बिजनेस स्टैंडर्ड - क्या दवा कंपनियों को बेचा जाना चाहिए?
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क्या दवा कंपनियों को बेचा जाना चाहिए?
जिरह
बीएस संवाददाता /  May 26, 2010

बेहतर मिलती कीमत पर बेच रहे हैं प्रवर्तक
परेश वैश
प्रबंध निदेशक, एल्वारेज ऐंड मार्शल इंडिया

पिछले कुछ वर्षों में देश में दवा उद्योग में जबदरस्त तेजी देखने को मिली है और आगे भी इसके सालाना 12 से 13 फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद है। वर्ष 2007 में दवा बाजार 7 अरब डॉलर का था जिसके 2012 तक 13 से 14 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है।

देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तेजी के अलावा जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों और स्वास्थ्य बीमा के बढ़ते दायरे जैसी कई वजह दवा उद्योग को तेजी देने में आगे रही हैं। आखिर ऐसे लुभावने बाजार में देसी दवा कंपनियां क्यों अपना कारोबार बेच रही हैं? इसके तीन कारण नजर आ रहे हैं।

पहला तो यही कि इन दवा कंपनियों को इतनी आकर्षक कीमत की पेशकश की जा रही है जो भविष्य में इस कारोबार से होने वाली आमदनी और अनुमानित वृद्धि के मुकाबले कहीं ज्यादा है। वैश्विक दवा कंपनियां की परंपरागत बाजार में संभावनाएं सीमित हैं और उन पर कीमतें घटाने के दबाव के साथ-साथ नियामक की सख्ती भी झेलनी पड़ रही है।

ये मजबूरियां वैश्विक दवा दिग्गजों को अपनी सीमाओं से बाहर दूसरे बाजारों में विस्तार करने को विवश कर रही हैं। भारत किसी भी लिहाज से बेहद आकर्षक बाजार है। इसका ही नतीजा है कि भीमकाय विदेशी दवा कंपनियां भारत में दवा कंपनियों को खरीदने के लिए उम्मीद से भी ज्यादा कीमत चुकाने को तैयार हैं।

इसकी हालिया मिसाल एबट द्वारा पीरामल के स्वास्थ्य सेवा कारोबार के अधिग्रहण से जुड़ी है जिसमें अधिग्रहण करने वाली कंपनी एबट ने पीरामल की बिक्री राजस्व की 9 गुना कीमत अदा की है। इस रुझान की दूसरी वजह है कि कई मामलों में हाथ बंधे होने की वजह से विस्तार के लिए बड़ी दवा कंपनियां दूसरा दांव खेल रही हैं।

इन कंपनियों को पता है कि वैश्विक स्तर पर नए उत्पाद पेश करके ही बाजी को अपने पक्ष में मोड़ा जा सकता है। इसके लिए ये कंपनियां एक बेहद कामयाब दवा बनाने पर जोर दे रही हैं। इसका तीसरा कारण है कि पूरे पोर्टफोलियो के विस्तार से जुड़ा है। भारत में दवा कंपनियों के प्रवर्तकों के पास दवा उद्योग से मिलने वाले मुनाफे की तुलना में कई दूसरे कारोबार में निवेश करने से ज्यादा मुनाफा कमाने का विकल्प मौजूद है।

ऐसे में जब भारतीय दवा कंपनियों के लिए बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां मोटी कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं तो देसी कंपनियों के प्रवर्तकों को लग रहा है कि क्या वे मौजूदा मुनाफे को देखते हुए इसी कारोबार में बने रहें या फिर अच्छी कीमत मिलने पर और ज्यादा मुनाफा देने वाले क्षेत्रों में निवेश करें।

वास्तव में रैनबैक्सी को बेचकर सिंह बंधु यही कर रहे हैं। वे स्वास्थ्य सेवाओं और वित्तीय सेवाओं के बाजार में आक्रामक रूप से अवसरों को भुना रहे हैं। दूसरी ओर मझोले स्तर की दवा कंपनियों के सामने हालात एकदम अलग हैं।

इनमें से कई कंपनियों बाजार के अनुमाने से भी तेज तरक्की कर रही हैं और अपनी वृद्धि से अपनी हैसियत में और इजाफा कर रही हैं। लेकिन बिक्री का दायरा कम होने से विदेशी कंपनियों के लिए यह लक्ष्य नहीं है।

भारतीय जेनेरिक उद्योग के अस्तित्व का सवाल
डी जी शाह
महासचिव, इंडियन फार्मा अलायंस

देसी दवा कंपनी पीरामल हेल्थकेयर के फॉर्म्यूलेशन कारोबार का अमेरिकी कंपनी एबट द्वारा किए गए अधिग्रहण से एक बार फिर बहस छिड़ गई है कि वैश्विक दवा कंपनियों की भारतीय जेनेरिक दवा कंपनियों में दिलचस्पी के क्या निहितार्थ हो सकते हैं।

सवाल यह उठ रहा है कि भारतीय दवा कंपनियों को बेचा जाना चाहिए या नहीं क्योंकि ये कंपनियों किफायती कीमत पर दवाएं बेचती हैं जो काफी सक्षम और सुरक्षित मानी जाती हैं जबकि वैश्विक दवा कंपनियां 'नई' के नाम पर महंगी दवाएं बेचने के लिए जानी जाती हैं।

ऑट्रिविन नाम की नाक में डालने वाली दवाई एक वक्त 5 रुपये में मिलती थी और अब वैश्विक दिग्गज उसके ही स्प्रे को 45 रुपये में बेच रही हैं। ऐसे में किफायत को लेकर लोगों की चिंताएं समझी जा सकती हैं। केवल हालिया अधिग्रहणों के संबंध में ही नहीं बल्कि जो बड़ी कंपनियां इस बाजार में बची हैं क्या वे भी अपना कारोबार वैश्विक दिग्गजों को बेचने की राह ही चुनेंगी।

भारतीय जेनेरिक उद्योग के अस्तित्व का सवाल बहुत बड़ा है। कोई भी यह तर्क दे सकता है कि अगर पीरामल के सौदे को आधार मान लें तो कुल 20 अरब डॉलर का भारतीय जेनेरिक कारोबार 180 अरब डॉलर में बिक सकता है। कुछ 50 अरब डॉलर से ऊपर के हालिया अधिग्रहणों को देखते हुए यह असंभव सी बात नहीं लगती। इस तरह की अफवाहें भी तैर रही हैं कि अब बिकने की किसकी बारी है।

भारत जैसे विकासशील देश में जहां दवा की कीमत बेहद मायने रखता है वहां इसको लेकर चिंता उठना जायज है। एनएसओ के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में इलाज के कुल खर्च में 79 फीसदी लागत दवाओं की होती है। ऐसे में अगर दवाओं की वैकल्पिक आपूर्ति बंद हो जाती है तो कम इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतें भी आसमान छूने लगेंगी। 

यह कुछ मुश्किल नजर आ रहा है कि विदेशी दिग्गज दवा कंपनियां दूसरी भारतीय जेनेरिक कंपनियों के लिए भी इतनी ऊंची बोलियां लगाने का दांव चलेंगी। वैसे एबट ने पीरामल के लिए जो कीमत लगाई है वह न केवल इस कंपनी के लिए बल्कि पूरे जेनेरिक उद्योग के लिए जश्न मनाने का मौका है।

इसके अलावा बचे हुए जेनेरिक खिलाड़ियों के लिए मुकाबले में एक खिलाड़ी कम ही हो गया क्योंकि अधिग्रहण के बाद एबट अपने हिसाब से काम करेगी। अगर यह सवाल किया जाएगा कि क्या भारतीय दवा कंपनियों को बिकना चाहिए या नहीं तो जो यही जवाब आमतौर पर सामने आएगा कि यह इस हिसाब से तय होना चाहिए कि उसके लिए कीमत क्या मिल रही है। 

इस कारोबार से जुड़े कुछ कारोबारी ऐसे भी हैं जो केवल पैसे पर ही नहीं सोचते। वह नाम और शोहरत को भी बराबर तरजीह देते हैं और जेनेरिक कारोबार उन्हें यह मौका मयस्सर कराता है। कई लोग मिशन की तरह से भी इस कारोबार को चला रहे हैं, जिनके लिए गरीबों तक कम कीमत पर दवा पहुंचाना भी कारोबार का एक मकसद है। एक और तबका है जो चुनौतियों पसंद करता है, उनसे दूर भागना नहीं।

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