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पेटेंट का अकाल
संपादकीय /  May 13, 2010

एक चरमसीमा से दूसरी पर पहुंचना। भारत में पेटेंट की कहानी कुछ इसी तरह की है।

तेजी व सक्षमता के साथ अपना काम न करने का आरोपी रहा भारतीय पेटेंट कार्यालय (आईपीओ) अब काफी तेजी से काम कर रहा है। लेकिन अब इस पर पर्याप्त जांच के बिना तेजी से पेटेंट को हरी झंडी दिखाने का आरोप लग रहा है। इससे प्रदान किए गए पेटेंट की गुणवत्ता पर सवाल खड़े होंगे।

आईपीओ द्वारा प्रदान किए गए सालाना पेटेंट की संख्या तेजी से बढ़ी है, जबकि पेटेंट कार्यालय का बुनियादी ढांचा और कर्मचारियों की संख्या मोटे तौर पर समान ही रही है। साल 2000 के शुरुआती दिनों से पेटेंट की जांच करने वालों की संख्या नहीं बढ़ाई गई है जबकि यह सुनिश्चित करने के लिए इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है कि सिर्फ जायज आविष्कार को बौध्दिक संपदा संरक्षण मिले।

पिछले तीन सालों में कथित तौर पर पेटेंट के 40 हजार आवेदन निपटाए गए हैं जबकि उससे पहले के सालों में ऐसे 2000 से भी कम आवेदन निपटाए जाते थे। निश्चित तौर पर तुच्छ पेटेंट को मंजूरी देने के मामलों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। ऐसे में आश्चर्य नहीं होता कि हाल के वर्षों में पेटेंट दिए जाने को चुनौती देने वाले अदालती मामलों में भी महत्त्वपूर्ण बढ़ोतरी हुई है।

इससे ऐसी अजीब स्थिति पैदा हुई है कि पेटेंट कार्यालय पेटेंट प्रदान करता है और अदालतें उसे नामंजूर कर देती हैं या उन्हें लंबित रखती हैं। इस तरह आविष्कार को बढ़ावा देने का पेटेंट देने का मूल मकसद समाप्त हो जाता है। इसके मुख्य पीड़ित हैं रसायन व दवा उद्योग, जिनकी पेटेंट में अच्छी खासी हिस्सेदारी है।

भारतीय पेटेंट अधिनियम में साल 2005 में हुए संशोधन के बाद पेटेंट के लिए आवेदनों की संख्या तेजी से बढ़ी है और अपने उत्पाद को पेटेंट के दायरे में लाने के मामले भी, जैसा कि विश्व व्यापार संगठन ने तय किया है। ऐसा इस सच्च्चाई के बावजूद है कि भारत में बौध्दिक संपदा अधिकार के संरक्षण के प्रति जागरूकता विकसित देशों, यहां तक कि चीन के मुकाबले भी अपर्याप्त है।

जिनेवा स्थित विश्व बौध्दिक संपदा संगठन की2009 की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2007 में भारत में 28940 आवेदन सौंपे गए थे जबकि चीन में 245161 आवेदन आए थे। भारत में भी ऐसे आवेदनों की संख्या बढ़ेगी। इसका मतलब यह हुआ कि आवश्यकता केमुताबिक पेटेंट कार्यालय में सुधार में तेजी लानी होगी।

बेहतर बुनियादी ढांचा और ज्यादा प्रशिक्षित व दक्ष पेटेंट जांचकर्ताओं की जरूरत है। वर्तमान में पेटेंट कार्यालय की शाखाएं चेन्नई, नई दिल्ली और मुंबई में है जबकि इसका मुख्यालय कोलकाता में है। ऐसे में और ज्यादा शाखाएं स्थापित करने की जरूरत होगी।

हाल में संसद में सरकार ने स्वीकार किया है कि पेटेंट की जांच करने वालों की भारी कमी है और कहा है कि 11वीं योजना में इसने सिर्फ 200 पद सृजित करने की योजना बनाई है। यह पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि पेटेंट की मांग करने वालों की संख्या कई गुना बढ़ गई है और इसमें और बढ़ोतरी तय है।

हाल में पेटेंट कार्यालय ने पेटेंट की जांच का एक हिस्सा आउटसोर्स कराने के लिए सीएसआईआर के साथ समझौता किया है। आज पेटेंट के लिए 70 हजार आवेदन निपटान की प्रतीक्षा कर रहे हैं तो फिर ऐसे और कदम उठाने की दरकार होगी ताकि लंबित आवेदन निपटाए जा सकें और वह भी पेटेंट की साख को दांव पर लगाए बिना।

Keyword: petent, ipo, court cases, infrastructure, geneva,
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