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बैंक हैं आपकी सेवा में, पर शुल्क हो सकता है दामलेवा
निवेश : विभिन्न सेवाओं के लिए लिया जाने वाला शुल्क दिखने में भले ही छोटा होता है, लेकिन इसी तरह के कई शुल्क आपकी जेब हल्की कर सकते हैं
हरिणी सुब्रमण्यन /  May 17, 2010

निजी क्षेत्र में काम करने वाले 56 वर्षीय कुमार को जब उनके बैंक ने 168 रुपये शुल्क के तौर पर अदा करने के लिए कहा तो उन्हें बडा आश्चर्य हुआ।

यह उनकी समझ से परे था कि आखिर बैंक किस आधार पर उनसे ये शुल्क ले रहा है। हमेशा सावधान रहने वाले कुमार का जोखिम उठाने से भी दूर-दूर का कोई नाता नहीं रहा है। खैर, जब उन्होंने बैंक प्रबंधक से इसका कारण पूछा  तो यह बात सामने आई कि 'डेबिट एंट्री' के निश्चित सीमा से अधिक होने की वजह से उनसे सेवा कर के रूप में शुल्क का भुगतान करने के लिए कहा गया है।

हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने फेयर प्रैक्टिस कोड के जरिये कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं लेकिन इसके बावजूद बैंकों को उनके द्वारा प्रदान की जा रही सेवाओं के लिए अपने स्तर पर शुल्क तय करने का अधिकार है।

इसका सबसे बड़ा खामियाजा ग्राहकों को उठाना पड़ता है क्योंकि उन्हें इस बात का इल्म नहीं होता कि बैंक उनसे किस बात के लिए और किस आधार पर सेवा शुल्क  वसूलेगा। प्रत्येक बैंक को डेबिट एंट्री के लिए शुल्क तय करने का अधिकार है।

डेबिट एंट्री से तात्पर्य उस चीज से जो आपके डेबिट खाते में परिलक्षित होती है। हरेक बैंक डेबिट एंट्री के अनुसार शुल्क तय करते हैं। मिसाल के तौर पर सभी बैंक एनईएफटीआरटीजीएस शुल्क वसूलते हैं। हालांकि, कुछ बैंक  एटीएम एंट्री को डेबिट एंट्री की तरह लेते हैं। आरबीआई द्वारा जारी 'फेयर प्रैक्टिस कोड' में बैंकों को विभिन्न सेवाओं के लिए शुल्क का ब्योरा देने का निर्देश दिया गया है लेकिन डेबिट एंट्री की इसमें कोई चर्चा नहीं है।

इस बाबत भारतीय बैंक महासंघ के उपमुख्य कार्याधिकारी के उन्नीकृष्णन कहते हैं 'डेबिट एंट्री के लिए बैंकों के ग्राहकों से शुल्क लेने का चलन कम से कम 60 के दशक से ही रहा है लेकिन अब जाकर बैंक इस पर पुनर्विचार कर रहे हैं। बढ़ती प्रतिस्पध्र्दा को देखते हुए उदारवाद के बाद की अवधि में इस पर ध्यान नहीं दिया गया लेकिन अब यह बाजार प्रक्रिया का हिस्सा बन चुका है।'

प्रमाणित वित्तीय सलाहकार रमेश भोजवाणी कहते हैं 'सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर फीस आधारित आय अर्जित करने का खासा दबाव रहता है। हालांकि, इसके बाद भी अपनी आय बढ़ाने के लिए उनके पास कई स्रोत हैं।' दूसरी तरफ निजी क्षेत्र के बैंक कैश डिपॉजिट पर शुल्क लेते हैं क्योंकि वे इस चलन को हतोत्साहित करना चाहते हैं।

दक्षिण भारत स्थित एक सार्वजनिक बैंक के एक अधिकारी का कहना था 'अत्यधिक डेबिट एंट्री पर सेवा शुल्क लेने का नियम करीब चार साल से हमारे बैंक में रहा है लेकिन अब जाकर इसका क्रियान्वयन हो पाया है, क्योंकि कोर बैंकिंग की शुरुआत हमारे बैंक में कुछ समय पहले ही शुरू हुई है।'

अब बैंक अपने ग्राहकों को प्रति परिचालन अधिक रकम की निकासी करने के लिए प्रेरित कर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि कोई ग्राहक कैसे इन खर्चों से निपट सकता है? ऐसे ग्राहक जो अधिक से अधिक डेबिट एंट्री करते हैं, उनके लिए कुछ उपाय कारगर साबित हो सकते हैं-

हरेक डेबिट एंट्री में मात्रा बढाएं

अगली बार सप्ताह में दो बार में 300-300 रुपये की निकासी के बदले एकमुश्त 1,000 रुपये निकालें। इससे आप डेबिट एंट्री में करीब 50 फीसदी तक कमी लाने में सफल हो सकते हैं। अगर आपने एक से अधिक व्यक्तिगत ऋण ले रखे हैं तो इसे एक ही बैंक तक सीमित रखें ।

अधिक बैंक अकाउंट

आप एक से अधिक सेविंग बैंक अकाउंट आसानी से रख सकते हैं और इसे लेकर कोई नियम नहीं है। अगर डेबिट परिचालन पर ज्यादा निर्भर रहते हैं जो ऐसे में आपके लिए अलग से कुछ बैंक खाते खुलवाना ज्यादा बेहतर हो सकता है और इसका इस्तेमाल नियमित अंतराल पर करें।

एक ओर जहां इससे अतिरिक्त डेबिट एंट्री में आपको लचीलेपन की सुविधा मिलेगी वहीं आप एटीएम से रकम की निकासी के लिए कुछ निश्चित ऑटो डेबिट सुविधा के साथ अपने किसी विशेष खाते का तालमेल बैठा सकते हैं। उदाहरण के लिए आप एक बैंक का इस्तेमाल यूटिलिटी भुगतान और दूसरे बैंक  का इस्तेमाल एटीएम से निकासी के लिए कर सकते हैं।

नकदी भुगतान पर जोर

अगर आप यह सोच रहे हैं कि नेट बैंकिंग के जरिये भुगतान कर समय की बचत कर रहे हैं तो इस पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। जहां तक हो सके अपने बिल का भुगतान नकद करें। एसबीआई ही ऐसा बैंक है जो इंटरनेट ट्रांजेक्शन को डेबिट एंट्री की श्रेणी में नहीं रखता है। 

क्रेडिट कार्ड से भुगतान

साधारण तौर पर क्रेडिट कार्ड के जरिये भुगतान महीने में एक बार होता है और इसे एक बार डेबिट एंट्री के तौर पर लिया जाता है। यानी आप कई बार की डेबिट एंट्री से आराम से बच सकते हैं।

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