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भरमार की चुनौतियां
संपादकीय /  May 06, 2010

अगले हफ्ते न्यायमूर्ति एस. एच. कपाड़िया देश के नए मुख्य न्यायाधीश का पदभार संभालेंगे, लेकिन पहले से ही उनका कैलेंडर भरा पड़ा है। यहां बकाया मामलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

उच्चतम न्यायालय में पिछले साल के 49819 के मुकाबले यह फिलहाल 55791 पर पहुंच गई है। उच्च न्यायालयों में बकाए मामले पिछले साल के 3834224 के मुकाबले 4049649 और जिला व निचली अदालतों में 26422920 से बढ़कर 27238782 पर पहुंच गए हैं। 

इसकी मुख्य वजह यह है कि दूसरे देशों के मुकाबले भारत में न्यायाधीशों की संख्या कम है (यहां 10 लाख की आबादी पर 12 न्यायाधीश हैं जबकि अमेरिका में 110), यहां तक कि स्वीकृत पद भी नहीं भरे गए हैं।

खुद उच्चतम न्यायालय में चार पद रिक्त हैं जो कि स्वीकृत पदों का करीब 13 फीसदी है, उच्च न्यायालयों में 265 पद रिक्त हैं जो पीठ की ताकत 30 फीसदी तक बढ़ा सकते हैं और इलाहाबाद जैसे न्यायालयों में न्यायाधीशों वाले पीठ के मुकाबले ज्यादा रिक्त पीठ हैं (82 बनाम 78), निचली अदालतों में 2800 पद रिक्त हैं जो पीठ की कुल शक्तियों में छठे हिस्से के बराबर बढ़ोतरी कर सकते हैं।

1988 में विधि आयोग की सिफारिश थी कि न्यायाधीश व आबादी के बीच के अनुपात को पांच साल में बढ़ाकर 50 और साल 2000 तक 107 किया जाना चाहिए, ऐसे में यह स्पष्ट है कि न्यायमूर्ति कपाडिया केपास मानव संसाधन का बड़ा मुद्दा है जिससे निपटे जाने की जरूरत है।

सरकार के दो अंगों के बीच मुकदमेबाजी के बड़े अनुपात को देखते हुए उन्हें सरकार को समझाना होगा कि वह इस मोर्चे पर सुधार के कदम उठाए। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि न्यायमूर्ति कपाडिया को इस धारणा से निपटना होगा कि विभिन्न न्यायाधीश ऐसी बंद दुकान का संचालन करते हैं जहां कम पारदर्शिता होती है या नहीं होती है।

न्यायाधीशों की संपत्ति का विवरण इंटरनेट पर डालने से उपजे भय के बाद उच्चतम न्यायालय नहीं चाहता कि वह खुद सूचना के अधिकार कानून के अनुशासन में आ जाए। उच्चतम न्यायालय ने इसी अदालत में ही दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की है, जो कहता है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई के दायरे में आता है।

एक बार जब उच्चतर न्यायपालिका आरटीआई के तहत आ जाएगी तो फिर सवाल उठेगा कि न्यायपालिका में भर्तियां कैसे होती हैं और न्यायपालिका ने अपने सहयोगी न्यायाधीशों आदि के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों पर किस तरह की प्रतिक्रिया दी है।

ऐसे में आरटीआई को मुल्तवी करने का अदालत का फैसला जनता की नजरों में असहज धारणा को जन्म देता है। इससे संबंधित मुद्दा है न्यायाधीश दिनाकरन का मामला और इनके खिलाफ किसी गंभीर कार्रवाई की उच्चतम न्यायालय की अनिच्छा। जब तक वकील वहां प्रदर्शन नहीं करते तब तक के लिए उन्हें सिक्किम उच्च न्यायालय स्थानांतरित कर देने का प्रस्ताव था।

न्यायाधीश सौमित्र सेन के खिलाफ अभियोग की कार्यवाही में राज्यसभा पैनल ने उन्हें सिर्फ चार्जशीट जारी की है। उम्मीद है कि न्यायमूर्ति कपाडिया बकाया व रिक्त पदों के मामले में काफी कुछ कर सकते हैं क्योंकि उनका कार्यकाल ढाई साल से कुछ कम का है, लेकिन जनता के दिमाग पर बनी न्यायाधीशों की छवि के मुद्दे से वह कैसे निपटते हैं, इस पर लोगों की नजर बनी रहेगी।

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