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यूनियन राज का खात्मा
साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  May 29, 2010

काफी कम समय तक चली एयर इंडिया के कर्मचारियों की हड़ताल यह स्पष्ट करती है कि आक्रामक ट्रेड यूनियनवाद के दिन लद गए हैं।

टेलीविजन टॉक शो में चली बहस (जहां एयरलाइंस यूनियनों के प्रतिनिधि बचाव की मुद्रा में थे) और असहाय यात्रियों की दुर्दशा पर लोगों की सहानुभूति से इस बात में संदेह की काफी कम गुंजाइश रह जाती है। औद्योगिक कार्रवाई की बात पर देश का मूड बदल गया है। आधिकारिक आंकड़ों से भी स्पष्ट संकेत मिलता है।

अनुमान लगाइए कि साल 2009 में औद्योगिक कार्रवाई के कुल कितने मामले थे? आप यकीन नहीं करेंगे कुल 69 थे, जिनमें कामगारों की हड़ताल और प्रबंधन की तालाबंदी दोनों शामिल हैं। कार्य दिवस के नुकसान की संख्या 22.7 लाख थी। 1970 और 1980 के दशक पर नजर डालें तो यह आंकड़ा 10 गुना हुआ करता था।

अगर ज्वार की तरह उफान वाला कोई इकलौता मामला है तो वह है मुंबई की कपड़ा मिलों में 1982 में दत्ता सामंत के नेतृत्व में हुई लंबी हड़ताल। इस हड़ताल की समाप्ति हुई, पर सरकारी नियंत्रण के बिना मिलें दोबारा नहीं खुलीं, ऐसे में ज्यादातर मिलें बंद हो गईं।

मुंबई के कामगारों ने इससे सबक सीखा जिसे कोलकाता के कामगार पहले से ही जान चुके थे। वह यह कि यदि आप चीजों पर ज्यादा दबाव डालेंगे तो न सिर्फ आप वेतन बढ़ोतरी से हाथ धो बैठेंगे, बल्कि आप नौकरी भी गंवा देंगे। किसी उद्योग विशेष में 28 साल में ऐसी कोई घटना नहीं हुई है।

महत्त्वपूर्ण यह है कि अदालतों ने अपने रुख में बदलाव किया है। ऐसा भी समय था जब राजनीतिक पार्टियां और यूनियन बंद का आह्वान कर पूरे राज्य को ठप कर सकती थी। असुविधा व उत्पादन में हुए नुकसान के बारे में आप चाहें तो विरोध कर सकते हैं, वास्तव में अराजकता के हालात में, लेकिन कोई भी आपकी बात नहीं सुनेगा।

अब केरल उच्च न्यायालय ने बंद के खिलाफ फैसला दिया है और उच्चतम न्यायालय ने इसका समर्थन किया है। श्रम से जुड़े अन्य मामलों में भी नजरिये में समान रूप से बदलाव आया है। ऐसा भी समय था जब उच्चतम न्यायालय ने एयर इंडिया से करीब एक हजार कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स को कंपनी में स्थायी कर्मचारी के तौर पर खपाने को कहा था। अब उसी अदालत ने कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स के मामले में अपनी स्थिति में बदलाव कर दिया है, हालांकि कानून अपरिवर्तित रहा है।

प्रतिस्पर्धा के चलन से भी काफी बदलाव आया है। बैंकिंग, दूरसंचार और बीमा क्षेत्र में यूनियनों का एकाधिकार उनके ग्राहकों को नियंत्रित रख सकता है और पूरी आर्थिक व्यवस्था को बंधक बना सकता है। लेकिन जैसा कि विमानन क्षेत्र में हुआ, निजी कंपनियों ने उपभोक्ताओं को काफी विकल्प मुहैया कराए हैं और बलपूर्वक सत्ता हथियाने की यूनियनों की ताकत को कमजोर किया है।

अंतत: लोगों ने कारोबारी चक्र के उतार-चढ़ाव और नौकरी में बदलाव को जीवन की सच्चाई के रूप में स्वीकार किया है। कानून नहीं बदला है, पर व्यवहार बदल गया है। ऐसे सबूतों की संख्या बढ़ रही है जहां नियोक्ता न्यूनतम मजदूरी नहीं दे रहे, नौकरी की सुरक्षा देने से इनकार कर रहे हैं, ऐसे में पेंडुलम कभी भी दूसरी दिशा में जा सकता है।

एयर इंडिया के बॉस हो सकता है बड़े पैमाने पर बर्खास्तगी कर ज्यादा आगे चले गए हों, लेकिन फिलहाल प्रबंधकों को लग रहा है कि वे हवा के साथ चल रहे हैं। अंत में: श्रमिक आंकड़ों के बारे में। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल 45.9 करोड़ कामगार हैं, इनमें से 26.8 करोड़ खेती के काम में जुटे हैं।

बाकी बचे 19.1 करोड़ में से सिर्फ 2.6 करोड़ के बारे में ही कहा जाता है कि वे संगठित क्षेत्र में हैं (वैसे संस्थान जहां कम से कम 10 कर्मचारी हैं)। भविष्य निधि की व्यवस्था (वैसे संस्थान जहां कम से कम 20 कर्मचारी होते हैं) ज्यादा लोगों को कवर करती है, आपकी उम्मीद से कम नहीं यानी 4.5 करोड़ और वह भी 5.70 लाख संस्थानों में।

चूंकि पीएफ की व्यवस्था सदस्यों द्वारा हर महीने किए जाने वाले अंशदान से संबध्द है तो इसकी सदस्य संख्या संगठित क्षेत्र के मुकाबले ज्यादा भरोसेमंद होगी, जो कि निश्चित तौर पर निराशाजनक अनुमान है। इसके उलट देश की सबसे बडी ट्रेड यूनियन संस्था (सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस) के पास सत्यापित सदस्यों की संख्या 26 लाख है, जो कामगारों का संगठित क्षेत्र में छोटा अंश है।

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