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भारत में वैश्विक दवा कंपनियों की दिलचस्पी के क्या हैं मायने!
पैनी नजर
सुनील जैन /  May 24, 2010

इसे हद दर्जे की विडंबना ही कहा जाएगा कि जब ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) की वजह से मार्जिन कम होने लगे तब 1970 और 1980 के दशक में बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने भारत को अलविदा कह दिया था, लेकिन अब उनकी वापसी हो रही है।

दूसरी ओर कई भारतीय दवा कंपनियां इस कारोबार से अलग हो रही हैं क्योंकि वे कीमत नियंत्रण आदेश को कष्टदायक पा रही हैं। इस समूह में हाल में पीरामल हेल्थकेयर का नाम जुड़ा है जिसने अपनी 350 ब्रांडेड दवाइयां और एक विनिर्माण इकाई एबट लैबोरेटरीज को 3.72 अरब डॉलर (17000 करोड़ रुपये) में बेच दिया है।

इससे पहले साल 2006 में मेलन ने मैट्रिक्स लैबोरेटरीज को खरीदा था, दाइची सैंक्यो ने साल 2008 में रैनबैक्सी को, फ्रेंसेनियर ने 2008 में डाबर फार्मा को, सनोफी अवंतिस ने शांता बायोटेक को और 2009 में ही होसपीरा ने ऑर्किड केमिकल के इंजेक्टेबल बिजनेस को खरीदा था। निश्चित तौर पर, शुक्रवार को प्रेस को बताने में पीरामल हेल्थकेयर के सीएमडी अजय पीरामल को पीड़ा महसूस हो रही थी, भारतीय बाजार में काफी कुछ बचा हुआ है।

कुल मिलाकर, अगर हम ओईसीडी के बाजारों में होने वाले कम या नकारात्मक विकास से तुलना करें तो भारतीय उद्योग सालाना 15-20 फीसदी की दर से विकास कर रहा है, यही वजह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय दवा कंपनियों को खरीदना जारी रखे हुई हैं और आखिर एबट ने पीरामल को उसकी सालाना बिक्री की नौ गुना कीमत दी जबकि दाइची ने रैनबैक्सी को उसकी बिक्री का 4.5 गुना ही चुकाया था।

कहा जा रहा है कि इस बात में शायद ही संदेह होगा कि भारतीय कंपनियों को राह आसान नहीं नजर आ रही। कीमत नियंत्रण काफी प्रतिबंधात्मक हो गया है (महत्त्वपूर्ण दवाओं की कीमतें पाकिस्तान के मुकाबले भी 10-20 गुना कम है) और गंभीर रूप से आरऐंडडी में भी निवेश करने के लिए कंपनियों के पास थोड़ा ही बचा हुआ है, इसके परिणामस्वरूप वास्तव में कोई नई दवा सामने नहीं आ रही।

प्रतिस्पर्धा इतनी जबरदस्त है कि 10 अग्रणी कंपनियों के पास कुल बाजार हिस्सेदारी का 40 फीसदी है। यहां कुछ दवाओं मसलन सिप्रोफ्लोक्सेसिन के 101 ब्रांड हैं, गेटिफ्लोक्सेसिन के 67, सेट्रिजिन के 83 आदि। मैनकाइंड जैसी कम लागत वाली उत्पादक कंपनी ऊपर पहुंच गई हैं और पहले ही 10 अग्रणी कंपनियों में अपनी जगह बना चुकी हैं, नकली दवाओं का बाजार 25-30 फीसदी का है।

कुछ हद तक पीरामल जैसी कंपनियों ने अच्छा मुनाफा कमाया, हालांकि यह दशकों पुराने कुछ उत्पाद का दोहन कर रही थी। सबसे ज्यादा बिक्री वाली फाइजर की कोरेक्स और पीरामल की फेंसीडिल 40-50 साल पुरानी है। इस संदर्भ में भारत के हेल्थकेयर पिरामिड पर नजर डालना महत्त्वपूर्ण है।

रैनबैक्सी और पीरामल जो दवाइयां बनाती हैं वह स्वास्थ्य सेवा पर होने वाले कुल खर्च में सिर्फ 15 फीसदी का योगदान देता है, अस्पताल में भर्ती होने पर करीब 20 फीसदी और जांच आदि (डायग्नोस्टिक) में करीब एक चौथाई। यह बताता है कि रैनबैक्सी को बेचने के बाद आखिर सिंह बंधु अपनी रकम अस्पतालों में क्यों झोंक रहे हैं।

भविष्य में पीरामल के कारोबार का मुख्य हिस्सा ऐसे ही क्षेत्र से आने वाला है। एनस्थेटिक उत्पाद (गैस के साथ-साथ इन्जेक्टेबल दोनों) के मामले में कंपनी की गिनती दुनिया की 4-5 अग्रणी कंपनियों में होती है और पहले ही इस कारोबार से इसका कारोबार 450 करोड़ रुपये का है (जबकि एबट के बेचे गए इस कारोबार का कारोबार 2000 करोड़  का है), जबकि डायग्नोस्टिक्स का कारोबार 200 करोड़ रु. का है।

दोनों ही क्षेत्र में विकास की अच्छी क्षमता है, पर इसे कभी भी दवा की पारंपरिक परिभाषा में शामिल नहीं किया गया है और इस क्षेत्र में कीमत नियंत्रण भी नहीं है। पीरामल का बड़ा जुआ दवा की खोज पर ध्यान केंद्रित करने का है (न तो अजय और न ही स्वाति सोचती हैं कि यह जुआ है), भरोसा यह है कि जिन दवाओं की खोज विदेश में हो सकती है, उनकी खोज भारत में भी हो सकती है और वह भी कुल लागत के सिर्फ 10वें हिस्से में।

कंपनी के पास क्लिनिकल ट्रायल के विभिन्न चरणों में 14 अणु (मॉलिक्यूल) हैं। उसका दावा है कि इसके पास सूक्ष्म जीव की भारत की सबसे अच्छी लाइब्रेरी है, इसका अधिग्रहण हक्स्ट मेरिसन रसेस की भारतीय आरऐंडडी बिजनेस की खरीद के दौरान हुआ था और इसे भरोसा है कि कैंसर की दवा साल 2012 में बाजार में आ जानी चाहिए।

यह कहना मुश्किल है कि यह कंपनी की किस्मत किस हद तक बदलेगी, लेकिन इसे भी याद रखा जाना चाहिए कि एकल दवा से भी कई कंपनियों की किस्मत बदली है। वास्तव में, एबट को कंपनी बेचने की एक वजह पीरामल ने यह भी बताई है कि कंपनी अब रिसर्च पर सीधे पर्याप्त रकम झोंक सकेगी।

कहना मुश्किल है कि क्या यह रणनीति काम करेगी, खास तौर से तब जब आप अग्रणी वैश्विक कंपनियों पर नजर डालें जिन्होंने अरबों रुपये आरऐंडडी पर खर्च किए हैं और कई भारतीय कंपनियां इस क्षेत्र में नाकाम रही हैं। शायद यह भी वजह है कि चतुर पीरामल यह बताने से इनकार करते हैं कि 17000 करोड़ रुपये का कितना हिस्सा वे ग्रुप की भविष्य की योजना पर निवेश करेंगे।

यह निश्चित है कि करीब 4000 करोड़ रुपये प्रणव मुखर्जी को दिए जाएंगे क्योंकि कारोबार से अलग होने वाली दूसरी कंपनियों के उलट पीरामल ने संपत्ति की बिक्री की है, न कि स्टॉक बेचा है कि इसका फायदा सिर्फ पीरामल व मुट्ठी भर शेयरधारकों को मिलेगा, जो अनिवार्य रूप से एबट के ओपन ऑफर के हकदार होंगे।

ओवर द काउंटर बाजार के जरिए पीरामल करीब 150 करोड़ रुपये का कारोबार करते हैं - जैसे एस्प्रो, सेरिडॉन, आईपिल, लैक्टो कैलामाइन आदि  और इसमें बढ़ोतरी होगी अगर सरकार नियमों में बदलाव लाती है और कुछ मामलों में और दवाओं को डॉक्टर की पर्ची के बदले ओटीसी के जरिए बेचने की अनुमति देती है।

लेकिन पीरामल के पास हजार करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस बचा हुआ है जो मूल रूप से वह वैश्विक दवा कंपनियों के लिए बनाती है। चूंकि वैश्विक बाजार के विकास में सुस्ती का आलम है, ऐसे में कम लागत वाली दवाओं की जरूरत से इसमें इजाफा होगा।

निष्कर्ष यह है कि भारत की अग्रणी दवा कंपनियां इस कारोबार से इसलिए अलग हो रही है क्योंकि सरकारी नीति से उसे मदद नहीं मिल रही, इसी वजह से वे अविनियमित क्षेत्र (अस्पताल आदि) आदि क्षेत्रों को प्राथमिकता दे रही है या निर्यात बढाने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। यह उन लोगों को लिए काफी अच्छा समाचार हो सकता है जो घरेलू स्तर पर विकसित हुए जोरदार उद्योग की ओर नजरें टिकाए हुए हैं।

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