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भोपाल गैस त्रासदी: इस रात की सुबह नहीं
पैनी नजर
सुनील जैन /  June 13, 2010

भोपाल त्रासदी के बाद यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वॉरेन एंडरसन को भगाने में कांग्रेस पार्टी की भूमिका और अनजाने में दिग्विजय सिंह का यह कहकर राजीव गांधी को बीच में ले आना कि मामले में शायद अमेरिकी दबाव था- भल ही दिलचस्प जान पड़े, पर वास्तव में यह गौण मामला है। तार्किक आधार पर मान लिया जाए कि मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के आदेश पर एंडरसन को देश छोडऩे की अनुमति नहीं दी जाती तो फिर इसके बाद क्या होता? उन्हें इसके लिए सलाखों के पीछे नहीं रखा गया होता और केशब महिंद्रा व अन्य की तरह उन्हें भी त्रासदी के 26 साल बाद दो साल की सजा सुनाई गई होती। चूंकि इस फैसले के खिलाफ अपील की जाएगी और निश्चित तौर पर यह मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचेगा, फिर इसका निपटारा होने में कुछ दशक का समय और लगेगा। यह निश्चित नहीं कि तब भी एंडरसन इसके इर्द-गिर्द होंगे या नहीं।

वास्तविक मुद्दा सभी सरकारों की पूरी तरह से विफलता का है, केंद्र व राज्य दोनों, और उनकी उदासीनता का। इनकी बानगी इस तरह से है:
1. एक ओर जहां मूल आरोपपत्र में इस मामले को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत रखने को कहा था, जिसमें अधिकतम सजा 10 साल की होती है (गैर-इरादतन हत्या न कि हत्या), उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ए. एम. अहमदी ने इसे धारा 304 ए के तहत कर दिया, जिसमें अधिकतम सजा सिर्फ दो साल की होती है क्योंकि यह लापरवाही से मौत से संबंधित है (बिल्कुल वैसे जैसे कि अगर कोई आपकी कार से कुचला जाए)। यह दिखाने के लिए सबूत पेश किए गए थे कि संयंत्र सही तरीके से काम नहीं कर रहा था और उपकरण खराब थे। फैसले में कहा गया : यह मानते हुए भी कि संयंत्र में खराबी थी और एमआईसी जैसे विषैले व खतरनाक तत्व वहां बन रहे थे। आरोपी द्वारा ऐसे तत्वों को टैंक नंबर 610 में इकट्ठा किया जाना प्रथम दृष्टया यह नहीं बताता कि संबंधित आरोपियों को इस बात की जानकारी थी कि यह इंसानों की मौत का कारण बन सकता था।

इसके बाद जो कुछ हुआ वह और भी बुरा था क्योंकि अदालत ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी थी। पेश किए गए सबूत और अभी-अभी उद्धरित किए गए फैसले को देखने के बाद यह आपको बताएगा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 137 के तहत समीक्षा की पूरी प्रक्रिया किस तरह से दिखावे की तरह है। आपको यह और भी दिखावा लगेगा जब आप इस पर विचार करेंगे। अनुच्छेद 142 कहता है - अपने न्यायाधिकार क्षेत्र के तहत ऐसे मामले में उच्चतम न्यायालय ऐसी डिक्री या ऐसा आदेश पारित कर सकता है जो पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक हो, जो उसके सामने लंबित पड़ा हो। इसका मतलब यह हुआ कि अगर परिस्थितियां न्यायसंगत ठहराती हो तो अदालत कोई भी आदेश पारित कर सकती है।

अदालत ने ऐसा नहीं किया और न ही संसद ने ऐसा किया। निश्चित तौर पर हमारे सांसदों को यह अहसास हुआ कि जो घटित हुआ वह भारी त्रासदी थी और अदालत द्वारा पुनरीक्षण याचिका खारिज किया जाना न्याय का उपहास उड़ाने जैसा था? उसके 14 साल बाद जब स्थानीय अदालत ने पिछले हफ्ते दो साल की सजा सुनाई और इस पर सांसदों ने शोरगुल मचाया तो लगा कि वे अचानक से जाग गए हैं। इसकेबाद कानून मंत्री ने शांत करने के लिहाज से यह कह दिया कि एंडरसन का प्रत्यर्पण हो सकता है!  (हर तरह के सबूत और अदालती सजा के बावजूद कार्बाइड की वेबसाइट कहती है कि वह दोषी नहीं है। उसका कहना है कि एक कर्मचारी ने एमआईसी टैंक में पानी डाला था और सरकार जानती है कि वह कर्मचारी कौन था, लेकिन वह उसे पेश नहीं करना चाहती क्योंकि वह सिर्फ कार्बाइड पर निशाना साधना चाहती थी और उससे मुआवजा पाना चाहती थी)

2. पीडि़तों को मुआवजा देने की बाबत सरकार कभी भी परेशान नहींं हुई, इसने कार्बाइड द्वारा भुगतान किए जाने तक इंतजार करने को प्राथमिकता दी। इस रकम का एक तिहाई हिस्सा अभी भी सरकार के पास है। निश्चित तौर पर सरकार का काम तत्काल मुआवजा देने का था और कार्बाइड से अलग से रकम लेने के लिए पीडि़तों को छोड़ देने का था। उदाहरण के तौर पर अगर आप विमान दुर्घटना में मारे जाते हैं तो आपके आश्रित को एयरलाइंस से तत्काल मुआवजा मिल जाता है, अगर एयरलाइंस की लापरवाही साबित हो जाती है और मुकदमे के बाद भुगतान की बात होती है तो यह तत्काल दी गई राहत के अलावा होता है।

जब अगली बार भोपाल जैसा हादसा हो तो इतिहास अपने आपको न दोहराए, इसे सुनिश्चित करने के लिए हमें मुआवजे की व्यवस्था स्थापित करने की दरकार है जो कि उद्योगों के अंशदान पर आधारित हो (ठीक उसी तरह जिसमें पूरा दूरसंचार उद्योग ग्रामीण टेलीफोनी के लिए यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड में अंशदान देता है) ताकि पीडि़तों को तत्काल राहत मिले। वे कार्बाइड से क्या हासिल करते हैं यह अलग मुद्दा है।

3. अगर सरकार मुआवजा नहीं देना चाहती है तो आप सोच रहे होंगे कि उसे घटनास्थल से कम से कम विषैले कचरे की साफ-सफाई करनी चाहिए। 25 साल तक कुछ भी नहीं किया गया है और जब सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट ने इस साल की शुरुआत में जांच की तो इसने पाया कि पारा व अन्य विषैली सामग्री मसलन लिंडेन व कार्बाइल सुरक्षित सीमा से 24 से 100 गुना ज्यादा था और ऐसा मामला कार्बाइड के प्लांट से तीन किलोमीटर दूर था। दूसरे शब्दों में शेड के नीचे प्लास्टिक से ढककर रखी गई विषैली सामग्री भूजल तक पहुंच चुकी है। निश्चित तौर पर साफ-सफाई के लिए कार्बाइड से रकम मिलने तक इंतजार नहीं किया जाना चाहिए था। एक ओर जहां विशेषज्ञों की समिति विषैले कचरे को गुजरात में इंसिनेटर में निपटाना चाहती है, वहीं राज्य सरकार की रिपोर्ट इस बात पर जोर दे रही है कि यह साइट गैर-ïिवषैली है।

यह देखते हुए कि उस दौरान स्वर्गीय राजीव गांधी के बचाव की खातिर कांग्रेस इस बात पर जोर दे रही है कि सीबीआई पर किसी तरह का दबाव नहीं था कि वह एंडरसन का प्रत्यर्पण न करे। यह स्पष्ट नहीं है कि पुनर्गठित मंत्रियों का समूह क्या हासिल करेगा क्योंकि यह जो कुछ सिफारिश करेगा वह इसके द्वारा संचालित पूर्व की सरकार के कामकाज के बारे में होगी। एंडरसन की रिहाई के लिए कांग्रेस अब अर्जुन सिंह पर आरोप मढ़ रही है (गांधी को बचाने की खातिर), आपको आश्चर्य होगा कि पुनर्गठित जीओएम के प्रमुख सिंह के होते हुए यह कैसे अपने आपको उपयुक्त बताएगा। लेकिन क्या होता है जब हर चीज में राजनीति हो।

Keyword: Bhopal Gas Tragedy, Union Carbide, Worren Enderson, Congres, Arjun Singh,
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