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क्या ट्राई का पक्ष सही है?
जिरह
बीएस संवाददाता /  May 19, 2010

सिफारिशें एकदम सही
एस सी खन्ना
महासचिव - एयूएसपीआई

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की सिफारिशें सुधारवादी, संतुलित हैं और सबसे अहम बात है कि इससे स्पेक्ट्रम का सही इस्तेमाल हो पाएगा। ये सिफारिशें उपभोक्ता के हित में हैं, इससे प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी और अतिरिक्त स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल से डिजिटल डिवाइड की खाई को पाटने में भी मदद मिलेगी।

मौजूदा जीएसएम कंपनियों को बिना किसी भुगतान के स्पेक्ट्रम मिलता रहा। अब दूरसंचार नियामक ने इस उदारता से तौबा करने का फैसला कर लिया। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि मौजूदा जीएसएम सेवा प्रदाता कंपनियों ने ट्राई पर इन सिफारिशों के जवाब में सार्वजनिक रूप से बेहद आक्रामक तरीके से हल्ला बोल दिया। 

इन सिफारिशों को छह महीनों से ज्यादा तक चली पारदर्शी परामर्श प्रक्रिया के बाद ही अंतिम रूप दिया गया। एयरटेल और वोडाफोन जैसी मौजूदा जीएसएम कंपनियों ने तो नियामक पर हमला करने में शालीनता की सारी हदें ही पार कर दीं। इन सिफारिशों से सरकारी राजस्व में इजाफा होगा और इससे तेजी से बढ़ते राजकोषीय घाटे को  काबू करने में मदद मिलेगी। 

उपभोक्ता पर भी कोई दबाव नहीं पड़ेगा। अगर ये सिफारिशें लागू होती हैं तो बाजार में सभी कंपनियों के लिए हालात एकसमान हो जाएंगे जो ज्यादा न्यायसंगत होगा। इससे स्पेक्ट्रम पर मौजूदा कंपनियों का एकाधिकार भी खत्म हो जाएगा।

मौजूदा जीएसएम कंपनियां असल मुद्दे को नेपथ्य में डालने के लिए ही मीडिया में अभियान चला रही हैं। इसका मकसद यही है कि उन्हें बिना कोई रकम चुकाए ही मूल्यवान स्पेक्ट्रम मिलता रहे। नियामक पर ऐसा हमला करने से इन कंपनियों का मकसद उसका हौसला तोड़ना है,ताकि जिस कीमती स्पेक्ट्रम पर वे वर्षों से कुंडली मारकर बठी हैं, उसे न तो उन्हें छोड़ना पड़े और न ही उसके लिए भुगतान करना पड़े।

भारी पड़ेगा ट्राई का दांव
राजन मैथ्यूज
महानिदेशक - सीओएआई

वर्ष 2008 में दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने स्पेक्ट्रम आवंटन और कीमत निर्धारण के लिए बहुस्तरीय समिति गठित की थी। वास्तव में ट्राई ने ही ऐसी समिति के लिए वर्ष 2007 में सिफारिश की थी। इसका मकसद था  कि सरकार स्पेक्ट्रम आवंटन और कीमत निर्धारण के लिए बाजार के रुख का ख्याल करे।

सभी लोगों की ऐसी ही राय थी कि स्पेक्ट्रम आवंटन का हिसाब बाजार की दिशा से तय हो और जो बोलीकर्ता कंपनी इसके लिए सबसे ज्यादा बोली लगाए उसे ही इसका अधिकार मिलना चाहिए क्योंकि वही कंपनी उसका सही और अधिकतम इस्तेमाल कर सकती है। इस समिति की रिपोर्ट ट्राई के समक्ष जुलाई 2009 में रखी गई थी।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ट्राई की सिफारिशों ने स्पेक्ट्रम सुधारों के लिए मिले ऐतिहासिक  अवसर का हिस्सा बनने का मौका खो दिया और डीओटी की विशेषज्ञ समिति के हर एक प्रस्ताव पर विरोधी स्वर अपना लिया। एक तरह से ट्राई ने स्पेक्ट्रम आवंटन की नीति को ही पूरी तरह से बदल दिया है।

इसने कहा है कि 108 मेगाहट्र्ज से ज्यादा का स्पेक्ट्रम आवंटित नहीं किया जाएगा और कंपनियां विलय और अधिग्रहण के जरिये 14.4 मेगाहट्र्ज तक का स्पेक्ट्रम हासिल कर सकती हैं। ट्राई ने जीएसएम और सीडीएमए दोनों तरह के स्पेक्ट्रम को लेकर भी अलग राय रखी है।

तकनीक पर आधारित सीमा और दूसरी सीमाओं को कम करना, लाइसेंस, मेट्रो शहरों, दूसरे सेवा क्षेत्रों और विलय और अधिग्रहण के घालमेल से ट्राई ने पूरे प्रबंधन को ही जटिल बना दिया है। ट्राई की सिफारिशों के तहत मौजूदा कंपनियों को लाइसेंस के मसले पर दिक्कतें आएंगी। इसमें की गई लेटलतीफी से सरकारी दूरसंचार घनत्व का लक्ष्य पाने में भी देरी होगी।

कीमतों के निर्धारण का प्रस्ताव और ज्यादा भ्रमित करने वाला है। ट्राई के प्रस्ताव बाजार में 70 फीसदी सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियों के हितों पर कुठाराघात करने वाले हैं। अगर इन सिफारिशों को माना जाता है तो भारतीय दूरसंचार बाजार में निवेश प्रभावित हो सकता है क्योंकि इसके बाद कई निवेशक इस बाजार में निवेश करने की नीति पर दोबारा सोच विचार करेंगे।

एक बेहद तेजी से तरक्की कर रहे क्षेत्र की रफ्तार को ये सिफारिशें कुंद कर सकती हैं। इससे ब्रॉडबैंड की रफ्तार भी प्रभावित होगी।

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