बिजनेस स्टैंडर्ड - निदेशक मंडल में मजूदरों की भागीदारी कितनी सही!
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निदेशक मंडल में मजूदरों की भागीदारी कितनी सही!
इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  May 20, 2010

श्रम मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे अपनी पार्टी (कांग्रेस) के आम आदमी के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अपनी ओर से जो भी बन पड़ रहा है, वह करने में जुटे हैं।

यही वजह है कि दो दशक पुराने प्रबंधन विधेयक में मजदूरों की सहभागिता, 1990 में फिर से जान फूंकने की कोशिश की जा रही है। इस कानून को राज्य सभा में पेश करने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था।

मंत्री अपने इस प्रयास को लेकर काफी गंभीर हैं और कोई भी इसमें कमियां नहीं ढूंढ सकता है। जैसा कि कुछ दिनों पहले बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित किया गया था, इस मसले को लेकर उन्होंने हाल ही में कोई एक राय तलाशने के लिए विभिन्न हित समूहों के प्रतिनिधियों के साथ बड़े पैमाने पर चर्चाएं की थीं।

एक ऐसे विधेयक पर आम सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसे जब पेश किया गया था तब ही उद्योगों की ओर से कड़ी प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा था। इस विधेयक में कहा गया है कि कंपनी बोर्ड के प्रबंधन में मजदूरों की महत्त्वपूर्ण और प्रभावकारी सहभागिता होनी चाहिए।

सरकार चाहती है कि सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां (पीएसयू) इसमें आगे आएं और मंत्री को लगता है कि 'इस पहल के बाद दूसरी इकाइयों को भी इसके लिए राजी किया जा सकता है।' हालांकि यह सोच कितनी कामयाब होती है, यह अलग बात है। मंत्री ने जिस दिन इस मसले पर अलग अलग प्रतिनिधियों से बात की, उसके ठीक एक दिन बाद एक पीएसयू के मानव संसाधन (एचआर) प्रमुख ने ही इस कदम को एक आपदा की संज्ञा दे दी।

उन्होंने कहा, 'अगर मालिक (सरकार) हम पर यह फैसला थोपते हैं तो हमारे पास कोई विकल्प नहीं रहेगा मगर प्रबंधन मजदूर-निदेशकों को औद्योगिक लोकतंत्र के लिए महज एक शोपीस की तरह समझेंगे।' इस एचआर निदेशक ने बताया कि उनकी कंपनी में कार्य परिषदों और कुछ दूसरे रूप में संयंत्र स्तर तक मजदूरों की भागीदारी है।

मगर बहुत छोटे-छोटे मुद्दों पर ही फैसले में मजदूर शामिल हुआ करते थे क्योंकि मजदूरों के प्रतिनिधि खुद नहीं चाहते कि वे अपनी दखल बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि खुद मजदूर यह कहते हैं कि प्रबंधन आपकी जिम्मेदारी है और हमें अपने फायदे से सरोकार है।

वहीं दूसरी ओर व्यापार संघ के नेताओं का कहना है कि प्रबंधन ऐसी बैठकों में मजदूरों के प्रतिनिधियों के साथ महत्त्वपूर्ण सूचनाएं बांटना ही नहीं चाहता है। प्रबंधन इसके पीछे यह दलील देता है कि उनके और प्रबंधन के वर्ग में बड़ा अंतर है। इन दोनों विचारों से यह तो पता चल ही जाता है कि दोनों ही वर्गों के बीच विश्वास की कमी है।

जब तब दो पक्षों में विश्वास न हो तो फिर ऐसे प्रयोग के सफल होने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। ऐसे में इस बात को लेकर शंका है कि क्या कानून ऐसे लोगों के नजरिये में बदलाव ला सकेगा। भारत के कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कर्मचारी-निदेशक हैं। मगर अधिकतर बैंक प्रबंधकों का कहना है कि इस सिलसिले में उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा है।

ज्यादातर मामलों में यह देखने को मिलता है कि ऐसे बोर्ड निदेशक या तो राजनीतिक कार्य दबाव की वजह से बोर्ड की बैठकों में हिस्सा ही नहीं लेते हैं या फिर बस एक ही राग अलापते रहते हैं- कर्मचारियों को अधिक से अधिक फायदा मिले। एक बैंक के निदेशक ने बताया, निदेशक के पास एक व्यापक परिदृश्य होना चाहिए। कोई निदेशक बोर्ड की बैठक में व्यापार संघ की मानसिकता को लेकर नहीं आ सकता है।'

जो लोग कंपनी के बोर्ड में मजदूरों की सहभागिता के पक्षधर हैं उनका कहना है कि बोर्ड में मजदूर प्रतिनिधियों की उपस्थिति मजदूरों के हितों की सुरक्षा करती है। ऐसे प्रतिनिधि यह सुनिश्चित कर सकते हैं शीर्ष प्रबंधन कोई ऐसा कदम न उठाए जो कर्मचारियों को नुकसान पहुंचाने वाली हों। साथ ही ऐसे प्रतिनिधि कर्मचारियों को फायदा पहुंचाने वाली हाउसिंग जैसी कुछ योजनाओं में निवेश के मामले में बोर्ड के सदस्यों को सुझाव भी दे सकते हैं।

मगर जो लोग इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं उनका कहना है मजदूरों के प्रतिनिधियों का ध्यान बोर्ड के बाकी सदस्यों से अलग होता है। साथ ही धीरे धीरे ऐसे मजदूर प्रतिनिधियों का मजदूरों के साथ संबंध प्रभावित होने लगता है।

दरअसल प्रतिनिधियों को लगने लगता है कि वे बोर्ड में शामिल होने के साथ ही मजदूरों से अलग हो गए हैं। परिणामस्वरूप जब कर्मचारियों के मसले को उठाना होता है तो ऐसे प्रतिनिधि बोर्ड के दूसरे सदस्यों के सामने उतने सफल साबित नहीं हो पाते हैं।

एचआर विशेषज्ञों का कहना है कि प्रबंधन में मजदूरों की भागीदारी की वकालत करने वाले जर्मनी के प्रयोग का उदाहरण पेश करते हैं जहां सबसे पहले इस तरह की कवायद शुरू की गई थी। इस तरह की पहल दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब जर्मनी का दोबारा से आर्थिक उद्भव हुआ तब शुरू की गई थी। उस समय वहां ऐसे कानून गढ़े गए थे कि कंपनी के पर्यवेक्षक बोर्ड में आधे से कुछ कम सदस्य मजदूरों के प्रतिनिधि होंगे।

शेयरधारक और व्यापार संघ पर्यवेक्षक बोर्ड के सदस्यों का चुनाव करता था जो कंपनी का आम एजेंडा तय किया करते थे। यह पर्यवेक्षक बोर्ड तब प्रबंधन बोर्ड का चुनाव किया करता था, जिसके जिम्मे कंपनी की रोजाना कार्य गतिविधियों की देखरेख हुआ करती थी। हर प्रबंधन बोर्ड में एक मजदूर प्रतिनिधि का होना जरूरी था।

जर्मनी के इस मॉडल को कई सालों तक औद्योगिक लोकतंत्र का सबसे बेहतरीन उदाहरण माना जाता था। मगर इस मॉडल के समर्थकों को हाल में कुछ जोरदार झटका लगा है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि इस मॉडल की वजह से ही प्रबंधक कड़े और अलोकप्रिय फैसले उठाने से कतराने लगे। अभी हाल ही में जर्मनी की कार निर्माता कंपनी के साथ जो हुआ उसका उदाहरण पेश किया जा सकता है।

कंपनी तमाम तरह के गलत फैसले लेने के लिए चर्चा में आ गई थी। ऐसी खबरें आई थीं कि कंपनी प्रबंधकों ने कर्मचारियों को अंधाधुंध भुगतान करना शुरू कर दिया था। इस लिहाज से भारत की स्थिति बेहतर है मगर निचले स्तरों पर ऐसे प्रयासों की जांच से पहले बोर्ड मंडली में मजदूरों की भागीदारी के लिए दबाव डालना सही नहीं होगा।

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