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देसी हथियार को मिलेगी सरकार से धार, जल्द होगी नई रक्षा नीति तैयार
रक्षा उपकरण देश में ही बनाने के लिए तैयार होगी नई नीति
अजय शुक्ला /  June 13, 2010

विदेशी हथियारों पर निर्भर रहने की अपनी फितरत की वजह से रक्षा मंत्रालय को लंबे अरसे से तीखी आलोचना झेलनी पड़ी है। लेकिन इससे उकताकर मंत्रालय अब एक नई और महत्त्वाकांक्षी नीति पर काम कर रहा है, जिससे निजी और सरकारी क्षेत्र में देसी रक्षा उद्योग को मजबूत किया जाएगा।

रक्षा मंत्रालय में रक्षा उत्पादन सचिव आर के सिंह ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि देश की यह पहली रक्षा उत्पादन नीति होगी और इसमें आयुध और सैन्य प्रणाली के कई वर्ष बाद के भविष्य को ध्यान में रखाा जाएगा ताकि भारतीय कंपनियों को उनके लिए उत्पादन करने के वास्ते पर्याप्त समय मिल जाए। जिन प्रणालियों की पहचान इस नीति के तहत काम के लिए की जाएगी, उनके विकास के लिए खास भारतीय रक्षा कंपनियों को परियोजनाएं सौंप दी जाएंगी। रक्षा मंत्रालय उन कंपनियों के लिए प्रणाली के विकास की मियाद तय कर देगा और उस पर आई लागत का 80 फीसदी हिस्सा सरकारी खजाने से खर्च होगा।

सिंह ने बताया, 'हमने सेना, नौसेना, वायुसेना, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), शिक्षाविद्, भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की), भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) और वाणिज्य एवं उद्योग संघ (एसोचैम) से इस बारे में मशविरा किया और उनकी प्रतिक्रिया पर पूरा ध्यान भी दिया। नई नीति को विचार विमर्श के लिए रक्षा खरीद बोर्ड (डीपीबी) के सामने पेश किए जाने के बाद उपकरणों की खरीद पर मंत्रालय की शीर्ष संस्था रक्षा खरीद परिषद इसे मंजूरी देगी। दो या तीन महीने में नई नीति को लागू कर दिया जाएगा।

रक्षा खरीद के लिए फिलहाल रक्षा खरीद नीति, 2008 पर अमल किया जाता है। इस नीति में भी ऐसी प्रक्रिया तैयार करने की बात है, जिससे रक्षा मंत्रालय भारतीय उद्योग को परियोजनाएं सौंप सके और उनका खर्च उठा सके। लेकिन अभी तक मंत्रालय ने रक्षा उपकरणों के लिए किसी भी देसी कंपनी को ठेका नहीं दिया है। इसकी बड़ी वजह यही है कि भावी जरूरतों के मुताबिक उपकरणों की पहचान ही कभी नहीं की गई, जिसके कारण भारतीय कंपनियों को उन्हें तैयार करने का समय भी नहीं मिल पाया।

जब इस ओर इशारा किया गया तो रक्षा उत्पादन सचिव ने जोर देकर कहा, 'लेकिन अब ऐसा होने ही जा रहा है। हमें ऐसा करना ही पड़ेगा क्योंकि अब हमारे उद्योग के पास क्षमता है। वह इसमें दिलचस्पी भी ले रहा है। हम सुनिश्चित करेंगे कि उपकरण तैयार करने की प्रक्रिया उद्योग के अनुकूल हो और ज्यादा से ज्यादा उपकरण उसी के जरिये हमारे पास आएं।

नई नीति में कामकाज के तरीके का खुलासा करते हुए सिंह बताते हैं कि भारतीय रक्षा कंपनियों को अपनी प्रौद्योगिकी संबंधी क्षमता रक्षा मंत्रालय के डेटाबैंक में दर्ज करानी होंगी। जब भी सेना के लिए किसी तरह के हथियार या उपकरण मसलन मुख्य युद्घक टैंक आदि की जरूरत होगी तो रक्षा मंत्रालय इसी डेटाबैंक के जरिये उद्योग का जायजा लेगा और कम से कम दो प्रमुख कंपनियों की पहचान कर लेगा। इन कंपनियों को ही परियोजना के ठेके सुपुर्द किए जाएंगे। ये दोनों मुख्य ठेकेदार कंपनियां पहले से तैयार कंपनियों के समूह के साथ मिलकर टैंक के अलग-अलग नमूने बनाएंगी। रक्षा मंत्रालय इनमें से किसी एक को या दोनों को चुनेगा और उन्हीं के आधार पर बड़ी तादाद में टैंक बनाए जाएंगे। दिलचस्प है कि अमेरिका में भी हथियार या सैन्य उपकरण निर्माण के लिए इसी तरह की नीति पर चला जाता है। वहां भी दो कंपनियों को चुना जाता है और उनमें से बेहतर नमूने पर हथियार बनते हैं।

नई रक्षा उत्पादन नीति का खयाल रक्षा मंत्रालय को उस वक्त आया, जब उसे महसूस हुआ कि भारत में आयुध भंडार तैयार करने के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के जरिये उन्हें हासिल करने का उसका घिसा पिटा मॉडल देसी प्रौद्योगिकी के विकास में कामयाब नहीं हो पाया है। रक्षा मंत्रालय को लगता है कि आयुध प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण विदेशी डिजाइन पर हथियार बनाने से नहीं होगा, बल्कि उसके लिए हथियारों का डिजाइन भी देश में ही तैयार करना होगा। सिंह कहते हैं, 'इतिहास में झांकिए और देखिए कि क्या हुआ है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो भारतीय रक्षा उद्योग उन्हीं उत्पादों का निर्माण कर रहा है, जिनका डिजाइन विदेश में तैयार हुआ है, यहां नहीं। हमारे उद्योग को आदत पड़ गई है विदेश से प्रौद्योगिकी हासिल करने की और लाइसेंस के तहत उस वक्त उत्पादन करने की, जब तक कि उत्पाद की प्रौद्योगिकी वक्त के साथ बेकार न हो जाए।

अनुसंधान और विकास पर यहां एक पाई खर्च नहीं की जाती और प्रौद्योगिकी पर भी मेहनत नहीं की जाती। चूंकि सबसे महत्त्वपूर्ण पुर्जे विदेश से ही आते हैं, इसलिए विदेशी कंपनियां जब चाहें उन्हें भेजना बंद कर सकती हैं। अगर भारत को दुनिया में ताकत बनकर उभरना है, तो हमें खुद के उत्पाद विकसित करने होंगे। रक्षा मंत्रालय के साथ हाथ मिलाकर हमारे उद्योग को अब यही सीखना होगा।

हालांकि अभी तक यह स्पष्टï नहीं हुआ है कि नई रक्षा उत्पादन नीति के तहत तैयार की गई रक्षा प्रणालियों में कितने फीसदी विदेशी पुर्जे इस्तेमाल करने की इजाजत होगी। मौजूदा नीति के तहत हथियारों और प्रणालियों में 70 फीसदी तक विदेशी पुर्जे इस्तेमाल किए जा सकते हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड को रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि नई नीति में यह आंकड़ा घटाकर 50 फीसदी से भी कम करने पर विचार चल रहा है। इसके साथ यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि विदेशी पुर्जों से संबंधित बौद्घिक संपदा के अधिकार भारत के पास ही रहें।

रक्षा मंत्रालय ने नीति की दिशा में काम तो शुरू कर दिया है, लेकिन निजी क्षेत्र की देसी कंपनियों को अब भी उसकी नीयत पर शुबहा है। रक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली ऐसी ही एक कंपनी के मुख्य कार्य अधिकारी ने कहा, 'रक्षा मंत्रालय ने जब भी नीतियां तैयार की हैं तो उनमें रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनियों का पलड़ा भारी रखा गया है। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की नीति में भी उन्हें ही सबसे ज्यादा फायदा मिलता है। अगर मौजूदा नीति को कचरे के डिब्बे में डाल दिया गया और अनुसंधान और विकास पर जोर दिया गया तो सरकारी कंपनियां हाशिए पर जा सकती हैं।

Keyword: defence, weapons, CII, DRDO, DPB,
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