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यूनान संकट से अछूता है विदेशी मुद्रा भंडार
बीएस संवाददाता / कोच्चि May 22, 2010

यूनान संकट की वजह से यूरो मुद्रा में गिरावट का असर भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार पर नहीं पड़ेगा। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर के सी चक्रवर्ती का कहना है कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 16 राष्ट्रों की मुद्रा यूरो का बहुत छोटा हिस्सा है।

उनका कहना है, 'रुपये के साथ सभी मुद्राओं के मुकाबले डॉलर मजबूत हो रहा है। ऐसे में चिंता की कोई वजह फिलहाल नहीं है।' उनका कहना है, 'रुपये के लिहाज से हमारे भंडार में बढ़ोतरी हो रही है। हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी ज्यादा होती है। हम मुद्रा का प्रबंधन कैसे करेंगे यह सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं है।'

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत के निर्यात में यूरो की हिस्सेदारी 14 फीसदी है। पिछले साल मार्च में यूरो जोन में किए जाने वाले निर्यात में 14 फीसदी की तेजी आई और यह 39.4 अरब डॉलर हो गया। डॉलर के मुकाबले रुपये में 0.9 फीसदी की गिरावट आई और इस साल यूरो के मुकाबले इसमें 13.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

दूसरी ओर आरबीआई ने सभी बैंकों को छोटे और मझोले उद्यमों की मदद करने का निर्देश दिया है। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर के सी चक्रवर्ती ने बैंकों को छोटे और मझोले उद्यमों की मदद करने के लिए कहा है लेकिन दूसरी ओर इन उद्यमों को भी रियायती कर्ज न लेने की हिदायत दी है।

चक्रवर्ती ने छोटे और मझोले उद्यमों से जुड़ी एक रिपोर्ट को जारी करते हुए कहा, 'इन उद्यमों को रियायती कर्ज की उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि ये व्यावहारिक नहीं होंगे।' उनका कहना है, 'गरीब लोगों को समय पर कर्ज की जरूरत है न की सस्ते कर्ज की जरूरत है।' बैंक का कारोबार वहन करने योग्य कीमत पर की जानी चाहिए और बैंक को पर्याप्त ब्याज दर पर कारोबार करने की इजाजत होनी चाहिए।

उनका कहना है, 'छोटे और मझोले उद्यमों की स्थिति में सुधार पर जोर देंगे। वैश्विक मंदी के दौरान कुछ इकाईयों ने काम करना बंद कर दिया। फिलहाल कुछ खामियां हैं लेकिन हमें सामूहिक रूप से इस अंतर को कम करना है।'

भारत में 600,000 से ज्यादा गांव हैं। राष्ट्रीयकरण के 40 सालों के बाद भी केवल 35,000 गांवों तक ही बैंकों की सेवाएं पहुंच पाई हैं। उनका कहना है, 'हम बड़े पैमाने पर सबको वित्तीय मोर्चे पर शामिल नहीं कर पाए हैं। छोटे और मझोले उद्यमों को एकीकृत नियोजित वृद्धि का हिस्सा बनने की जरूरत है।'

मार्च 2012 तक 2000 से ज्यादा जनसंख्या वाले गांवों में बैंकिंग सेवाएं होनी चाहिए और 2015 तक सभी गांवों में बैंकिंग सेवाएं होनी चाहिए। हर घर में बैंक खाता होना चाहिए। ऐसा पिछले 40 सालों से नहीं हो पाया है क्योंकि तकनीक में काफी कमियां हैं। उनका कहना है छोटे और मझोले उद्यमों को कम लागत वाली तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए।

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