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नीरस रही मनमोहन की राष्ट्रीय प्रेस कॉन्फ्रेंस!
दिल्ली डायरी
ए. के. भट्टाचार्य /  May 25, 2010

विदेश सचिव को नई नौकरी की तलाश करने की जरूरत नहीं पड़ी। आंतरिक आपातकाल लागू करने जैसी कठोर शक्ति का सहारा लेने की संभावना के बारे में किसी तरह का कोई विवादास्पद बयान नहीं दिया गया।

दोषी लोगों को पकड़ने की कोई समय सीमा भी तय नहीं की गई (जैसे बोफोर्स तोप सौदे में रिश्वत पाने वाले संभावित लोग)। यहां तक कि वेतन आयोग के गठन की घोषणा भी नहीं की गई। सोमवार को आयोजित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तीसरी राष्ट्रीय प्रेस कॉन्फ्रेंस (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस) एक नीरस घटना थी।

करीब 75 मिनट तक चली इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से कोई बड़ा संदेश निकलकर सामने नहीं आया। करीब-करीब पूरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसका सीधा प्रसारण किया। कॉन्फ्रेंस में कोई प्रमुख घोषणाएं नहीं हुई। न ही किसी तरह का कोई आवेश महसूस हुआ। यदि आप मनमोहन सिंह के पूर्ववर्तियों द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस से तुलना करें तो आपको इसका बेहतर अंदाजा लग जाएगा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में आखिरी सवाल का जवाब देते हुए राजीव गांधी सवाल पूछने के ढंग से थोड़े विचलित हो गए थे। उन्होंने मीडिया से कहा कि उन्हें अब नए विदेश सचिव का इंतजार करना चाहिए। संकेत स्पष्ट था। जल्दी ही विदेश सचिव ने पद त्याग दिया।

गांधी अपने विवादास्पद बयान से एक बार फिर मीडिया की सुर्खियां बन गए, उन्होंने कहा था कि अगर देश की आंतरिक स्थिति खराब हुई तो आंतरिक आपातकाल घोषित करने में उन्हें न तो पश्चाताप होगा और न ही ऐसा करने की वह अनिच्छा दर्शाएंगे।

बोफोर्स तोप सौदे में रिश्वत पाने वाले लोगों की पहचान व उन्हें दंडित करने के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने आपको असंभव सी दिखने वाली समय सीमा में बांध लिया। वह इस लक्ष्य को कभी भी हासिल नहीं कर पाए। सरकारी कर्मचारियों के वेतन ढांचे की समीक्षा करने के लिए मनमोहन सिंह ने भी साल 2006 में छठे वेतन आयोग गठित करने का ऐलान किया था।

सोमवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए समय का चयन असामान्य था। प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय प्रेस कॉन्फ्रेंस बड़ी घटना होती है, खास तौर से ऐसे समय में जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। दिन में 10.30 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन सही नहीं था क्योंकि टेलीविजन देखने के लिहाज से यह प्राइम टाइम नहीं था।

यहां तक कि गृहिणियां भी उस समय टीवी नहीं देखतीं और बिजनेस न्यूज चैनल उस वक्त शेयर बाजार के कारोबार पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। आदर्श समय दोपहर बाद तब होता जब शेयर बाजार का कारोबार बंद हो जाता या फिर इसे शाम में करीब 6.30 बजे रखा जा सकता था। इससे निश्चित तौर पर ज्यादा लोग टकटकी लगाए नजर आते।

अगर प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन पूर्वाह्न में किया जाता है तो इसका एक और अंतर्निहित नुकसान हो सकता है। विभिन्न विपक्षी राजनीतिक दल प्रधानमंत्री के वक्तव्य पर अपनी टिप्पणी के साथ सामने आ सकते हैं।

इसके उलट, अगर प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन शाम को जल्दी होता है तो शाम और रात के न्यूज बुलेटिन प्रधानमंत्री के वक्तव्य तक ही अपने आपको सीमित रख सकते हैं, अगर इसके उलट हुआ तो चैनलों का जोर इस बात पर रहेगा कि विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री के नीतिगत वक्तव्य पर क्या टिप्पणियां की।

कुल मिलाकर सोमवार शाम यही हुआ। विज्ञान भवन में 10.30 बजे प्रधानमंत्री के पहुंचने के कुछ मिनट पहले मीडिया प्रतिनिधियों के पास मनमोहन सिंह के शुरुआती बयान की कॉपी पहुंच चुकी थी। चूंकि मोबाइल फोन जैमर किसी अज्ञात वजह से संचालन में नहीं थे, लिहाजा पत्रकारों को सलाह दी गई कि वे प्रधानमंत्री के बयान वाली जारी प्रेस विज्ञप्ति के एम्बार्गो का तब तक ध्यान रखें जब तक कि प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू नहीं हो जाती।

यहां तक तो ठीक था। इसके बाद जो कुछ हुआ वह असामान्य था। प्रधानमंत्री के बयान को पढ़ा हुआ मान लिया गया। सरकार ने हालांकि कुछ समय तो बचा लिया, लेकिन इसने प्रोटोकॉल व प्रोपराइटी के साथ गंभीर समझौता कर लिया।

वित्त मंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह संसद में दिए जाने वाले भाषण में आखिरी समय में बदलाव के लिए जाने जाते थे और यहां तक कि सरकारी कार्यक्रमों में भी। कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि उनके बयान को पढ़ा हुआ मान लिया गया हो। प्रधानमंत्री केतौर पर भी उनके बयान (पिछली प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयान समेत) को कभी भी पढ़ा गया नहीं माना गया है।

मनमोहन सिंह अपवाद नहीं हैं और बयान नहीं पढ़ना मौके को गंवाने जैसा था। किसी विवादास्पद सवालों के जवाब देने में सतर्क रुख अपनाने वाले प्रधानमंत्री ने अपने आपको किसी विवाद में घसीटने का मौका नहीं दिया।

अपने सहयोगी मंत्रियों के आचरण पर उन्होंने कोई तीखी टिप्पणी नहीं की, चाहे उनके बीच मतभेद सार्वजनिक हो गए हों या फिर वे अपने मंत्रित्व की जिम्मेदारी के निर्वहन के बजाए अपने प्रदेश की राजनीति से चिपके हुए हों। हां, भारत-पाकिस्तान संबंधों के मामले में घटते भरोसे पर उन्होंने अपनी कोशिशों पर बयान जरूर दिया।

जम्मू कश्मीर में शांति बहाल करने की मुहिम और पार्टी के निर्देश के मुताबिक अपने पद पर तब तक बने रहना जब तक उनका भरोसा कायम हो और अगर पार्टी चाहे तो वह युवा लोगों के लिए रास्ता छोड़ने की बात भी उन्होंने कही।

राष्ट्रीय प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबसे बडी टिप्पणी विदेशी पत्रकार की तरफ से आई। कई विदेशी संवाददाता प्रधानमंत्री से सवाल पूछने के इच्छुक थे, लेकिन सिर्फ एक पत्रकार को ही मौका मिला और वह था  एक जापानी पत्रकार।

सवाल हालांकि पत्रकारों की समस्या से संबंधित थी कि उसे प्रेस सूचना ब्यूरो से मान्यता कार्ड मिलने में दिक्कत हुई और इसी वजह से वह प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए काफी देर से विज्ञान भवन में प्रवेश कर सका।

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