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एमसीआई को खत्म करने से संभव होगा सुधार?
के श्रीनाथ रेड्डी, विनय अग्रवाल /  June 02, 2010

रूपरेखा में बदलाव जरूरी

के श्रीनाथ रेड्डी
अध्यक्ष, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया

वर्ष 2005 में मैक्रोइकनॉमिक्स और स्वास्थ्य के राष्टïरीय आयोग की सह अध्यक्षता परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य मंत्री और वित्त मंत्री ने की। उन्होंने यह पाया कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई), राज्य मेडिकल काउंसिल और नर्सिंग काउंसिल ऑफ इंडिया (एनसीआई) को अपने प्रोफेशन के नियमन की जो जिम्मेदारी दी गई थी, उसे वे अच्छी तरह क्रियान्वयन करने में विफल रही हैं। इसके अलावा वे स्वास्थ्य शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी भी पूरा नहीं कर पाई हैं। एमसीआई/एनसीआई कानून में संशोधन करने की जरूरत है। एमसीआई के पदाधिकारियों की जगह पर प्रभावशाली व्यक्तियों की अनौपचारिक संस्था बनाने का मतलब लंबे समय से सुधार की जरूरत को अमलीजामा पहनाया जाए और एक बार फिर से इस काउंसिल की रूप रेखा में बदलाव लाया जाए जो स्वास्थ्य शिक्षा और स्वास्थ्य की देखभाल में अपना कोई योगदान नहीं दे रही है। केतन देसाई से जुड़ा मामला उजागर होने के बाद आम आदमी की नजर काउंसिल की अव्यवस्था पर पड़ी और सरकार ने फिर गंभीरता से इस मसले पर विचार करना शुरू कर दिया।

एमसीआई की स्थापना एक प्रोफेशनल संस्था के तौर पर 1933 में हुई थी। वर्ष 1956 में इंडियन मेडिकल काउंसिल ऐक्ट के जरिए इसमें बदलाव लाया गया और इसमें इंडियन मेडिकल रजिस्टर का प्रबंधन करने का निर्देश दिया गया। इसके अलावा आधुनिक एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिए दिशानिर्देश देने के साथ मेडिकल प्रोफेशन के लिए नीतियां बनाने और आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था का नियमन करने के साथ ही सरकार की विशेषज्ञ सलाहकारी संस्था के तौर पर काम करने के लिए कहा गया। इसके नियमन के दायरे से स्नातकोत्तर मेडिकल शिक्षा को अलग रखा गया था। पिछले दो दशक में काउंसिल ने जल्दबाजी में जो परीक्षाएं ली हैं, उससे यह अंदाजा मिलता है कि दिशानिर्देशों को किस तरह से नजरअंदाज किया गया है और काउंसिल अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर के काम में भी शामिल हो रही है।

देश में कितने डॉक्टर प्रैक्टिस कर रहे हैं, इसका पूरा ब्योरा देश में मौजूद नहीं है। हमें यह भी नहीं पता कि 5 दशक पहले पंजीकृत हुए डॉक्टरों का निधन हो गया है या रिटायर हो गए हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि एमसीआई देश की स्वास्थ्य सेवा की जरूरतों के मुताबिक स्वास्थ्य शिक्षा को नहीं बना पाई है।

फिलहाल देश में मेडिकल ग्रैजुएट छात्रों की संख्या बेहद कम है और जो हैं उनकी जानकारी भी अपेक्षाकृत कम है। एमसीआई ने मेडिकल कॉलेजों के विस्तार और वृद्घि पर नियंत्रण करने के लिए अलग तरह के मानक बनाए हैं। इस बात पर भी चिंता जताई जा रही है कि काउंसिल कम स्तर वाले संस्थानों को भी अनुमति दे रही है। एमसीआई के अधिकार एक अधिकारी के हाथ में चला गया जिसने गलत निर्वाचन व्यवस्था का इस्तेमाल अपनी शक्ति को बरकरार रखने के लिए किया। एमसीआई ने स्नातकोत्तर मेडिकल एजुकेशन का नियमन करना भी शुरू कर दिया जो उसके अधिकार के दायरे से बाहर है। स्नातक और स्नातकोत्तर शिक्षा के स्तर में देश भर में अंतर है और किसी कॉमन नैशनल क्वालीफाइंग परीक्षा का प्रावधान नहीं किया गया है। सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि मेडिकल शिक्षा मौजूदा स्वास्थ्य सेवा की जरूरतों के अनुरूप हो।


जल्दबाजी में न हो फैसला

विनय अग्रवाल
पूर्व महासचिव, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन

स्वास्थ्य सेवा से जुड़े भ्रष्टï लोगों को सजा देना तो अच्छी बात है लेकिन एक वैधानिक संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को खत्म करना बेहद खतरनाक होगा क्योंकि देश एमसीआई जैसी स्वतंत्र नियमन करने वाली संस्था को खो सकता है। यहां दो मसले हैं, एक भ्रष्टïाचार का और दूसरा सरकार के इरादे क्या हैं इसका। अगर किसी भ्रष्टï प्रैक्टिस की जानकारी मिलती है तो किसी भी तरह से आपको जिम्मेदारियों को तय करने और दोषी को सजा देने की जरूरत होती है। हालांकि सरकार अब तक भ्रष्टïचार के आरोपों को साबित करने में सक्षम नहीं रही है। लेकिन स्वास्थ्य शिक्षा पर बेहतर नियंत्रण करने के लिए एक वैधानिक संस्था को खत्म करना जल्दबाजी होगी।

आप इस मसले पर गौर करें। एमसीआई अध्यक्ष रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है। हालांकि एक बिचौलिये जिसके पास एमसीआई के अध्यक्ष को देने के लिए पैसा था, इस बयान के अलावा और कोई सबूत नहीं है। हालांकि फोन कॉल के जरिये एक कड़ी बनाने की कोशिश हो रही है।

सीबीआई ने इस केस को लिया और यह घोषणा कर दी कि यह एक बड़ा रैकेट है। सीबीआई ने जब यह बयान जारी किया था तब से 40 दिन बीत चुके हैं। इस अवधि के दौरान कोई दूसरी गिरफ्तारी नहीं हुई। यह पूरा एपीसोड मीडिया ट्रायल के जरिये चला। देश में करीब 300 मेडिकल कॉलेज हैं। कई कॉलेजों के बोर्ड में सांसद और राजनीतिज्ञ हैं। सवाल है कि इस जांच पड़ताल की अवधि के वक्त दूसरा कोई नेता इसमें शामिल क्यों नहीं पाया गया? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एमसीआई महज एक सिफारिशी संस्था है। अंतिम फैसला स्वास्थ्य मंत्रालय ही लेता है। इस पर कोई जांच नहीं हो रही है और स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों की इसमें क्या भूमिका हो सकती है इसका भी खुलासा नहीं हो पा रहा है।

अब एमसीआई की संरचना पर एक नजर डालते हैं। यह 160 सदस्यों की संस्था है जिसमें देश भर के मनोनीत और निर्वाचित मेडिकल प्रोफे शनल्स होते हैं। इसमें कई मेडिकल यूनिवर्सिटी के कुलपति भी शामिल होते हैं। इसमें केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत 8 सदस्य भी शामिल हैं। इसके अलावा राज्य सरकारें भी मनोनयन करती है। पूरी संस्था को खत्म करने का मतलब है कि सभी सदस्यों और सभी मेडिकल प्रोफेशनलों के काम पर सवाल उठाना।

ऐसा लगता है कि सरकार ने एमसीआई को खत्म करने के लिए मन बनाया है और यह नियंत्रण लेना चाहती है। क्या सरकार ने बड़े घोटाले का खुलासा होने के बाद क्या भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को खत्म किया? सरकार ने छह सदस्यीय संस्था बनाने का फैसला लिया है जो स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत प्रत्यक्ष रूप से काम करेगी और यह स्वास्थ्य शिक्षा नियमन प्रणाली की स्वतंत्रता को खत्म करेगी। एक प्रोफेशनल संस्था पर नेताओं और नौकरशाहों ने अपना दबदबा बनाया है।
ऐसा नहीं है कि सरकार ने पहली बार ऐसा कदम  उठाया हो। वर्ष 2005 में उस वक्त के स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास ने एमसीआई को खत्म करने के लिए कानून बनाने की नाकाम कोशिश की थी और स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत दूसरा काउंसिल बनाने का इरादा जताया था।

Keyword: MCI, NCI,India,
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