बिजनेस स्टैंडर्ड - कैसे बने एक सीधी, सरल कर प्रणाली?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, September 20, 2021 10:56 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

कैसे बने एक सीधी, सरल कर प्रणाली?
भारतीय कर प्रणाली की एक त्रासदी यह है कि यह काफी जटिल है और ऐसा इसलिए है क्योंकि कर नीति पर कई उद्देश्यों का बोझ लाद दिया गया है। बता रहे हैं
एम. गोविंद राव /  May 05, 2010

भारतीय कर प्रणाली की एक त्रासदी यह है कि यह काफी जटिल है और ऐसा इसलिए है क्योंकि कर नीति पर कई उद्देश्यों का बोझ लाद दिया गया है।

यह सही है कि कई देशों में कर नीति का इस्तेमाल निवेश को बढ़ावा देने, बचत को प्रोत्साहित करने, निर्यात को बढ़ाने और कुछ अन्य उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है, लेकिन भारत का उदाहरण शायद सबसे अलग है।

इन सबसे अलग भारत की कर नीति में पिछड़े क्षेत्रों के औद्योगीकरण, ढांचागत उद्यम को प्रोत्साहन देना, छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना, रोजगार सृजन, पुण्यार्थ गतिविधियों और वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देना और विशेष  आर्थिक क्षेत्र (सेज) के जरिए एन्क्लेव-टाइप विकास को बढ़ावा देने जैसे उद्देश्य शामिल हैं।

इन उद्देश्यों को विभिन्न छूटों, दरों औैर वरीयता में अंतर के जरिये पूरा किया जाता है, जिसके कारण कर प्रणाली काफी जटिल हो जाती है और इससे कर अपवंचना और कर न चुकाने के रास्ते खुलते हैं। विडंबना यह है कि कई तरह के कर प्रोत्साहन अभी भी जारी हैं जबकि कई अध्ययन उनकी कार्यकुशलता पर सवाल उठा चुके हैं और उनकी भारी लागत की ओर सबका ध्यान खींच चुके हैं।

कई अध्ययनों में पाया गया है कि ज्यादातर मामलों में इस तरह के प्रोत्साहन निरर्थक और अप्रभावी हैं। इससे न केवल राजस्व का भारी नुकसान होता है बल्कि संसाधनों के आबंटन में भी कई तरह की विषमताएं पैदा होती हैं। जबकि अक्सर ऐसा पाया जाता है कि असल मकसद को तो हासिल ही नहीं किया जा सका है।

यहां तक कि अगर वे उद्देश्यों को हासिल कर भी लेते हैं तो भी समान उद्देश्य को हासिल करने के लिए दूसरे बेहतर और सस्ते तरीके मौजूद हैं। रिचर्ड बर्ड और एरिक जोल्ट के अध्ययन (इंट्रोडंक्शन टू टैक्स पॉलिसी डिजाइन ऐंड डेवलपमेंट, वर्ल्ड बैंक, 2003) में बताया गया कि कारोबारी स्थान के बारे में फैसला करने के लिए स्थिर प्रशासनिक प्रणाली, बेहतरीन व्यापक आर्थिक नीतियां और बेहतर ढांचागत संरचना कर लाभ के मुकाबले अधिक महत्त्वपूर्ण है।

किसी भी दशा में कर प्रोत्साहन इन महत्त्वपूर्ण कारणों की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकता है। एक अच्छी कर प्रणाली वह है जो इससे जुड़ी तीन लागतों को न्यूनतम स्तर पर रखे। ये लागत हैं खजाने पर लागत, अनुपालन लागत और आर्थिक विषमताओं की लागत। कर तरजीह के साथ ही खजाने पर लागत बढ़ती जाती है क्योंकि उनके प्रशासन की लागत भी बढ़ती जाती है।

कर वरीयताएं सब्सिडी भुगतान के समान हैं। हालांकि, समस्या यह है कि ये गैर-पारदर्शी हैं और इच्छित क्षेत्र को नकद हस्तांतरण की तरह नहीं हैं। ये बुरी तरह से लक्षित हैं। व्यापक कर वरीयताओं के कारण कर अनुपालन की लागत पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन प्रोत्साहनों के कारण संसाधन आबंटन पर अवांछित प्रभाव देखने को मिलता है।

कर प्रोत्साहनों से पैदा हुई तुलनात्मक कीमत विषमताओं के कारण विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही विभिन्न उद्योगों में संसाधनों का आबंटन भी प्रभावित होता है। वर्ष 2006-07 से केंद्र सरकार अपने बजट के दौरान विभिन्न कर प्रोत्साहनों से राजस्व क्षति के बारे में एक विस्तृत बयान जारी करती है और 2009-10 के दौरान यह अनुमानित राशि 5,40,269 करोड़ रुपये थी।

अगर निर्यात लाभ को हटा दिया जाए तो यह राशि करीब 5,02,299 करोड़ रुपये के करीब बैठती है। यह आंकड़ा उस साल अनुमानित कर संग्रह का करीब 80 प्रतिशत है। इस अहम हिस्सा सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क में दी गई छूट के कारण है, लेकिन कॉर्पोरेट आयकर में दी गई छूट भी काफी उल्लेखनीय है।

एक अनुमान के मुताबिक कॉर्पोरेट आयकर की मद में कुल कर व्यय 79,554 करोड़ रुपये है और इसमें से त्वरित मूल्यह्रास की हिस्सेदारी 25,180 करोड़ रुपये या 31.7 प्रतिशत है। ढांचागत क्षेत्र को दिए गए प्रोत्साहनों- इसमें बिजली, खनिज तेल, सेज, औद्योगिक पार्क तथा कोल्ड चेन और कृषि प्रौद्योगिकी से जुड़ी कंपनियां शामिल हैं- की हिस्सेदारी 22.6 प्रतिशत (17,978 करोड़ रुपये) है।

क्षेत्रवार प्रोत्साहनों के चलते करीब राजस्व को 5,463 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जो करीब 6.9 प्रतिशत है। हालांकि ये अनुमान काफी विचलित करने वाले हैं, लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि ये केवल प्रोत्साहन हैं क्योंकि अनुमान वैज्ञानिक आधार पर नहीं निकाले गए हैं। पहली बात, अनुमान में माना गया है कि कर प्रशासन का व्यवहार आदर्श होगा।

उदाहरण के लिए सीमा शुल्क और उत्पाद कर के मामले में राजस्व क्षति का अनुमान तटकर दर और प्रभावी दर के अंतर को कर आधार से गुणा करके निकाला गया है। दूसरी बात यह है कि तटकर दर को सामान्य दर मानकर राजस्व क्षति के अनुमानों को काफी अधिक आंका जाता है। सीमा शुल्क के मामले में अक्सर दरों को संरक्षणवादी कारणों से अधिक रखा जाता है।

उद्देश्य छूट देना नहीं होता है बल्कि कारण यह है कि जब भी संरक्षणवादी कारणों से दरों को बढ़ाने की जरूरत हो, तो उसे बढ़ाया जा सके। कर प्रोत्साहनों का सबसे बड़ा अवांछनीय परिणाम यह होता है कि वे संसाधन आबंटन में अनजाने में विषमता पैदा कर देते हैं।

यद्यपि 2010-11 के बजट में राजस्व क्षति के बयान में कहा गया है, 'बुनियादी मसला कर नीति से नहीं जुड़ा है बल्कि यह कार्यकुशलता और पारदर्शिता से संबंधित है।' कर छूटों के कारण कई तरह की विषमताएं पैदा होती हैं और इससे अर्थव्यवस्था की सकल विकास दर प्रभावित होती है।

छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने की कोशिश से केवल फर्मों के बंटवारे को बढ़ावा मिलता है और इस बात को कोई प्रमाण नहीं हैं कि आधुनिक लघु उद्योग इकाइयां अधिक संख्या में रोजगार के मौके मुहैया कराती हैं। क्षेत्रवार छूट देने से उद्योग ऐसे क्षेत्रों से दूर होते हैं जहां उन्हें प्रतिस्पर्धी बढ़त हासिल है।

कर रियायतों के प्रसार से कर आधार घट जाता है और ऐसे में समान्य कर की दरों को बढ़ाना पड़ता है। इससे एक नई तरह की विषमता का जन्म होता है। कर वरीयता के बजाए अगर समान राजस्व हासिल करने के लिए कर की दरों को कम रखा जाए तो इसके कहीं बेहतर नतीजे सामने आ सकते हैं।

सुधारों की दिशा में कर छूट और प्रोत्साहनों को तर्कसंगत बनाने को तरजीह मिलनी चाहिए। कर प्रोत्साहनों को तय करने में विशेष हित समूहों के प्रभाव को न्यूनतम करने के लिए महत्त्वपूर्ण है कि आम जनता और नीति-निर्माताओं को इस बारे में जागरूक बनाया जाए और कम लागत वाले सुधारों के विकल्प मुहैया कराए जाएं, और ऐसा तभी किया जा सकता है जबकि कर प्रोत्साहनों और कर व्यय के अनुमान वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर प्रस्तुत किए जाएं।

(लेखक एनआईपीएफपी के निदेशक हैं। विचार उनके अपने हैं।)

Keyword: India, tax system, export, investment, sez, corporate income tax,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या धातुओं की मांग घटने से कंपनियों के लाभ पर पड़ेगा असर?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.