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इक्विटी और इक्विटी एमएफ का फर्क समझना है जरूरी
वित्तीय सलाहकारों की ओर से योजना बेचने के लिए अपनाए गए गलत तरीकों और कंपनियों की गलत प्रचार नीति से निवेशक होते हैं गलतफहमी के शिकार
आशीष पई /  June 13, 2010

इक्विटी फंडों के मूल्यांकन, डिविडेंड और मुनाफे को लेकर निवेशक थोड़ी गलतफहमी में रहते हैं। कुछ लोगों का मानना होता है कि इक्विटी एमएफ के लिए ज्यादा शुद्घ परिसंपत्ति मूल्य (एनएवी) का मतलब महंगा फंड है। इसी तरह ज्यादा डिविडेंड वितरण का मतलब बेहतर प्रदर्शन माना जाता है। वहीं, न्यू फंड ऑफर (एनएफओ) के साथ कई फायदों का जिक्र होता है। कुछ गलतफहमी वित्तीय सलाहकारों की ओर से योजना बेचने के लिए अपनाए गलत तरीकों और कुछ फंड कंपनियों के गलत प्रचार का नतीजा होती हैं।

आमतौर पर एक इक्विटी फंड बहुत सारे निवेशकों से पूंजी इकठ्ïठा करता है और कई शेयरों में निवेश करता है। पोर्टफोलियो के प्रदर्शन का आकलन एनएवी में बढ़त या कमी से किया जाता है। इक्विटी फंड में शेयरों के समान ही जोखिम और प्रतिफल देने की विशेषता होती है, मगर दोनों में कुछ बुनियादी अंतर हैं। इनमें से कुछ पर नजर डालते हैं।

प्राथमिक बाजार पेशकश
निजी कंपनियां और फंड कंपनियां बाजार में नई योजनाएं पेश करती हैं। इन्हें प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) और न्यू फंड ऑफर (एनएफओ) के नाम से जानते हैं। बाजार में निवेशकों की ओर से अच्छी मांग की वजह से सूचीबद्घ किए जाने के समय आईपीओ से बढिय़ा प्रतिफल कमाया जा सकता है। वहीं, फंड कंपनियों के एनएफओ से इस तरह का प्रतिफल नहीं भी मिल सकता है क्योंकि किसी इक्विटी फंड का एनएवी किसी फंड द्वारा किसी दिन रखे गए शेयरों के बाजार मूल्यांकन का प्रतिनिधित्व करता है। एक फंड अपने पोर्टफोलियो में कई शेयर रखता है, लिहाजा एनएवी एनएफओ और पहले एनएवी की तारीख के बीच इक्विटी पोर्टफोलियो पर समेकित प्रतिफल को दर्शाता है। इस छोटी सी अवधि में पोर्टफोलियो के शेयरों में ज्यादा बढ़त नहीं दिख सकती है।

ज्यादा एनएवी का मतलब महंगी योजना
एक और गलतफहमी एनएवी और फंड की कीमत को लेकर है। ज्यादा एनएवी का मतलब फंड का महंगा होना माना जाता है। वास्तव में ऐसा नहीं है। किसी फंड द्वारा किसी दिन रखे गए शेयरों के बाजार मूल्यांकन का प्रदर्शन एनएवी के जरिए किया जाता है। अगर एनएवी बहुत ज्यादा है, तो जरूरी नहीं कि इसका मतलब है कि फंड महंगा है। फंड के ज्यादा एनएवी की वजह इसका बाजार में लंबे समय से मौजूद होना हो सकता है, न कि फंड द्वारा बांटा गया ज्यादा डिविडेंड या पोर्टफोलियो में शामिल शेयरों का प्रदर्शन। बाजार में सूचीबद्घ प्रतिभूति और किसी फंड योजना के एनएवी में अंतर होता है।

सूचीबद्घ प्रतिभूति की कीमत बाजार में उसकी मांग और आपूर्ति से तय होती है। वहीं, एनएवी पोर्टफोलियो में मौजूद शेयरों की कीमत से तय होता है। जैसे कोई निवेशक 20 रुपये और 50 रुपये एनएवी वाली दो फंड योजनाओं में निवेश करता है। अगर बाजार में 10 फीसदी की सामान्य बढ़त होती है, तो 20 रुपये वाला एनएवी 24 रुपये तक और 50 रुपये वाला एनएवी 55 रुपये तक बढ़ेगा। लिहाजा अलग-अलग एनएवी होने पर भी आपको मिलने वाला प्रतिफल 10 फीसदी ही मिलेगा। एचडीएफ इक्विटी फंड-ग्रोथ का एनएवी जून 2010 को यह 244.24 रुपये था। इस फंड की शुरुआत 1995 में हुई थी। वहीं, 2005 में शुरू हुए फिडेलिटी इक्विटी फंड का एनएवी 31.85 रुपये है।

एक साल में एचडीएफसी इक्विटी फंड ने 37.77 फीसदी का प्रतिफल दिया था, वहीं, फिडेलिटी इक्विटी फंड ने 31.11 फीसदी का प्रतिफल दिया है। एचडीएफसी का प्रति इकाई मूल्य ज्यादा है, पर इसने कम एनएवी वाले फिडेलिटी इक्विटी फंड से बेहतर प्रतिफल दिया है। इन दोनों के बेंचमार्क अगल-अलग हैं। एचडीएफसी इक्विटी फंड का बेंचमार्क सीएनएक्स 500 और फिडेलिटी इक्विटी फंड का बेंचमार्क बीएसई 200 है। निवेशकों को कम एनएवी और यूनिट की ज्यादा संख्या पर ध्यान नहीं लगाना चाहिए। प्रदर्शन का रिकॉर्ड, फंड प्रबंधन और उतार-चढ़ाव जैसी दूसरी बातों पर गौर करना ज्यादा सही होगा जिनसे प्रतिफल निर्धारित होता है।

डिविडेंड
 किसी म्युचुअल फंड द्वारा किए गए निवेश से कमाई या शेयरों पर मुनाफावसूली से हुई आमदनी से हासिल अतिरिक्त रकम डिविडेंड के रूप में बांटी जाती है। जब भी फंड डिविडेंड बांटता है, तो एनएवी डिविडेंड की सीमा तक गिर जाता है। सिर्फ इसलिए कि एक फंड डिविडेंड बांट रहा है जरूरी नहीं कि वह बहुत अच्छा फंड है। अगर कोई फंड ऊंचा डिविडेंड बांटता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि इसका प्रदर्शन बेहतरीन है। आमतौर पर उदार डिविडेंड नीति वाली कंपनी को शेयर बाजार में निवेशकों की अच्छी रुचि मिल सकती है, पर यही बात इक्विटी फंड के साथ लागू नहीं होती है। इक्विटी फंड का प्रदर्शन उसके द्वारा किए गए निवेश के मूल्य में बढ़ोतरी पर निर्भर करता है।

जोखिम से सुरक्षा
 एक और बात ध्याान में रखनी जरूरी है कि ज्यादा फंडों का मतलब जोखिम से सुरक्षा नहीं होता है, पर ज्यादा शेयरों का मतलब जोखिम कम होना जरूर है। ज्यादा फंडों का मतलब वास्तविक विशाखण नहीं है। कुछ मामलों में यह आपके प्रतिफल को कम कर सकता है। अलग-अलग फंडों के जरिए समान शेयरों में निवेश करना मूर्खता होगी। आपको ऐसा लग सकता है कि आप अपना पोर्टफोलियो विशाखित कर रहे हैं, पर वास्तव में आपको ऐसा कोई विशाखण हासिल नहीं हो रहा। ऐतिहासिक रूप से बहुत कम फंड हैं जिन्होंने लगातार अच्छा प्रदर्शन दिखाया है। शेयरों के मामले में एक ही जगह सारी पूंजी लगाने से बचें। शेयरों का विशाखित पोर्टफोलियो बेहतर जोखिम प्रबंधन और ज्यादा प्रतिफल हासिल करने में मदद करेगा।

फंड कंपनी
 कुछ निवेशकों का मानना होता है कि बड़े व्यावसायिक समूहों जैसे रिलायंस, टाटा, बिड़ला आदि द्वारा प्रवर्तित म्युचुअल फंडों की योजनाओं में निवेश से बेहतर प्रतिफल हासिल हाता है। पर ऐसा नहीं है फंड का प्रदर्शन उसके द्वारा निवेश के लिए चुने शेयरों के प्रदर्शन पर निर्भर करता है। फंड का प्रबंधन कंपनी द्वारा नियुक्त प्रबंधक संभालता है। शेयरों का चयन योजना के लक्ष्य और प्रबंधक के बाजार को लेकर नजरिए पर निर्भर करता है। ऐसे लोग जो सीधे शेयरों में निवेश की परेशानी नहीं झेलना चाहते उनके लिए म्युचुअल फंड का रास्ता सबसे अच्छा है। निवेशकों को इक्विटी फंड और इक्विटी का फर्क समझना चाहिए। इस तरह वे बेहतर निर्णय लेने में सफल होंगे।

Keyword: equity & equity MF, NV, NFO,
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