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सही मायने में कौन हैं सार्वजनिक कंपनियां!
पैनी नजर
सुनील जैन /  May 31, 2010

हाल ही में 3जी के लिए बोली लगाए जाने का काम समाप्त होने और 6.2 मेगाहट्र्ज से ज्यादा स्पेक्ट्रम वाली दूरसंचार कंपनियों से 3जी की बोली के हिसाब से भुगतान करने की ट्राई की सिफारिश आने के बाद एक सुझाव सामने आया कि बीएसएनएल एमटीएनएल से 3जी स्पेक्ट्रम छोड़ने को कहा जाए।

सार्वजनिक क्षेत्र के ये दोनों कंपनियां 3जी स्पेक्ट्रम केहोते हुए भी एक साल से बहुत कुछ नहीं कर पाई हैं, ऐसे में इस बात की क्या संभावना है कि वे अब कुछ करने में सक्षम होंगी? 3जी लाइसेंस के लिए एमटीएनएल व बीएसएनएल को क्रमश: 5825 करोड़ रुपये और 9665 करोड़ रुपये का भुगतान करना है, इसके अलावा उन्हें अपने पास मौजूद अतिरिक्त 2जी स्पेक्ट्रम के लिए क्रमश: 3096 करोड़ रुपये और 2631 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा।

ज्यादातर साथियों की भयभीत होते हुए यह प्रतिक्रिया थी कि यह पूरे बाजार को निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों के हवाले करने की कोशिश है, जब एक बार पीएसयू बाजार से बाहर हो जाएंगी तब उन्हें ऊंची कीमत वसूल करने की अनुमति मिल जाएगी। इस मुद्दे पर जिरह का आयोजन करने पर कुछ ऐसी ही चीजें उभरकर सामने आई हैं (बिजनेस स्टैंडर्ड हर हफ्ते इस तरह की जिरह का आयोजन अपने अखबार में करता है)।

बीएसएनएल-एमटीएनएल द्वारा 3जी स्पेक्ट्रम छोड़ने की बात सामान्य तौर पर कहने वाले लोग भी ऐसा कहने से हिचकिचाएंगे कि जब आप गांव जाते हैं तो वे सभी तर्क देते हैं कि वहां सिर्फ बीएसएनएल ही कनेक्टिविटी मुहैया कराती है।

एक ओर जहां भारत के उध्दारक केतौर पर सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका सराहनीय है, वहीं तथ्य तस्वीर के खांचे में फिट नहीं होते। ट्राई की सिफारिशों में दी गई सारिणी पर नजर डालने से इस बात की जानकारी मिलती है कि कौन सी दूरसंचार कंपनियां कितने गांवों को कवर करती हैं।

बीएसएनएल व एमटीएनएल ने कुल 285495 गांवों को कवर किया है जो कि देश के कुल गांवों का 48 फीसदी है। इस मामले में एयरटेल कुल 334891 गांवों को कवर करती है, जो कुल गांवों का 56 फीसदी है। रिलायंस की पहुंच देश के 53 फीसदी गांवों तक है जबकि टाटा की पहुंच 37 फीसदी गांवों तक।

संशयवादी तर्क देंगे कि गांवों को कवर करने का मतलब बहुत ज्यादा नहीं है क्योंकि वास्तव में इसका मतलब यह हुआ कि गांवों की पहुंच मोबाइल फोन टावरों तक है, मतलब उसका बनता है कि हर कंपनी के पास ग्राहकों की कितनी संख्या है। अगर एक बार आप ऐसा कर लेते हैं तो तुलना और भी खराब हो जाती है।

दिसंबर 2008 में भारती के पास 2.61 करोड़ ग्रामीण ग्राहक थे, वोडाफोन के पास 1.92 करोड़ और बीएसएनएल के पास 1.63 करोड़ ग्रामीण ग्राहक थे। एक साल बाद इसमें काफी बढ़ोतरी हो गई है - भारती की संख्या 4.32 करोड़ हो गई है, वोडाफोन की 3.03 करोड़ और आइडियास्पाइस 2.6 करोड़ ग्रामीण ग्राहकों के साथ तीसरे स्थान पर पहुंच गई है।

बीएसएनएल 2.24 करोड़ ग्राहकों के साथ चौथे स्थान पर है। इसका मतलब हुआ कि ज्यादा गांवों को कवर करने के अलावा निजी कंपनियां हर गांव से ज्यादा ग्राहक भी हासिल कर रही हैं। जब स्पेक्ट्रम की बात आती है तो स्थितियां बेहतर नजर नहीं आ रहीं।

निश्चित तौर पर बीएसएनएल-एमटीएनएल को एक साल पहले 3जी स्पेक्ट्रम दिया गया था, इसके बाद उनसे उम्मीद की जा रही थी कि वे बोली का मुकाबला करेंगी। लेकिन इसके अलावा उन्हें ज्यादा 2जी स्पेक्ट्रम भी दिया गया है। इस बाबत सवाल पूछे जाने की दरकार है। ट्राई की सिफारिशों में अन्य परिशिष्ट में इस बाबत काफी आंकड़े हैं।

पहले एमटीएनएल का मामला देखते हैं। दिल्ली में इसके पास 12.8 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम है जबकि भारती व वोडाफोन के पास 10-10 मेगाहट्र्ज - एक ओर जहां एमटीएनएल के पास 20 लाख ग्राहक थे, वहीं भारती के पास 54 लाख और वोडाफोन के पास 45 लाख।

भारती का कॉल सक्सेस रेट 98.89 फीसदी था, वोडाफोन का 99.42 और एमटीएनएल का 96.07 फीसदी। अगर कॉल ड्रॉप की बात करें तो भारती की 1.03 फीसदी, वोडाफोन की 0.78 फीसदी और एमटीएनएल की 1.2 फीसदी थी।

एमटीएनएल का किराया मुंबई में बेहतर है। इसके पास वहां 23.7 लाख ग्राहक हैं और 12 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम है जबकि भारती के पास 28.6 लाख ग्राहक और 9.2 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम। उधर, वोडाफोन के पास 47.6 लाख ग्राहक और 10 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम। दिल्ली की तरह कॉल सक्सेस रेट एमटीएनएल के लिए सबसे कम और कॉल ड्रॉप रेट सबसे ऊंची।

बीएसएनएल का मामला काफी अलग नहीं है। कोलकाता में इसके पास 16.7 लाख यूजर हैं और 10 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम है जबकि वोडाफोन के पास 32.2 लाख ग्राहक (9.8 मेगाहट्र्ज) और भारती के पास 26.9 लाख ग्राहक हैं (8 मेगाहट्र्ज)।

महाराष्ट्र में बीएसएनएल के पास 38.4 लाख ग्राहक हैं (10 मेगाहट्र्ज) जबकि भारती के पास 62.6 लाख (8.2 मेगाहट्र्ज), वोडाफोन के पास 58.9 लाख (6.2 मेगाहट्र्ज) और आइडिया के पास 82.8 लाख ग्राहक हैं (9.8 मेगाहट्र्ज)। बीएसएनएल के लिए कॉल सक्सेस रेश्यो सबसे कम है और कॉल ड्रॉप रेश्यो सबसे ज्यादा। ऐसी कहानी ज्यादातर राज्यों में दोहराई गई है।

यह देखते हुए कि निजी क्षेत्र ग्रामीण इलाकों में भी ज्यादा बेहतर सेवाएं दे रहा है और बेहतर गुणवत्ता भी मुहैया करा रहा है, ऐसे में आप आश्चर्यचकित होंगे कि वास्तविक सार्वजनिक क्षेत्र में कौन सी कंपनियां हैं।

ऐसा इसलिए क्योंकि बीएसएनएल-एमटीएनएल के उलट निजी क्षेत्र की कंपनियां रकम नहीं गंवा रही हैं - साल 2008-09 में 212 करोड़ के मुनाफे के मुकाबले एमटीएनएल ने 2009-10 में 2515 करोड़ रुपये का नुकसान उठाया है क्योंकि इसका राजस्व करीब 20 फीसदी गिर गया है।

बीएसएनएल के मामले में, लैंडलाइन बिजनेस में सरकार से 2600 करोड़ रुपये की सब्सिडी पाने और बैंक जमा से 3000 करोड़ रुपये का ब्याज हासिल करने केबाद भी साल 2008-09 में हुआ 575 करोड़ रुपये का लाभ साल 2009-10 में 2611 करोड़ रुपये के नुकसान में तब्दील हो गया।

3जी लाइसेंस की फीस में बीएसएनएल-एमटीएनएल को छूट देने का फैसला करते समय सरकार को इन चीजों पर निश्चित रूप से नजर डालनी चाहिए। ऐसा ही उन्हें 6.2 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम से ज्यादा स्पेक्ट्रम के लिए शुल्क लगाने की बाबत भी करना चाहिए।

Keyword: PSUs, 3G spectrum, auction, telecom companies, MTNL, BSNL,
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