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अब मोबाइल पर सुनिए गांवों का दर्द और उनकी परेशानी
अनसुनी आवाज
श्रीलता मेनन /  June 21, 2010

एक फोन नंबर है 080-40952044, जिस पर अगर आप कॉल करें तो आप एक गांव की दूसरी ही दुनिया में पहुंच जाएंगे। यह गांव छत्तीसगढ़ राज्य के राजनांदगांव जिले में है।

भानु साहू नाम की पत्रकार बताती हैं कि किस तरह एक गांव की महिला पंचों को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के तहत भुगतान नहीं मिलता। इसकी वजह यह है कि उनका नाम रजिस्टर में दर्ज ही नहीं है।

साहू कहती हैं कि भेदभाव इतना ज्यादा है कि पुरुष पंचों को काम किए बिना नरेगा के तहत भुगतान मिल जाता है। पत्रकार ने बताया कि जिले के दूसरे हिस्सों में भी ऐसी ही स्थिति है। वहां भी वास्तविक काम के भुगतान का दावा अस्वीकार कर दिया जाता है।

अब इस तरह की कहानी आपको सिर्फ दो मिनट में सुनने को मिल जाएगी। मोबाइल आधारित समाचार सेवा सीजी नेट स्वर की बदौलत यह संभव हुआ है। इस सेवा के तहत इलाके की उन खबरों को संक्षेप में दिया जाता है जो लोगों तक शायद ही पहुंचा करती थी  जबकि ये खबरें मीडिया के साथ-साथ सरकार केलिए महत्त्वपूर्ण होती हैं।

एक और कहानी है कांगड़ी गांव के एक स्कूल की, जहां एक ही शिक्षक है। स्कूल की कक्षाएं निलंबित कर दी गई हैं क्योंकि शिक्षक को जनगणना के काम के लिए बुला लिया गया है। समाचार सेवा सीजी नेट स्वर पत्रकार शुभ्रांग्शु चौधरी के दिमाग की उपज थी, जिन्होंने अमेरिका के मैसासुचेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी (एमआईटी)के स्कॉलर के साथ मिलकर इसे क्रियान्वित किया। यह नाइट इंटरनैशनल के तहत फेलोशिप प्रोजेक्ट का हिस्सा था।

अब यह सेवा दूरदराज के ज्यादातर गांवों की सूचनाओं के लिए एक आउटलेट जैसा बन चुकी है। न सिर्फ छत्तीसगढ़ के गांवों बल्कि उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे दक्षिणी उत्तर प्रदेश के गांवों के लिए भी यह सूचना का स्रोत बन चुकी है।

चूंकि यह आदिवासी इलाकों पर केंद्रित है जो कि नक्सल प्रभावित भी हैं, ऐसे में सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों के लिए भी यह चिंता का सबब है। कुछ समय के लिए यह सेवा बंद होगी और नए नंबर के साथ इसे फिर से शुरू किया जाएगा।

सवाल यह है कि क्या इन सेवाओं, जो कि गांव वालों की मदद करती है, पर पाबंदी लगा दी जानी चाहिए या इसकी निगरानी की जानी चाहिए? अब तक इसकी निगरानी के लिए कोई एजेंसी नहीं है। इसके अलावा एक अन्य मोबाइल आधारित समाचार सेवा गांवों की आवाज भी है, जिसे नोएडा स्थित इंटरनैशनल मीडिया इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के पत्रकार ने शुरू किया है और इसका प्रसारण उत्तर प्रदेश में होता है। यह मथुरा क्षेत्र को कवर करता है।

चाहे ये सेवाएं सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य हों या नहीं, पर एक ऐसा माध्यम पेश कर दिया गया है जिसका इस्तेमाल ऐसे लोग कर सकते हैं जो देश या देश से बाहर हाशिये पर पड़े लोगों की कहानी सुनाना चाहते हैं।

अगर फोन न्यूज सर्विस नंबर लोकप्रिय होता है तो झारखंड या सिक्किम में लोग एक फोन कॉल के जरिए अपनी कहानी प्रसारित करवाने में सक्षम होंगे। यह ग्रामीण-शहरी अंतर के खात्मे की शुरुआत होगी, साथ ही लोगों व मीडिया केबीच का अंतर भी समाप्त होगा क्योंकि नागरिक इसका कार्यभार संभाल लेंगे।

शुभ्रांशु चौधरी और उनकी पत्नी स्मिता करीब-करीब अकेले ही नई दिल्ली से स्वर का संचालन कर रहे हैं और इस काम में गांव के कुछ कार्यकर्ता कहानी का इंतजाम कर उनकी मदद कर रहे हैं। सेवा को प्रभावी बनाने के लिए लोगों को इस स्थिति में होना चाहिए कि वह न सिर्फ सेवा को संचालित कर सके बल्कि वह नंबर से भी वाकिफ हों।

आज स्वर के पास सिर्फ तीन कहानी और एक नया नंबर है, जिसे आदिवासियों के बीच लोकप्रिय बनाया जाना है। इस बात का भी डर है कि नंबर का दुरुपयोग किया जा सकता है। स्मिता कहती हैं - सरकार के लिए समाधान यह है कि वह उन लोगों की निगरानी करे जो कि इस सेवा का संचालन करते हैं न कि उन्हें हतोत्साहित करे या फिर उसे बंद कर दे।

स्मिता कहती हैं कि दूसरे राज्यों में भी स्वर को दोहराया जा सकता है। हालांकि, बेहतर यह होगा कि दूसरे राज्यों में और सेवाएं शुरू हों या दूसरे हितों का प्रतिनिधित्व करे। इससे लोगों द्वारा दलितों, मुसलमानों, अन्य अल्पसंख्यकों, छात्रों, महिलाओं, बच्चों की कहानी अलग-अलग नंबर डायल करकेसुनना सुनिश्चित होगा।

प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए इसका मतलब होगा और ज्यादा खबरें और जहां जरूरी होगा सुधारात्मक कार्रवाई भी होगी। इसका यह भी मतलब होगा कि इससे ज्यादा खुलापन आएगा और समाज को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों की संख्या में कमी आएगी।

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