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यूनानी बवंडर से भारत को मिले हैं कई सबक
यूनान संकट के बाद स्थानीय ऋण तक विदेशी संस्थागत निवेशकों की पहुंच को सीमित करने और बाह्य वाणिज्यिक उधारी को अवरोधित करने के फायदे समझ में आने लगे हैं। बता रहे हैं
सुमन बेरी /  May 11, 2010

यूनान संकट की जड़ में क्या है? और इससे भारत कौन सा महत्त्वपूर्ण सबक सीख सकता है?

अंतरराष्ट्रीय प्रेस के निष्पक्ष अध्ययन के आधार पर यह आश्चर्यजनक तथ्य सामने आता है कि पहले सवाल का जवाब दूसरे सवाल का समाधान खोजने में मददगार है। संकट पहली बार 2009 के अंत में उस समय भड़क उठा था जब नई समाजवादी सरकार ने यह खुलासा किया कि उसकी पूर्ववर्ती सरकार ने देश के राजकोषीय घाटे को कम करके बताया था।

घबराये वित्तीय बाजार में जैसी ही हलचल शुरू हुई तो ध्यान दूसरे मुद्दों पर केंद्रित हो गया- देश के सॉवरिन ऋण का कुल आकार और उसकी विनिमय दर, जिसके आधार पर उसे यूरोजोन की सदस्यता दी गई थी। समन्वित नीतिगत उपायों को अमली जामा पहनाने के साथ ही आधिकारिक और निजी क्षेत्र के बीच बोझ बंटवारे को लेकर उल्लेखनीय आलोचना शुरू हो गई।

इन उपायों में अपवाद स्वरूप अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के संसाधनों तक पहुंच शामिल है। यूनान ने जिन बैंकों से कर्ज लिया था, उनसे कुछ नुकसान सहने के लिए नहीं कहा गया है। वास्तव में यूनान को उम्मीद थी कि वह जीडीपी के मुकाबले अधिक सार्वजनिक ऋण के अनुपात के साथ आईएमएफ के सहारे अपने तीन वर्षीय कार्यक्रम से उबर जाएगा।

इस बात को लेकर आलोचना हो रही है कि यूनान पर राजकोषीय समायोजन थोपा जा रहा है और ऐसे में आर्थिक स्थिरता टिकाऊ नहीं साबित हो सकेगी। इसके सॉवरिन ऋण के पुनर्गठन की प्रक्रिया को मुश्किल से ही टाला जा सकता है। यूनान पर थोपे गए समायोजन की विषमता को लेकर भी आलोचना की जा रही है। जर्मनी ऐसे विकास मॉडल को बदलने के लिए अनिच्छुक था जो उसके निर्यात आधिक्य पर निर्भर है।

हालांकि इनमें से कई आलोचकों में विश्वास की कमी है। इस ओर लगातार ध्यान खींचा गया है कि यूनान के मुकाबले काफी अधिक सॉवरिन ऋण के साथ जापान की अर्थव्यवस्था लगातार एक दशक तक धीमी विकास दर के साथ व्यवस्थित बनी रही है। इसके बावजूद वह सॉवरिन ऋण संकट से प्रभावित नहीं हुआ है। बेल्जियम और इटली दोनों ही खुद को दशकों से संभाले हुए हैं, हालांकि दोनों देशों पर भारी मात्रा में सॉवरिन ऋण का बोझ है।

हाल में वैश्विक वित्तीय संकट की प्रतिक्रिया के दौरान यूरोक्षेत्र में स्थित आयरलैंड ने स्वैच्छिक रूप से राजकोषीय समायोजना की घोषणा की, जिसके फलस्वरूप उसके विकास की संभावनाएं प्रभावित होंगी। ठीक इसी तरह यूनान संकट के फैलने से पहले ही वित्तीय बाजार के भरोसे को बहाल करने की कोशिश करनी चाहिए।

यूरोक्षेत्र के बाहर लातविया ने यूरो से अपने संबंधों के अलगाव से बचने के लिए दंडात्मक अवमूल्यन का रास्ता अपनाया। हमें यह भी याद रखना होगा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद करीब दो दशक तक वैश्विक अर्थव्यवस्था की सेवा करने वाले ब्रेटन वुड्स समझौते का सार यह था कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक स्थायित्व बनाए रखने के लिए विनिमय दरों के सहमत स्तर का जहां तक हो सके पालन किया जाए।

हालांकि कोई भी 'आदर्श' सांकेतिक विनिमय दर प्रशासित नहीं थी। यूनान संकट का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि उसकी राजनीतिक प्रणाली आयरलैंड के समान क्षमतावान नहीं थी। ऐसे में यूनान आर्थिक समायोजना की दिशा में आवश्यक कदम नहीं उठा सका।

यूनान की घटना से भारत के लिए सबक नीरस लेकिन महत्त्वपूर्ण है। यद्यपि इस बारे में टिप्पणी नहीं मिल सकी है लेकिन ऐसा लगता है कि यह सार्वजनिक और वाह्य ऋण प्रबंधन, दोनों की ही असफलता है। इससे रेटिंग एजेंसियों की असावधानी का भी पता चलता है। यूनान सॉवरिन ऋण संकट का सामना कर रहा था और ठीक उसी समय निजी बाजार के दरवाजे उसके लिए बंद हो गए।

इस 'अचानक दरवाजा बंदी' के चलन का उभरते बाजारों के परिप्रेक्क्ष में खासतौर से विश्लेषण करना चाहिए। ऐसा लगता है कि यूरोक्षेत्र के सदस्य के तौर पर यूनान को विश्वास था कि जोखिम से उसकी रक्षा हो जाएगी। जैसा कि टी एन नाइनन ने बताया है कि यह राय रेटिंग एजेंसियों के बीच भी थी, जिन्होंने लगातार देश के ऋण को निवेश ग्रेड की संज्ञा दी, हालांकि अचानक इसे जंक करार दे दिया गया।

लंबा अनुभव बताता है कि भारत ने ऐसे ऋण प्रबंधन जोखिमों का मुकाबला और उससे रक्षा के लिए कई साधनों को विकसित किया है। वाह्य ऋण का प्रबंधन अभी भी नियंत्रण में है लेकिन परिपक्वता प्रबंधन के लिए लगातार सतर्क रहने की जरूरत है।

इन साधनों में सॉवरेन बाजार से उधारी को सीमित करना, स्थानीय ऋण बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों की पहुंच को सीमित करना, सरकारी ऋण के लिए बाजार सुनिश्चित करने के लिए वित्तीय संस्थानों के लिए भारी पोर्टफोलियो अनिवार्यताओं का प्रावधान किया गया है, वाह्य वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) नियमन के जरिए कॉर्पोरेट निकायों और वित्तीय संस्थानों द्वारा विदेशी उधारी की मात्रा और परिपक्वता पर अवरोध लगाए गए हैं।

इसके साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार का भारी स्टॉक भी तैयार किया गया है। यूनान संकट हमें इस बात का एहसास कराता है कि ये नियंत्रण क्यों स्थापित हुए और वित्तीय उदारीकरण के तहत जब हम इन नियंत्रणों को छोड़ते हैं तो काफी सावधानी बरतने की जरूरत है। उम्मीद है कि जब ऋण प्रबंधन भारतीय रिजर्व बैंक से वित्त मंत्रालय के पास जाएगा तो इन अनुभवों का ख्याल रखा जाएगा।

दूसरा महत्त्वपूर्ण पाठ यह है कि डिफाल्ट से हमेशा परहेज कीजिए। वर्ष 1991 में भारत ने बाजार का काफी भरोसा हासिल किया था जब उसने अपनी ऋण सेवाओं के लिए स्थगन की गुहार लगाने के बजाय अपने सोने को गिरवी रखने जैसा अतिवादी कदम उठाया था।

भारत में मुद्रास्फीति से बचने और तुलनात्मक रूप से भारी घरेलू ब्याज दर का अर्थ है कि सरकारी ऋण के घरेलू धारकों को नुकसान न पहुंचे। जैसा कि हावर्ड के केन रोगोफ ने कहा है कि एक सॉवरिन कर्जदार के रूप में भरोसा कायम करने में 100 साल तक का समय लग जाता है।

इस घटना से तीसरा सबक यह मिलता है कि जब हालात मुश्किल हों तो विकल्प की गुंजाइश थोड़ी ही बचती है। वर्ष 1997 के एशियाई वित्तीय संकट के दौरान भी ऐसी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था।

आईएमएफ ने कठोर रुख अपनाते हुए सशर्त मदद की बात कही थी और खासतौर से राजकोषीय समायोजन के मसले पर ऐसा देखने को मिला। यूनान के मामले में भी लगता है कि राजकोषीय कार्यक्रम के बगैर वित्तीय बाजार तक पहुंच को बहाल नहीं किया जाएगा।

अंत में, इस संकट से एक बार फिर रिजर्व बैंक के गवर्नर की सतर्क नीतियों पर मुहर लगी है। जैसा कि मैंने पहले भी कह चुका हूं कि विश्व अर्थव्यवस्था संकट से बाहर नहीं है। वाह्य मांग में सुस्ती बने रहने के आसार हैं। और महंगाई के आंकड़ों के बावजूद ओवरहीटिंग के बारे में आशंका जाहिर करना अभी  जल्दबाजी होगा।

(लेखक नैशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च के महानिदेशक हैं और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं। विचार उनके अपने हैं।)

Keyword: greek crisis, india, financial market, european union, IMF,
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