बिजनेस स्टैंडर्ड - क्या देश में होना चाहिए खेल नियामक?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, October 28, 2020 10:59 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

क्या देश में होना चाहिए खेल नियामक?
जिरह
बीएस संवाददाता /  April 28, 2010

वक्त की जरूरत नियामक
नंदन कामत
सह-संस्थापक - गोस्पोर्ट्स

ताजा विवादों के मद्देनजर कहा जा सकता है कि भारतीय खेल अपने अब तक के सबसे बड़े वित्तीय और राजनीतिक संकट से गुजर रहे हैं।

हालांकि पारदर्शिता और अन्य जरूरी चीजों का इस वक्त जिक्र किया जा रहा है वह दूसरी भारतीय खेल संस्थाओं में भी नदारद ही पाई जाती है। बहरहाल इस बुरे वक्त में भी मुझे कुछ अच्छा घटित होने की उम्मीद तो है ही।

अगर देश की खेल संस्थाओं की बात की जाए तो ज्यादातर खेल संस्थाओं का संचालन ठीक तरह से नहीं हो रहा है। वे तानाशाही तरीके से अपनी-अपनी संस्थाओं को चलाते हैं। उनके पास ऐसा करने के लिए ताकत भी है। यह बिना जिम्मेदारी के साथ ताकत के इस्तेमाल की मिसाल कही जा सकती है। बुनियादी नियमों की अनदेखी और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के अभाव में चीजें बिगड़ ही जाती हैं।

फिलहाल हम लोगों के पास खेल प्रशासन में सुधार लाने के लिए सुनहरा मौका है जो इससे जुड़े दो अहम पहलुओं खिलाड़ियों और खेल के प्रशंसकों के हित में हों। प्रतिभा की हमारे देश में कोई कमी नहीं हैं। खेल के क्षेत्र में अपने थोड़े से अनुभव के आधार पर मैं यह बात कह सकता हूं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि किसी भी  खेल को कामयाबी दिलाने के लिए महज प्रतिभा ही काफी नहीं है।

हालांकि कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी सफलता के लिए हर संभव प्रयास भी करते हैं लेकिन कुछ दरवाजे उनके लिए हमेशा बंद रहते हैं। यह काफी कुंठित करने वाला होता है। आदर्श तौर पर किसी भी खेल संस्था की कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं। वह यह कि प्रतिभा की खोज की जाए, उसे निखारा जाए, जब भी उसे मदद की जरूरत पड़े मदद मुहैया कराए और सबसे जरूरी उसे प्रदर्शन के लिए एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए।

यह पूरे खेल के विकास के लिए जरूरी होता है। लोगों की भावनाओं और सार्वजनिक हित को देखते हुए मेरा मानना है कि सरकार को दखल देकर कुछ कदम उठाने चाहिए। जैसे कि सेबी पूंजी बाजार पर नजर रखता है वैसे ही खेलों के नियमन के लिए भी किसी नियामक की जरूरत दिख रही है।

अगर किसी खेल संस्था को सरकारी पैसा मिल रहा हो या नहीं लेकिन वह जनता के प्रति जवाबदेह जरूर है और उसे कुछ चीजों में स्पष्ट तौर पर घोषणाएं करनी चाहिए। इस मामले में एक पर्यवेक्षक संस्था सावधानी के साथ गड़बड़ी की स्थिति में अपने काम को अंजाम दे सकती है।

इसको आंतरिक तौर पर भी अपने आप को पाक साफ रखना होगा। यह खेल नियामक संस्था खेल संस्थाओं में बढ़िया गवर्नेंस को बढ़ावा दे सकती है।

आजादी से काम करने दो
लोकेश शर्मा
प्रबंध निदेशक - टीसीएम स्पोर्ट्स मार्केटिंग कंपनी

जब से आईपीएल नीलामी में गड़बड़ियों की बात सामने आई है तब से मीडिया और राजनेताओं ने इस पर हल्ला बोल दिया है। भ्रष्टाचार से लेकर मैच फिक्सिंग तक हर तरह के आरोपों से हमला किया जा रहा है।

कुछ नेता तो यहां तक बात कर रहे हैं कि पूरे क्रिकेट पर ही प्रतिबंध लगा दिया जाए। जबकि कुछ भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के राष्ट्रीयकरण की मांग कर रहे हैं। वैसे सरकारी दखल से बुरा कुछ भी नहीं हो सकता है। यह भारतीय क्रिकेट को वैश्विक परिदृश्य पर कमजोर ही करेगा।

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ,राष्ट्रीय क्रिकेट बोर्डों को मान्यता देता है न कि सरकारी संस्थानों को। क्या हम दक्षिण अफ्रीका को भूल सकते हैं जब वहां की सरकार ने रंगभेद की नीति के तहत अश्वेत क्रिकेटरों के लिए राष्ट्रीय टीम में दरवाजे बंद कर दिए थे। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका पर कई साल तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

जो भी आईपीएल और बीसीसीआई के मामले में सरकारी दखल की बात कर रहे हैं वे यह क्यों भूल जाते हैं कि सरकार के पास कई और भी अहम काम हैं। मसलन सरकार को महंगाई और नक्सलियों जैसे मामलों से निपटने दीजिए। लेकिन यह बात भी सही है कि भ्रष्टाचार को किसी भी तरह से प्रश्रय न दिया जाए।

अगर इस मामले में कानूनों का उल्लंघन हुआ है तो सरकार को कार्रवाई करने की जरूरत है। कंपनी पंजीयक, आयकर विभाग और कंपनी मामलों का बोर्ड वित्तीय गड़बड़ियों की जांच कर सकता है। यह काफी चौंकाने वाला है कि जब सरकार को सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश पर ध्यान देना चाहिए, इस तरह का अभियान चलाया जा रहा है कि बीसीसीआई का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए।

क्रिकेट राष्ट्रीय जनभावनाओं से जुड़ा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि क्रिकेट के संचालन का जिम्मा सरकार को सौंप दिया जाए। क्रिकेट-खासतौर से  भारतीय क्रिकेट को संकट से निपटने की कला खूब आती है। वर्ष 2000 में सामने आया मैच फिक्सिंग का मामला इसकी पुख्ता मिसाल है।

आज भारतीय क्रिकेट दुनिया में अपनी चमक बिखेर रहा है। क्रिकेट से जुड़े बुनियादी ढांचे में तेजी से सुधार हो रहा है। यही एकमात्र ऐसा खेल है जहां प्रथम श्रेणी खेलने वाले को भी पेंशन मिलती है।

ऐसे ही एक खिलाड़ी से मेरी बात हुई जो रेलवे में काम करता है। उसकी पेंशन उसकी तनख्वाह से ज्यादा है। दूसरी ओर आप सरकार द्वारा संचालित खेल संस्थाओं की हालत देख सकते हैं। सब जगह गड़बड़ ही गड़बड़ है।

Keyword: regulator, gosports, nandan kamat, TCM sports Marketing company, lokesh sharma, jirah, debate,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या वैश्विक सूचकांक में भारांश बढऩे से देश में आएगा निवेश?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.