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यूनान की त्रासदी
संपादकीय /  May 03, 2010

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोजोन के देशों द्वारा संकटग्रस्त यूनान के लिए संयुक्त रूप से 110 अरब यूरो के प्रोत्साहन पैकेज से जवाब के मुकाबले सवाल ही अधिक उठे हैं और हो सकता है कि पिछले दो वर्षों के दौरान पश्चिमी देशों की सरकारों की कई नीतिगत प्रतिक्रियाओं की तरह यह भी काफी छोटा और देर से उठाया गया कदम साबित हो।

यूनान का संकट अनिवार्य रूप से राजकोषीय है, लेकिन इसके नतीजे यूनान और यूरोपीय देशों के लिए अर्थशास्त्र के दायरे से बाहर भी देखने को मिलेंगे। यूरोक्षेत्र का वजूद सवालों के घेरे में है और यूरोपीय संघ (ईयू) के राजनीतिक भविष्य को चुनौती मिल रही है।

घरेलू राजनीतिक कारणों से जर्मनी की कटौती से सवाल उठ खड़ा हुआ है कि इस संकट से ईयू खुद को कैसे बचा सकेगा। यूनान के ऋण संकट से पता चलता है कि अगर यूरोजोन को इससे बाहर आना है तो उसे एक पूर्णकालिक राजकोषीय व कारोबारी नीतिगत समन्वय कायम करना होगा। इसके अलावा यूरोक्षेत्र को ऐसे संस्थानों की आवश्यकता है जो क्षेत्रीय स्तर पर नीतिगत समन्वय, राहत व प्रोत्साहन कार्यक्रमों को बढ़ावा दें।

भूमध्य सागर के देशों की अर्थव्यवस्थाओं का सार्वजनिक वित्त ढहने के कगार पर पहुंच चुका है। ऐसे में रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड ऐंड पुअर ने पिछले सप्ताह यूनान के सॉवरिन बॉन्ड को जंक ग्रेड में डाल दिया। जर्मन सरकार के बॉन्ड और यूनानी बॉन्ड के प्रतिफल के बीच अंतर करीब 6.5 प्रतिशत है, जो अधिक है। लेकिन यूनान तुलनात्मक रूप से छोटी अर्थव्यवस्था है और यूरोपीय बैंकों के पास बड़ी मात्रा में यूनानी सॉवरिन बॉन्ड हैं।

यूरोक्षेत्र की उसकी सदस्यता के महत्त्व के साथ ही उसे एक आधुनिक अर्थव्यवस्था भी माना जाता है। ऐसे में अगर सरकार देनदारियों से मुकर जाती है तो किसी आधुनिक अर्थव्यवस्था द्वारा पहली बार ऐसा व्यवहार देखने को मिलेगा। संक्षेप में कहें तो यूनान द्वारा डिफॉल्ट करने के नतीजे ज्यादा गहरे होंगे।

यूरोपीय संघ और आईएमएफ द्वारा यूनान को प्रोत्साहन पैकेज देने के साथ यूरोप में लिखी जा रही इस पटकथा का अंत नहीं होने वाला है। अब पुर्तगाल और स्पेन राडार पर हैं। पिछले सप्ताह दोनों की क्रेडिट रेटिंग में गिरावट आई है। अगर ब्रिटेन में चुनाव के नतीजे अस्पष्ट रहे तो वहां भी संकट के बादल घिर सकते हैं।

यह देखना अभी बाकी है कि यूरोप के राजनीतिज्ञ कब तक 'टू बिग टू फॉल' के सिद्धांत पर जोर देते हैं और जर्मनी जैसी सक्षम अर्थव्यवस्थाओं के लोगों को मदद के लिए राजी करते रहते हैं। चूंकि दुनिया भर में अर्थव्यवस्थाएं मंदी का मुकाबला करने के लिए समान रणनीति का इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन इस मसले से वैश्विक सुधार के भविष्य के बारे में भी कुछ असहज सवाल उठ खड़े होते हैं।

लीमन के ध्वस्त होने के साथ मची अफरा-तफरी से अमेरिकी सरकारी बॉन्ड बाजार और सोना निवेश के ऐसे ही सुरक्षित माध्यम बनकर उभरे। निवेशक भारतीय बाजार व जोखिमपूर्ण परिसंपत्ति बाजार से किनारा करने लगे और भारतीय कर्जदारों के लिए बाह्य उधारी लागत बढ़ गई।

यूनान संकट का भारत पर प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि क्या इस बार एशिया को तीसरा सुरक्षित स्थान माना जाएगा। वर्ष 2009 में चीन, भारत और इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्थाओं में आई उछाल के आधार पर इसके पक्ष में दलील दी जा सकती है।

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