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विकास से ही होगा नक्सली समस्या का समाधान
अनसुनी आवाज
श्रीलता मेनन /  May 24, 2010

यदि किसी गरीब ग्रामीण की बेटी या उसकी पत्नी के साथ बलात्कार की घटना हो जाती है और पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती है तो ऐसी स्थिति में वह उन लोगों की ओर मदद के लिए मुंह ताक सकता है जो उसे खुद ही अपराधियों से लड़ने के लिए छोड़ देंगे।

ऐसी ही स्थिति उस समय भी पैदा हो जाती है जब किसी से उसकी जमीन औने-पौने दाम पर ले ली जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि व्यवस्था का शिकार हुआ वह व्यक्ति उन भूमिगत गुटों के पास जा सकता है, जो उसे हथियार देने की पेशकश करेंगे और सरकार समर्थित दुश्मनों से खुद ही लड़ने को कहेंगे।

अब सवाल यह है कि इस तरह के सशस्त्र पुरुषों और महिलाओं को राज्य के खिलाफ उनकी लड़ाई से कैसे दूर रखा जा सकता है? लोगों और सरकार के बीच कम होते भरोसे को कैसे बहाल किया जाए? इस बारे में राज्यों की तुलना में देश के गृह मंत्रालय को ज्यादा जानकारी है। 

इस समस्या से निपटने के लिए क्या उनके भाइयों और बहनों को विशेष पुलिस अधिकारियों के रूप में भर्ती किया जाए। क्या उनके घरों को निशाना बनाए जाने, उनके खेतों को जलाए जाने, उनके मवेशियों को चुराए जाने की अनुमति दे दी जानी चाहिए? क्या उनका समर्थन हासिल करने के लिए लोगों को विभाजित किया जाना श्रेष्ठ तरीका है?

इस मायने में मुख्यमंत्री रमन सिंह के नेतृत्व वाला राज्य छत्तीसगढ़ विजयी रहा है। रमन सिंह स्वयं इस रणनीति के सूत्रधारों में से एक हैं और उनकी पार्टी को उन पर गर्व है। नक्सलियों ने हाल ही में दावा किया था कि उनका मुख्य लक्ष्य दंतेवाड़ा में विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) पर हमला करना है, जो उन कई पुरुषों और महिलाओं के रिश्तेदार हैं जो नक्सल सेना का हिस्सा हैं।

क्या अवैध तरीके से सशस्त्र लोगों के खिलाफ लड़ाई में छत्तीसगढ़ को विशेष पुलिस अधिकारियों या कानूनी रूप से सशस्त्र लोगों की जरूरत नहीं रह गई है? इसके बजाय मेधाओं की पहचान किए जाने और उन्हें आजीविका की संभावनाओं से जोड़े जाने के लिए विशेष लोगों के कार्यालयों की जरूरत है।

अब उम्मीद की किरण नक्सलियों पर हवाई हमले से नहीं बल्कि प्रभावित इलाकों में अशिक्षितों के प्रशिक्षण के लिए 1,500 आईटीआई की स्थापना से जुड़ी है। इन अशिक्षितों को कौशल प्रदान कर और रोजगार की तलाश में उनकी मदद कर उम्मीद की नई किरण पैदा की जा सकती है।

श्रम मंत्रालय इस पहल में दिलचस्पी ले रहा है। इसके लिए मंत्रिमंडल की मंजूरी का इंतजार किया जा रहा है। इन क्षेत्रों के लिए एक विशेष मेधा विकास पहल भी है और इससे 250 कोर्स-कम-जॉब्स पैकेज संबद्ध हैं। अगर नक्सल-प्रभावित इलाकों में ऐसी पहल के खर्च की बात की जाए तो सभी प्रभावित इलाकों के लिए लगभग 3500 करोड़ रुपये की पहल चल रही है।

शायद रमन सिंह के लिए यह अच्छा मौका है कि वह यह साबित करें कि तुलनात्मक रूप से अधिक सफल रहे हैं। रमन सिंह ने नई दिल्ली में कई दिन मीडिया और केंद्र को नक्सलियों की करतूतों से अवगत कराने में बिताए हैं। इस पहल के तहत 250 मेधाओं की पहचान की गई है और छत्तीसगढ़ के लोगों की मेधा के अनुरूप पाठयक्रम तैयार किए गए हैं।

अगर राज्य और अधिक मेधाओं की तलाश करने में सफल रहता है और उनके लिए पाठयक्रम का सुझाव दे सकता है तो शायद लोग नौकरियों पर विचार करेंगे और बसों पर बमबारी को भूल जाएंगे। उदाहरण के लिए, पारंपरिक कला में शिक्षकों के लिए प्रमाणन पाठयक्रम शुरू किए जा सकते हैं। वे देश में विभिन्न डिजाइन स्कूलों का हिस्सा बन सकते हैं और युवा जातीय भारतीय रचनात्मकता के स्वरूप और रंग के बारे में क्राफ्ट्समेन से सीख सकते हैं।

इसके लिए तीरंदाजी, तैराकी और कुश्ती जैसे शहरी खेलों के लिए पाठयक्रम हो सकते हैं। निजी एजेंसियों की मदद से इन प्रतिभाओं का पूरे देश में इस्तेमाल किया जा सकता है। सिक्किम में एक ताइकवांडो चैंपियन टैक्सी चलाता है। वह और सिक्किम में उसके जैसे कई अन्य लोगों का इस्तेमाल देश में ताइकवांडो शिक्षकों के अभाव को पूरा करने में आसानी से किया जा सकता है।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में निर्माण की तेज रफ्तार ने सैकड़ों शहरी युवाओं के लिए उम्मीद की किरण दिखाई है। ये युवा अपार्टमेंटों, स्कूलों और संस्थानों में पूल में तैराकी कोच के तौर पर शामिल किए जा रहे हैं। इनमें से ज्यादातर युवा बहुत अधिक शिक्षित नहीं हैं, लेकिन उन्होंने वाईएमसीए से प्रमाणन हासिल कर लिया है। आज वे हर महीने कम से कम 8,000 रुपये कमाते हैं।

छत्तीसगढ़ में प्रतिभाशाली युवाओं की तादाद अच्छी-खासी है। सिंह को इन युवाओं की तलाश पर जोर देना होगा। वहां तीरंदाज हैं जो लंदन ओलंपिक्स में देश की उम्मीद बन सकते हैं। इसके अलावा अनगिनत अभिनव बिंद्रा भी अपना हुनर दिखाने का इंतजार कर रहे हैं।

यह इस राष्ट्र की सार्वजनिक संपत्ति है जिसकी तलाश श्रम मंत्रालय या खेल मंत्रालय द्वारा की जानी बाकी है। अगर रमन सिंह 25 मेधाओं की भी पहचान कर सकते हैं और उन्हें आय की संभावनाओं से जोड़ते हैं तो नक्सली शक्तिहीन हो जाएंगे।

Keyword: rural, poor, naxalites, chattisgarh, raman singh, police officers, scholarship,
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