तय की जाती है, वैसा ही किसी अध्यक्ष और मुख्य कार्याधिकारी के मामले भी होना चाहिए।


एस महालिंगम, सीएफओ और कार्यकारी निदेशक, टीसीएस

जिम्मेदारियां तय होने से  बढ़ेगी सक्रियता

स्वतंत्र निदेशकों के लिए अलग से जिम्मदारियां तय होने से  वे ज्यादा सक्षम होकर  कार्य कर पाएंगे जिससे दुर्घटनाओं की रोकथाम में मदद मिलेगी

स्वतंत्र निदेशकों की जिम्मेदारियां भी तय की जानी चाहिए मगर ये स्थायी निदेशकों की जिम्मेदारियों से अलग हों तो वे ज्यादा सक्रिय होकर काम करेंगे और इस तरह संगठन में काम ठीक तरीके से हो सकेगा।

गैर कार्यकारी और स्वतंत्र निदेशकों को कंपनियों में हुई गड़बडिय़ों के लिए जिम्मेदार मानते हुए सजा दी जाए या नहीं इस पर इन दिनों काफी कुछ सुनने को मिल रहा है। अगर किसी संगठन में कोई हादसा हो जाता है तो इसके लिए किसे सजा दी जाए। अगर हम गैर कार्यकारी निदेशकों को कोई सजा सुना रहे हैं तो क्या ये किसी ऐसे व्यक्ति को सजा सुनाने जैसा नहीं है जो सीधे जिम्मेदारियों से नहीं जुड़ा है। इसी रवैये की वजह से हम प्रतिभावान लोगों को कंपनी बोर्ड में शामिल नहीं कर पा रहे हैं जबकि देश को शेयर बाजारों में सक्रियता के साथ कारोबार करने वाले कंपनियों की बड़ी संख्या में जरूरत है।

यह बहस हमें इस मूल प्रश्न पर वापस लाकर खड़ा कर देता है: बोर्ड निदेशकों की जिम्मेदारियां क्या होनी चाहिए और इसमें स्वतंत्र निदेशक अपनी ओर से क्या भूमिका निभा सकते हैं। गैर-कार्यकारी निदेशकों को भी किसी कंपनी के विकास और वहां की कारोबारी रणनीतियों में सक्रिय भागीदारी निभानी चाहिए। वे प्रबंधन के कार्यों की जांच-पड़ताल करें और संस्थान जो वित्तीय सूचनाएं दे रहा है वे सही हैं या नहीं ये भी सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी हो। साथ ही उन्हें यह भी देखना चाहिए कि कंपनी की जोखिम प्रबंधन प्रणाली पूरी तरह से मुस्तैद हो। चेयरमैन या कार्यकारी निदेशकों की अनुपस्थिति में उन्हें साल में एक बार सबके साथ बैठक में भाग लेना चाहिए।
अगर कोई स्वतंत्र निदेशक अपनी जिम्मेदारियां ठीक तरीके से निभाना चाहता है तो उसके लिए जरूरी है कि उसे समय प्रबंधन आता हो। एक गैर कार्यकारी निदेशक के लिए जरूरी है कि वह कंपनी के लिए पर्याप्त समय निकाले। अमेरिका के प्रतिभूति विनिमय आयोग के चेयरमैन आर्थर लेविट ने कहा था, 'मुझे इस बात की कोई परवाह नहीं है कि आप कितने प्रतिभावान हैं, अगर आप साल में केवल 3 दफा दौरे के लिए आते हैं तो आप एक अच्छे निगरानीकर्ता नहीं साबित हो सकते।

इन दिनों स्वतंत्र निदेशकों के मन में संभावित जिम्मेदारियों को लेकर डर बना हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे कंपनी की रोजाना की गतिविधियों से जुड़े नहीं होते हैं और ऐसे में इनके लिए उन्हें कैसे जिम्मेदार बनाया जा सकता है। उनमें एक डर यह भी समाया हुआ है कि उन्हें धोखाधड़ी, सुरक्षा से जुड़े मामलों और पर्यावरणीय मसलों के लिए भी जिम्मेदार समझा जा सकता है। उन्हें इस बात का डर रहता है कि अगर एक बार वे इस तरह के मामलों में जिम्मेदार मान लिया जाए तो फिर आरोपों-प्रत्यारोपों में काफी समय और धन बरबाद होगा साथ इससे उनकी साख को भी चोट पहुंचती है। हालांकि महज यह दलील देना कि वे कंपनी में हुए किसी जालसाजी या धोखाधड़ी से अनजान थे और इस बिना पर स्वतंत्र निदेशकों को जिम्मेदारियों से मुक्त कर देना सही नहीं है।

Keyword: independent directors,
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