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2011 की जनगणना में क्या हैं चुनौतियां!
जाति आधारित आंकड़े इकट्ठा करना एक बड़ी चुनौती है, मगर इन्हें मूल जनगणना की प्रक्रिया से अलग करना होगा ताकि लोग गलत जानकारियां उपलब्ध कराने से परहेज करें। बता रहे हैं
अमिताभ कुंडू /  May 17, 2010

वर्ष 2011 की भारतीय जनगणना दुनिया में सबसे बड़ी होगी। इस जनगणना में सामाजिक-आर्थिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आंकड़े इकट्ठे किए जाएंगे जिनमें पहचान से जुड़ी व्यक्तिगत सूचनाएं भी शामिल होंगी।

जनगणना के लिए मकानों की पहचान का काम 1 अप्रैल 2011 से शुरू हो चुका है। जनगणना की वास्तविक प्रक्रिया अगले साल फरवरी में शुरू होगी मगर इसे लेकर तैयारियां शुरू की जा चुकी हैं। भारत में जनगणना यहां की आबादी की सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं के बारे में सूचनाएं इकट्ठा करने के उद्देश्य से की जाती हैं।

देश में जनगणना की रूपरेखा कभी भी इस तरीके से नहीं तैयार की जाती है कि इसके जरिए राष्ट्रीय नीतियों या कार्यक्रमों के प्रभावों की जांच की जा सके। क्योंकि अगर ऐसा किया जाएगा तो जो प्रतिक्रियाएं मिलेंगी वे पक्षपातपूर्ण हो सकती हैं। यहां तक कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) को भी नियमित अंतराल पर कराया जाता है और इसके जरिए इस उद्देश्य को पूरा करने की कोशिश की जाती है।

मकानों की पहचान और उनकी गिनती के साथ-साथ राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के लिए सूचनाएं इकट्ठा करने का काम भी किया जा रहा है। इस तरह जो जानकारियां एकत्र की जाएंगी उन्हें विशिष्ट पहचान कार्ड से संबंधित एजेंसियों के पास भेज दिया जाएगा। जनगणना का वास्तविक काम फरवरी-मार्च 2011 से शुरू किया जाएगा।

दरअसल यूआईडी का मुख्य उद्देश्य गरीबी-उन्मूलन कार्यक्रमों को अधिक कारगर तरीके से लागू करना और उनमें मौजूद खामियों को दूर करना है। इस योजना का एक और उद्देश्य देश में सुरक्षा समस्याओं को हल करना है।

यूआईडी का एक उद्देश्य उस आबादी को लाभ प्राप्त करने वाली सूची से बाहर करना भी है जो इसके योग्य नहीं हैं। इस तरह कोई भी एजेंसी किसी नीति को अपनाकर 'अन्य' (ऐसे लोग जो दूसरे राज्य या जिलों से आए हों या फिर जिन्होंने किसी खास तारीख के बाद किसी क्षेत्र में प्रवेश किया हो) को इस सूची से हटा पाएगी।

कई बड़े शहर अपनी भूमि और झुग्गी-बस्ती संबंधित नीतियों की वजह से शहरीकरण के दौर से गुजर रही हैं। हाल ही में आए प्रवासियों को नागरिक सुविधाओं के इस्तेमाल से दूर रख कर यूआईडी शहरीकरण की दर को धीमा करने में मदद कर सकती है जो कि पहले से ही काफी कम हो चुकी है। यहां तक कि 11 वीं पंचवर्षीय योजना में भी इस पर चिंता जताई गई है।

इस सूची में से किन्हें निकालना है और किनका नाम इनमें जोड़ना है इसे लेकर अलग अलग राज्यों की अपनी अलग अलग राय होगी। उनकी गतिविधियों के लिए यूआईडी को दोष नहीं दिया जा सकता है, मगर इस तरह उन्हें एक शक्तिशाली हथियार मिल जाएगा।

अपनी सूची से अयोग्य लोगों को निकालने के लिए उन्हें एक महत्त्वपूर्ण पका-पकाया आंकड़ा मिल जाएगा। ठीक इसी तरह राजनीतिक पार्टियां और सामाजिक संस्थाएं भी अपना एजेंडा पूरा करने के लिए इन आंकड़ों का इस्तेमाल कर सकेंगी।

प्रोफेसर अमर्त्य सेन ने अपनी किताब 'आइडेंटिटी ऐंड वॉयलेंस' में कहा है कि कई ऐसी पहचान हैं जिनका इस्तेमाल विभिन्न समुदायों के बीच भेदभाव और हिंसा फैलाने के लिए किया जाता है। अगर ऐसे आंकड़े और सूचनाएं इकट्ठा कर ली जाएंगी तो सरकार यह कैसे सुनिश्चित कर पाएगी कि इनका इस्तेमाल सीमित उद्देश्यों के लिए ही किया जाएगा।

जैसे कि सरकारी कार्यक्रमों पर निगरानी रखने के लिए ताकि उन्हें और प्रभावी बनाया जा सके। सरकार यह कैसे सुनिश्चित कर पाएगी कि इन सूचनाओं का इस्तेमाल विभिन्न समुदायों में भेदभाव फैलाने के लिए नहीं किया जाएगा।

एक बात तो तय है कि यूआईडी से एक राज्य से दूसरे राज्य में आने वाले प्रवासियों की गतिविधियों को कुछ धक्का तो जरूर लगेगा। वर्ष 2011 की जनगणना के विश्लेषण से यह उजागर होता है कि 90 के दशक में जो लोग शहरी इलाकों में आकर बसे उनमें से आधे से अधिक ने इस जनगणना के दौरान यह कहा कि वे 10 से अधिक साल से वहां रह रहे हैं।

दरअसल कुछ नागरिक सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए लोग अपने प्रवास की अवधि के बारे में बढ़ा चढ़ा कर बताते हैं। मगर अब यूआईडी के बाद ऐसा कर पाना आसान नहीं होगा और प्रशासन को ग्रामीण इलाकों से बड़ी तादाद में शहरों में आकर बसने वाली आबादी पर रोक लगाने के लिए एक सशक्त हथियार मिल जाएगा।

माना जा रहा है कि 2011 की जनगणना में ऐसे कम ही लोग होंगे जो इससे वंचित रह जाएंगे। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि लोग खुद इस जनगणना में खुद को शामिल करवाना चाहेंगे क्योंकि इस तरह उन्हें एक औपचारिक पहचान मिल रही होगी। हालांकि एक संभावना यह भी बनती है कि इन आंकड़ों का दुरुपयोग किया जाए और पूर्व की जनगणना से इसकी तुलना करना मुमकिन ही नहीं रहेगा।

एनपीआर के लिए जब सूचनाएं इकट्ठा की जाएंगी तो इस दौरान वयस्कों की उंगलियों के निशान भी एकत्र किए जाएंगे मगर ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि ये सूचनाएं अपना हित साधने की फिराक में रहने वाले लोगों के हाथ में न पड़ जाएं। यूआईडी से जुड़े कुछ जटिल मसलों पर जितनी चर्चा होनी चाहिए थीं उतनी नहीं की गई हैं।

यूआईडी तैयार करना महज 10 फीसदी तकनीकी अभ्यास है। इसका 90 फीसदी काम तो इसके सामाजिक पहलुओं को समझना और इसका इस्तेमाल करने वाले और इसका दुरुपयोग करने वालों को समझना होगा।

यह याद रखना जरूरी होगा कि जनगणना के लिए जो प्रश्नावली तैयार की जाती है वह स्थायी सामाजिक और आर्थिक विशेषताओं को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है। रोजगार, खर्च और उद्योगों की लागत और उत्पादन से जुड़ी जानकारियां जनगणना के जरिए नहीं जुटाई जा सकती हैं।

अगर ये जानकारियां इकट्ठा करनी हैं तो इसके लिए विस्तृत प्रश्नावली की जरूरत होगी और इसी तरह पूछताछ का समय भी लंबा होगा। साथ ही जिन कर्मियों को इस काम पर लगाया जाता है (इनमें ज्यादातर स्कूल के शिक्षक होते हैं) वे इस तरीके के आंकड़े इकट्ठा करने के लिए प्रशिक्षित नहीं होते हैं। उपभोग खर्च से संबंधित आंकड़े एनएसएस से जुटाए जाते हैं।

जाति आधारित आंकड़े इकट्ठा करना एक बड़ी चुनौती होगी क्योंकि 1931 के बाद से अब तक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को छोड़कर ऐसे आंकड़े नहीं जुटाए गए हैं। कोई यह आपत्ति भी नहीं जता सकता है कि ऐसे आंकड़े इकट्ठा किए जाने से जातिगत भेदभावों को और बढ़ावा मिलेगा।

फिलहाल तो यह माना जा रहा है कि जाति की समस्या को जड़ से मिटाने के लिए सबसे पहले इससे जुड़े आंकड़े इकट्ठा किए जाने हैं। हालांकि जब जाति आधारित आंकड़े जुटाए जाएंगे तो इससे लोगों को अपने बारे में जानकारियां तोड़ मरोड़ कर पेश करने का मौका मिल जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि लोगों को यह पहले से पता होगा कि जो आंकड़े जुटाए जा रहे हैं उनका इस्तेमाल नीतियों को तैयार करने और उन पर निगरानी बनाए रखने के लिए किया जाएगा।

इसमें कोई शक नहीं है कि सरकारी कार्यक्रमों और योजनाओं को जनगणना से फायदा पहुंचता है। सरकार को भी नरेगा और जेएनएनयूआरएम जैसी योजनाओं के लिए जनगणना से इकट्ठा किए गए आंकड़ों की जरूरत होती है।

खासतौर पर नीति से जुड़े आंकड़ों को अलग से इकट्ठा किया जा सकता है। इसके लिए जनगणना की मूल प्रश्नावली में फेरबदल करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर जनगणना की पूरी प्रक्रिया पर असर पड़ेगा।

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय विकास अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर हैं।)

Keyword: census, social aspect, economic aspect, national policies, national sample survey,
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