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डर के आगे जीत है, डर से निडर
मुश्किल क्षेत्रों में वीडियोकॉन के आगे बढ़ने की कहानी बयां कर रही हैं
सायंतनी कर /  May 17, 2010

वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष वेणुगोपाल धूत के सामने लक्ष्य एकदम तय है। वह चाहते हैं कि तीन साल के भीतर कम से कम 10 करोड़ लोग उनकी मोबाइल सेवाओं के ग्राहक बन जाएं।

इतनी बड़ी तादाद में ग्राहकों को हासिल करने में देश की सबसे बड़ी मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी भारती एयरटेल को 14 साल लगे, वोडाफोन 15 साल में यह मुकाम हासिल कर पाई और रिलायंस कम्युनिकेशंस को इस मंजिल तक पहुंचने के लिए सात साल का सफर तय करना पड़ा।

वैसे ये बातें धूत को कतई परेशान नहीं करतीं। इस निशाने पर तीर लगाने के लिए वह 14,000 करोड़ रुपये का निवेश करने के लिए भी तैयार हैं। भारत शायद दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता दूरसंचार बाजार है और एक अनुमान के तहत करीब 60 करोड़ मोबाइल ग्राहकों का आंकड़ा जल्द ही 80 करोड़ के स्तर को छू सकता है।

बहरहाल इस तेजी में कंपनियों के लिए एक चेतावनी भी छिपी है कि यह बाजार बेहद प्रतिस्पर्द्धी भी है। गलाकाट मुकाबले की जंग ने मौजूदा कंपनियों के मुनाफे पर तगड़ी चोट कर खतरे की घंटी बजा दी है। पिछले एक साल में जीएसएम के जरिये प्रति ग्राहक होने वाली आमदनी 35 फीसदी गिरकर 144 रुपये महीना हो गई है वहीं सीडीएमए प्लेटफॉर्म पर हर महीने होने वाली एक ग्राहक से कमाई 26 फीसदी घटकर 82 रुपये हो गई।

सवाल उठता है कि वीडियोकॉन आखिर क्यों दूरसंचार क्षेत्र में दाखिल होना चाहती है? टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार में यह बड़ी कंपनी है, बावजूद इसके कि एलजी और सैमसंग जैसी कोरियाई दिग्गजों का इस बाजार में दबदबा कायम है। तेल एवं गैस क्षेत्र में भी इसका दायरा फैला हुआ है।

गुजरात के तट पर मौजूद रावी तेल क्षेत्र में वीडियोकॉन की 25 फीसदी हिस्सेदारी है, ब्राजील, मोजांबिक, ऑस्ट्रेलिया और तुर्की में भी तेल एवं गैस क्षेत्रों में इसकी हिस्सेदारी है। एक ओर जहां रावी से उत्पादन शुरू हो चुका है वहीं दूसरे क्षेत्र अभी अन्वेषण के दौर से ही गुजर रहे हैं। कंपनी ने हाल ही में डायरेक्ट टू होम (डीटीएच) कारोबार में भी कदम रखा है।

कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स के बाजार में मुनाफा मार्जिन दबाव में है लेकिन तेल और गैस क्षेत्र में अच्छा मुनाफा मिल रहा है। डीटीएच कारोबार में कंपनी अभी निवेश ही कर रही है। यहां भी खतरा कम नहीं है। इस क्षेत्र को तकरीबन 5,000 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है, फिर भी कंपनी इसमें दाखिल होने से गुरेज नहीं कर रही है।

धूत कहते हैं, 'भारत में अभी भी टेली घनत्व 46 फीसदी है। हम लंबे वक्त के लिए इसमें शामिल हुए हैं। एक बात और कि हम जब किसी क्षेत्र में प्रवेश करते हैं तो शुरुआत में मुनाफा काफी कम रहता है लेकिन बाद में तस्वीर बदल जाती है। जैसे कि 1994 में तेल और गैस क्षेत्र में मुनाफा कम था जो बाद में काफी बढ़ गया।'

सेक्टर विश्लेषकों का कहना है कि वीडियोकॉन दूरसंचार में अपने अंशधारकों को बढ़िया सौगात दे सकती है। कुछ दूसरी कंपनियों की तरह किस्मत ने इस पर भी मेहरबानी की और महज 1,651 करोड़ रुपये में इसने स्पेक्ट्रम हासिल किया था। आप अंदाजा लगाइए कि जब वीडियोकॉन के खाते में जब 10 करोड़ ग्राहक होंगे तो इसकी हैसियत क्या हो जाएगी? करीब 13.8 करोड़ ग्राहकों वाली भारती एयरटेल का बाजार पूंजीकरण 1,11,780 करोड़ रुपये है।

वीडियोकॉन के पास कुल 22 सर्किलों में से 19 के लिए ही स्पेक्ट्रम मौजूद है। इस मामले में यह यूनिनॉर, टाटा डोकोमो और अखिल भारतीय लाइसेंस रखने वाली दूसरी कंपनियों से थोड़ा पीछे है। धूत अपनी दूरसंचार कंपनी की 26 फीसदी हिस्सेदारी किसी विदेशी दिग्गज को बेचने की संभावनाओं को भी नहीं झुठलाते।

विस्तार की योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए उन्हें रकम की दरकार है।  भारतीय स्टेट बैंक ने उन्हें 7,000 करोड़ रुपये का कर्ज मुहैया कराने का आश्वासन दे दिया है। इसके बाद भी उन्हें 7,000 करोड़ रुपये की जरूरत तो पड़ेगी। यहीं पर हिस्सेदारी बेचने का दाव कारगर नजर आता है।

यह चर्चा भी जोरों पर रही कि फ्रांसीसी कंपनी विवेंदी, वीडियोकॉन से हिस्सेदारी खरीद रही है लेकिन बाद में इन चर्चाओं पर विराम भी लग गया। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वीडियोकॉन का पूंजीगत खर्च अनुमान से ज्यादा रह सकता है क्योंकि इसके पास केवल 4.4 मेगाहट्र्ज का स्पेक्ट्रम है। इसलिए या तो किसी दूसरे ऑपरेटर के साथ हाथ मिलाना होगा या फिर नया स्पेक्ट्रम हासिल करना होगा, जिसके लिए 2,500 से 3,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।

ब्रांड की बढ़त

वीडियोकॉन ब्रांड नाम जाना-पहचाना है और इसके पास व्यापक वितरण नेटवर्क पहले से ही मौजूद है। धूत कहते हैं, 'पिछले 25 साल में हमारे ब्रांड ने अपनी खास पहचान बनाई है। बिक्री के बाद अपनी बेहतरीन सेवाओं के दम पर हम देश के दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचने में कामयाब रहे हैं।

हमारी सर्विस और व्यापक दायरा तीन साल में 10 करोड़ ग्राहकों का लक्ष्य पूरा करने का विश्वास जगाता है।' कुछ विश्लेषक भी धूत की राय से इत्तेफाक रखते हैं। केपीएमजी में दूरसंचार सेवाओं के प्रमुख रोमल शेट्टी कहते हैं, 'यूनिनॉर जैसे नए खिलाड़ियों की तुलना में वीडियोकॉन के पास पहले से ही स्थापित ब्रांड नाम है और कंपनी इस पर दाव लगा सकती है।'

एलजी, इलेक्ट्रोलक्स और फिलिप्स के साथ काम कर चुके और फिलहाल मिलाग्रो बिजनेस नॉलेज सॉल्यूशंस के संस्थापक राजीव करवाल का कहना है, 'पहले से मौजूद कंपनियां मजबूत ब्रांड बन चुकी हैं। बीते वर्षों में इन कंपनियों ने ग्राहकों के साथ एक भावनात्मक रिश्ता भी बना लिया है। इसको देखते हुए वीडियोकॉन के सामने गलती की गुंजाइश नहीं बचती।'

स्थापित ब्रांड के अलावा मजबूत और व्यापक नेटवर्क भी वीडियोकॉन को बढ़त दिलाता है। टिकाऊ उपभोक्ता सामान को बेचने के लिए कंपनी के पास 50,000 डीलर हैं। इसके अलावा नेक्स्ट और प्लैनेट एम के 1,000 से भी ज्यादा रिटेल स्टोर इसे और मजबूती देते हैं।

इससे भी बढ़कर कंपनी 20,000 अलग से स्वतंत्र डीलर बनाने की योजना बना रही है और इसके बाद तीन महीनों में और 25,000 जोड़ने की तैयारी है। वैसे इतना भर काफी नहीं है इसे और हाथ-पैर मारने होंगे। इस साल के आखिर तक भारती एयरटेल के डीलरों की तादाद बढ़कर 20 लाख तक पहुंच जाएगी।

धूत बेफिक्री से जवाब देते हैं, 'एयरटेल 11 करोड़ से ज्यादा ग्राहकों का दावा करती है। एक ब्रांड के तौर पर वीडियोकॉन पहले से ही 16 करोड़ लोगों तक पहुंच चुकी है।' दूरसंचार बाजार के आंकड़े कहते हैं कि एक साल के भीतर करीब 50 फीसदी ग्राहक अपनी मौजूदा मोबाइल सेवा प्रदाता को छोड़ कर दूसरी कंपनी के साथ हो लेते हैं।

वीडियोकॉन इसी मौके को ताड़ रही है। वैसे दूरसंचार बाजार में दस्तक देने वाले नए खिलाड़ी को अपना खुद का बुनियादी ढांचा खड़ा नहीं करना पड़ता। जैसे कि टॉवर। नई कंपनियां पुराने दिग्गजों के टॉवर किराए पर लेकर अपना काम चला सकती हैं। इससे नई कंपनियों का पूंजीगत खर्च काबू में रहता है।

इस मामले में वीडियोकॉन ने तो तकरीबन 80 फीसदी टॉवर किराए पर ही लेने की योजना बनाई है। जहां पर नेटवर्क कमजोर होगा कंपनी वहीं अपना टॉवर लगाएगी। यही बात है टेलीविजन पर अपने पहले प्रचार अभियान में कंपनी ने 'सिग्नल' के मोर्चे पर खुद को दूसरों से अलग बताने का संदेश दिया।

अपने नेटवर्क की ताकत के बारे में शेखी बघारने के बजाय कंपनी ने 'पकड़ो लाइफ का सिग्नल' जैसी लाइन के जरिये अपना संदेश देने की कोशिश की। इलाके के हिसाब से अलग टैगलाइन भी गढ़ी गई।

वीडियोकॉन मोबाइल सर्विसेज में विपणन के प्रमुख सुनील टंडन कहते हैं, 'राष्ट्रीय चैनलों पर क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञापन दर्शकों की भावनाओं पर असर डाल सकता है।' कंपनी ने मीडिया में विज्ञापनों के लिए एकमुश्त खरीद की है इससे विज्ञापनों पर आने वाली लागत 5 से 10 फीसदी कम हो सकती है।

आक्रामक योजना

कंपनी अपने मकसद को हासिल करने के लिए किसी भी हद तक आक्रामक होने को तैयार है। बाजार में इस तरह की चर्चा जोरों पर है कि वीडियोकॉन एक साल में एक विशेष एयरटाइम तक फोन इस्तेमाल करने के बदले एलसीडी टीवी देने की तैयारी कर रही है।

विश्लेषकों का कहना है कि वीडियोकॉन अपने मोबाइल हैंडसेट के साथ भी अपने कनेक्शन बेच सकती है। इसकी एक शर्त होनी चाहिए कि इस योजना का फायदा उठाने वाले ग्राहकों को कम से कम दो साल या फिर एक विशेष अवधि तक कंपनी की मोबाइल सेवाओं का इस्तेमाल करना होगा।

अर्न्स्ट ऐंड यंग में तकनीक, संचार और मीडिया के विश्लेषक अमित सचदेव कहते हैं, 'टैरिफ में कमी करने के बजाय कंपनियां हैंडसेट पर छूट दे सकती हैं। इस तरह से जो ग्राहक कुछ अवधि तक चलने वाले टैरिफ योजनाओं के चलते कंपनी से जुड़ते हैं, ज्यादा लंबे समय तक कंपनी के साथ बने रह सकते हैं।'

अमेरिका और यूरोप जैसे बाजारों में यह चलन बेहद आम है। कंपनी के पास हैंडसेट की विस्तृत श्रृंखला भी मौजूद है। धूत कहते हैं, 'हैंडसेट कारोबार हमें अपना नेटवर्क बढ़ाने में भी मदद करेगा। यह हमें युवाओं को पसंद आने वाले एप्लीकेशन और कीमतों में लचीलापन लाने में भी सहायता करेगा।'

डीटीएच की बिक्री के लिए ऐसा ही फॉर्र्मूला आजमाया जा रहा है जिसमें टीवी और डीवीडी दिए जा रहे हैं। फिलहाल धूत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि अगले तीन साल में वह बचे हुए 9.9 करोड़ ग्राहक कहां से लाएंगे?

फायदे की सौगात

जाना-पहचाना ब्रांड नाम
बिक्री के लिए नेटवर्क
सस्ते में मिला स्पेक्ट्रम

नुकसान का सबब

दूरसंचार में घटता मुनाफा
डीटीएच कारोबार बेदम
दोनों में तगड़ी प्रतिस्पर्धा

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