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असल मायने में वैश्विक
विनिंग एक्रॉस ग्लोबल मार्केट्स
सुनील जैन /  June 02, 2010

जब हम किसी भी वैश्विक कंपनी के बारे में सोचते हैं तो गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, याहू, ऐपल, सिस्को, एलजी, सैमसंग और नोकिया जैसी कंपनियों का नाम ही जेहन में उभरता है। कुल मिलाकर सभी कंपनियां बड़ी हैं, कामयाब हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि इनकी बिक्री का बहुत बड़ा हिस्सा अंतरराष्टï्रीय बाजार के जरिये आता है।

हालांकि एक बड़ा अंतर भी है। ऐपल को ही लें, इसकी बिक्री का 57 फीसदी हिस्सा उत्तरी अमेरिकी बाजार से आता है। माइक्रोसॉफ्ट के मामले में यह आंकड़ा 59 फीसदी का है, गूगल की भी 57 फीसदी बिक्री उत्तरी अमेरिकी बाजार में ही होती है, जबकि याहू के लिए तो यह आंकड़ा और भी बड़ा है। याहू की करीब 68 फीसदी बिक्री उत्तरी अमेरिकी बाजार में होती है। कंज्यूमर ड्यूरेबल्स बनाने वाली कोरियाई दिग्गज एलजी के लिए यह बाजार 22 और सैमसंग के लिए 46 फीसदी बिक्री मुहैया
कराता है।

अब जरा नोकिया की बात कर लेते हैं। फिनलैंड की मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली इस महाकाय कंपनी की कुल बिक्री में घरेलू बाजार की हिस्सेदारी महज 1 फीसदी है। दूसरी कई वैश्विक कंपनियों की तरह नोकिया में कोई अंतरराष्टï्रीय प्रभाग भी नहीं है। एक बात और गौर करने वाली है। यह बाजार वर्ष 1990 में 1.7 करोड़ से 2008 में बढ़कर 4 अरब तक जा पहुंचा है और इसके वर्ष 2013 तक बढ़कर 5.9 अरब तक पहुंचने की उम्मीद है। नोकिया की बुनियाद वर्ष 1865 में एक टिंबर कंपनी के तौर पर रखी गई थी। बाद में इसने इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में कदम रखा और आखिरकार 1990 में इसने जीएसएम फोन और उपकरण बनाने शुरू किए। इसके लिए कंपनी ने मैकिंजी की सलाहकार सेवाएं लीं।

नोकिया सही मायनों मेें वैश्विक कंपनी है जो तकनीकी क्षेत्र में बदलते रुख को देखते हुए नित नई तकनीकें पेश करती रहती है। नोकिया अपनी कमाई का कुल 10 फीसदी शोध एवं विकास (आरऐंडडी) पर खर्च करती है। अपनी नेटवर्क कंपनी नोकिया सीमंस नेटवर्क में तो कंपनी और भी ज्यादा रकम खर्च करती है। इसके लिए कंपनी अपनी कुल कमाई का 15 फीसदी आरऐंडडी पर खर्च करती है। कंपनी के एक तिहाई कर्मचारी भी इसके लिए ही काम करते हैं। आखिर शोध के लिए खास क्या है? इसके लिए शोध का काम करते हैं नोकिया शोध केंद्र (एनआरसी)। एक और चौंकाने वाली बात यह भी है कि एक भी एनआरसी केंद्र अस्तित्व में नहीं है।

ऐतिहासिक रूप से हेलसिंकी में मौजूद सबसे बड़ी प्रयोगशाला ही एनआरसी है लेकिन ऐसे तो सिलिकॉन वैली में भी है, चीन में भी है, भारत में भी मौजूद है और अफ्रीका में भी ऐसी प्रयोगशाला का अस्तित्व है। दरअसल एनआरसी अनुसंधान केंद्रों और प्रयोगशालाओं का वैश्विक नेटवर्क है। दुनिया भर में करीब ऐसी 10 प्रयोगशालाएं हैं। वर्ष 2004 तक नोकिया का 85 फीसदी तक अनुसंधान का काम फिनलैंड में ही होता था लेकिन वर्ष 2009 में करीब आधा अनुसंधान का काम फिनलैंड के बाहर अंजाम दिया गया। खासतौर से जर्मनी में काफी काम किया गया। इसी देश में सीमंस की भी मौजूदगी है। वैसे एशिया में भी विस्तार कम तेजी से नहीं हो रहा।

नोकिया वक्त के साथ हमेशा खुद को ढालती रही और इसने मध्यम बाजार पर ही अपना ध्यान लगाए रखा। एक ऐसे बाजार में जहां कुछ कंपनियां (एचटीसी) सस्ते की चाहत रखने वाले ग्राहकों को लुभाने की कोशिश में रहती हैं तो माइक्रोसॉफ्ट और ऐपल जैसी सॉफ्टवेयर में महारत रखने वाली कंपनियों के निशाने पर मोटी जेब वाले ग्राहक होते हैं। नोकिया ने इसके बीच अपना रास्ता तलाशा है। वैसे आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। चीन में स्थानीय कंपनियों की हिस्सेदारी वर्ष 2001 में 10 फीसदी से कम थी जो वर्ष 2003 में 55 फीसदी तक पहुंच गई। लेकिन ऐसे में भी नोकिया ने जबरदस्त प्रतिस्पद्र्घा के बीच अपनी वापसी की और चीनी कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी 38 फीसदी से नीचे पहुंच गई।

स्टेनबॉक के मुताबिक वर्ष 2008 में ऐपल ने 1.2 करोड़ आईफोन बेचे जबकि नोकिया ने करीब 46.8 करोड़ फोन बेचे। नोकिया के कुल फोन में से 6.1 करोड़ स्मार्टफोन थे जो मोबाइल कंप्यूटर और उनके अलावा कई सुविधाओं से लैस थे। यह बात बिलकुल सही है कि जब आप आईफोन और नोकिया के हैंडसेट की कीमत की तुलना करेंगे तो काफी बड़ा अंतर पाएंगे लेकिन आखिरकार यही तथ्य सामने उभरकर आता है कि नोकिया सही जगह निशाना लगाने में कामयाब हो जाती है। सभी वैश्विक और बड़ी कंपनियों की तरह नोकिया में भी एक खास तरह का ढांचा है। एक ही टीम को स्थानीय और वैश्विक जिम्मेदारियां भी थमा दी जाती हैं। कुल मिलाकर नोकिया अपनी बादशाहत बरकरार रखना चाहती है। भले ही एचटीसी या फिर ऐपल जैसी कंपनियां इसका बाजार हथियाना चाहें।  नोकिया का अपना एक नायाब और जुदा अंदाज है।

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