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चिकित्सा परिषद के लिए दवा
संपादकीय /  April 29, 2010

सांविधिक निकाय के तौर पर मेडिकल कॉलेजों, उनकी मान्यता, नए कॉलेजों और डॉक्टरों के पंजीकरण को नियमित करने वाली भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) चिकित्सा के पेशे में नैतिक आचरण की संरक्षक है।

इसे उपभोक्ता व राष्ट्र के प्रति ईमानदारी व जवाबदेही के उच्च मानदंड बनाए रखने का काम सौंपा गया है। इसकी खुद की नैतिक आचरण संहिता चिकित्सकों को किसी से भी नकद या वस्तु के तौर पर निजी लाभ हासिल करने से रोकती है। लेकिन इसके अध्यक्ष केतन पारेख एक मेडिकल कॉलेज से रिश्वत स्वीकार करने के आरोपी हैं।

वैयक्तिक औचित्य को अलग कर दें तो भी एमसीआई के खिलाफ कई आरोप हैं कि वह अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन सही तरीके से नहीं करती। इसके परिणामस्वरूप कई कॉलेजों की गुणवत्ता संदेह के घेरे में है, चिकित्सकों के खराब आचरण से बचाव का अभाव है, पंजीकृत पेशेवर चिकित्सकों की सूची भूल-चूक से भरी है।

एमसीआई एक पेशेवर निकाय है और इसके सदस्य इसी पेशे से जुड़े होते हैं। लेकिन हित समूह व लॉबी ने इसे अपने हाथ में ले लिया है और इससे पारदर्शिता, निष्पक्षता और पेशेवर रवैया प्रभावित हुआ है। ऐसे में स्पष्ट है कि अगर भारत को निकट भविष्य में अपने स्वास्थ्य लक्ष्य हासिल करने हैं तो एमसीआई में सुधार की जरूरत होगी।

इस नियामक को कौन नियमित करेगा? स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय की क्षमता अपने आप में संदेह के घेरे में है, अन्यथा स्थिति ऐसी नहीं होती। यह जरूरी नहीं है कि पूरे क्षेत्र की देखरेख के लिए नई सार्वजनिक स्वास्थ्य इकाई का गठन करने से इसका समाधान निकल आएगा। जिस तरह से हित समूह व लॉबी नियामक पर हावी हो गए हैं, मुमकिन है कि वे यहां भी ऐसा ही करें।

जहां हम इस समस्या का व्यावहारिक समाधान खोज रहे हैं तो वहीं कई ऐसे कदम हैं जो इस समस्या को कम कर सकते हैं। पहला, पंजीकृत चिकित्सकों की सूची को अद्यतन बनाए जाने की दरकार है। अन्य पेशेवर नियामक निकाय मसलन डेंटल काउंसिल पहले से ही ऐसी कवायद में जुटी हुई है।

दूसरा, ऐसी सूची इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध कराए जाने की दरकार है, जहां हर पंजीकृत डॉक्टर की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराई जाए। तीसरा, हर निजी मेडिकल कॉलेज की यथास्थिति की जानकारी अद्यतन की जाए - क्या इसने मानदंडों को पूरा किया या नहीं और कहां सुधार की दरकार है।

चौथा, पंजीकृत चिकित्सकों के खिलाफ शिकायतों की स्थिति और पिछली शिकायतों पर हुई कार्रवाई को भी पारदर्शी बनाए जाने की दरकार है। अंतिम, चिकित्सकों के अंदर ही एमसीआई के बेहतर तरीके से काम करने के लिए आवाजें उठ रही हैं जिनके लिए सार्वजनिक मंच उपलब्ध कराए जाने की दरकार है।

ज्यादा पारदर्शिता से एमसीआई की सभी समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता और अंतत: इस पेशे और सरकार को हाथ मिलाकर काम करना होगा। उन्हें पेशे के स्वयं विनियमन के ढांचे के भीतर नियंत्रण व संतुलन की पहचान करने व उसे लागू करने की जरूरत होगी।

ज्यादा पारदर्शिता और उच्च पेशेवराना रवैये के साथ-साथ डॉक्टरों व स्वास्थ्य सेवा से जुड़े संस्थानों की तरफ से पेशेवर मूल्यों की प्रतिबध्दता से मदद मिलेगी और वे खुद ही सुधार को आगे बढ़ाएंगे।

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