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लाखों मलयालियों का गढ़ है खाड़ी देश
अकेले संयुक्त अरब अमीरात में 15 लाख भारतीय हैं और खाड़ी देशों में इनकी कुल संख्या 35 लाख है। देश में आने वाली विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा इन्हीं से आता है। खुलासा कर रहे हैं
संजय बारू /  April 19, 2010

इस सबकी शुरुआत दुबई में हुई थी। शशि थरूर का राजनीतिक करियर, उनके राजनीतिक सहयोगी फ्राइडे जैकब जोसेफ से उनकी दोस्ती, सुनंदा पुष्कर के साथ उनकी निकटता और कोच्चि की एक आईपीएल क्रिकेट टीम का विचार।

संयुक्त राष्ट्र में अपने 30 सालों के करियर के बाद जब थरूर ने न्यू यॉर्क छोड़ा तो न तो वह तिरुवनंतपुरम लौटे और न ही नई दिल्ली। उन्होंने दुबई को चुना जो किसी भी वैश्वीकृत केरलवासी के लिए एक प्राकृतिक बसेरे की तरह है। पिछले तीन दशकों से खाड़ी देश लाखों मलयालियों के लिए उनके घर और संभावनाओं के बीच कड़ी का काम करता रहा है।

हालांकि आमतौर पर लोग यह समझ नहीं पाते हैं कि नारियल, काजू और इलायची उत्पादन पर आधारित केरल की अर्थव्यवस्था (जिसकी शिक्षा प्रणाली कुछ इस तरह की है कि यहां से कई प्रतिभावान लोग तैयार होकर निकलते हैं मगर यहां की श्रमिक संगठन प्रणाली इन प्रतिभाओं को दबाने का काम करती है), अरब सागर में डूब चुकी होती अगर यहां के लोगों ने फारस या अरब खाड़ी के देशों का रुख नहीं किया होता।

आज से कई साल पहले 1977 में भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारी राजू कुरियन ने तिरुवनंतपुरम के सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज में पहली बार केरल की अर्थव्यवस्था पर खाड़ी देशों में प्रवास के असर का अध्ययन किया था। केरल से खाड़ी देशों का रुख करने वाले मजदूर अपनी कमाई का जो हिस्सा यहां भेजते हैं, उससे यह राज्य काफी संपन्न हुआ है।

यहां का गैर-अंग्रेजी भाषी मजदूर वर्ग जो खाड़ी देशों में प्रवास करने लग गया है, वही आज इतना संपन्न हो चुका है कि वह मॉलों, होटलों, कारोबार और राजनीति में निवेश करने लगा है। यह अब एक ऐसा वर्ग बन चुका है जिसके रिश्ते नाते खाड़ी देशों और नई दिल्ली में ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों से है।

केरल से खाड़ी देशों की ओर रुख करने वाले वर्ग के पास बस एक कमी है। उसके पास कोई ऐसा आइकन या वैश्विक पहचान वाला चेहरा नहीं है जिसे लंबे समय तक याद रखा जा सके। इस खाली जगह को भरा देश के एक युवा कूटनीतिज्ञ ने जिसे वैश्विक ब्रांड बनाने में खुद भारत सरकार का योगदान रहा है।

जब इस युवा कूटनीतिज्ञ ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के उम्मीदवार के रूप में खड़े होने का फैसला किया तो भारत सरकार ने उन्हें अपना समर्थन दिया। जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वैश्विक सलाहकार परिषद का गठन किया तो बंगाली वर्ग अमर्त्य सेन के चयन पर खुशी मना सकता था, तो वहीं गुजरातियों के लिए जगदीश भगवती को चुना जाना खुशी की बात थी।

इस परिषद में तमिल वर्ग का प्रतिनिधित्व अबेल पुरस्कार विजेता श्रीनिवास वर्द्धन और कारोबार जगत की प्रमुख हस्ती इंदिरा नूयी कर रही थीं तो वहीं मलयालियों का प्रतिनिधित्व रियल एस्टेट कारोबारी पी एन सी मेनन, जिन्होंने खाड़ी देशों में अपार संपत्ति बनाई थी, और अफ्रास वेंचर्स के शशि थरूर कर रहे थे।

जो लोग इस बात पर गर्व किया करते हैं कि भारत ने कुछ बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों को पैदा किया है, उन्हें यह जानकर थोड़ी हैरानी हुई होगी और गुस्सा भी आया होगा कि उनकी ओर से पेश किया गया वैश्विक आइकन न तो नोबल या अबेल पुरस्कार विजेता है और न ही कोई वैश्विक सीईओ है।

हालांकि तभी थरूर ने कुछ ऐसा किया जिससे दुबई में उनके दोस्तों और प्रशंसकों को उन पर गर्व हो सके। उन्होंने एक ऐसा खेल चुना जिसे पूरा भारत और खुद वह काफी पसंद करते हैं। उन्हें लगा होगा कि पैसा, शोहरत और राजनीतिक ताकत का कॉकटेल क्रिकेट उनके राजनीतिक करियर को एक नई दिशा देगा।

आईपीएल की अधिकांश टीमों में निवेश करने वाले उन्हीं राज्यों के हैं जहां की वह टीम है। मगर कोच्चि की आईपीएल टीम के साथ ऐसा नहीं है। इसमें ज्यादातर निवेशक गैर-मलयाली हैं और इस टीम में एकमात्र मलयाली निवेश खाड़ी देश से आता है।

केरल का खाड़ी देशों से संबंध काफी महत्त्वपूर्ण हो गया है। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने विदेश मंत्रालय की कमान संभालने के लिए केरल के एक व्यक्ति को चुना। विदेश मंत्रालय आमतौर पर खाड़ी देशों में किसी मुस्लिम या मलयाली को राजदूत बनाता है।

मालाबार तट और अरब साम्राज्य के बीच एक ऐतिहासिक रिश्ता है। केरल के लोगों के अलावा अगर कोई भारतीय अरब साम्राज्य के साथ इतने ही पुराने और गहरे संबंधों का दावा कर सकता है तो वह गुजराती वर्ग है। इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए कि अगले आईपीएल संस्करण में कोच्चि बनाम अहमदाबाद मैच के तार इन दोनों राज्यों के संयुक्त अरब अमीरात संबंधों से जुड़े होंगे।

यह भी दिलचस्प है कि एम एफ हुसैन से लेकर सानिया मिर्जा तक सर्वाधिक वित्तीय सफलता प्राप्त करने वाले कुछ भारतीयों में, साथ ही बॉलीवुड के कई सितारों और देश के पेज 3 वर्ग के काफी लोगों का कतर या यूएई से कुछ न कुछ रिश्ता तो जरूर रहा है। अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक कई भारतीय राजनीतिज्ञों, कारोबारियों, फिल्म और मीडिया हस्तियों के दुबई में रिहायशी अपार्टमेंट हैं और उनका वहां कारोबारी हित भी छिपा है।

अकेले यूएई में 15 लाख भारतीय हैं और खाड़ी देशों में इनकी कुल संख्या 35 लाख है और देश में आने वाली विदेशी मुद्रा का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं से आता है। इनसे हर साल करीब 50 अरब अमेरिकी डॉलर देश में आते हैं। इसके अलावा यूएई तेजी से भारत का एक प्रमुख कारोबारी साझेदार बन कर उभर रहा है और इस सूची में पहले स्थान पर पकड़ बनाने के लिए चीन और यूरोपीय संघ को कड़ी टक्कर दे रहा है।

इन दोनों देशों के बीच आधिकारिक व्यापार का कुछ हिस्सा भारत और पाकिस्तान के बीच अनधिकृत व्यापार का प्रतिबिंब है। ऐसे कारोबार में दुबई की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। जब भारत-खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) समग्र आर्थिक सहयोग समझौता पूरा कर लिया जाएगा तो दोनों अर्थव्यवस्थाएं और करीब आ जाएंगी।

तेजी से विकास कर रहे और वैश्विक जुड़ाव रखने वाले भारत के अभिजात्य वर्ग के लिए दुबई का बंदरगाह एक प्रमुख आकर्षण रहा है। चाहे इसे अच्छा मानें या फिर बुरा, भारत के बाह्य आर्थिक जुड़ावों के लिए भारत-यूएई संबंध काफी महत्त्वपूर्ण हो गए हैं।

भले ही यह संबंध गुजरात, आंध्र प्रदेश (विशेषकर सूरत और हैदराबाद के लिए) और कई दूसरे राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्त्वपूर्ण हो, मगर केरल के लिए यह संबंध सबसे अधिक मायने रखता है। यही वजह है कि थरूर ने बड़ी चतुराई के साथ अपने लिए एक राजनीतिक समर्थन तैयार कर लिया है और खाड़ी देशों के पैसों को बड़ी चतुराई के साथ केरल के युवाओं के साथ जोड़ दिया है।

केरल की क्षेत्रीय संवेदनाओं के साथ थरूर का जुड़ाव है। और यह स्वाभाविक भी है। वैश्विक पहचान रखने वाला कोई भी भारतीय जो राजनीतिक करियर बनाने की चाहत रखता हो, उसके लिए क्षेत्रीयता का सहारा लेना कोई बड़ी हैरानी की बात नहीं है। थरूर अब एक ऐसे परिचित राजनीतिक मंच पर पहुंच गए हैं जहां दुबई में रहने वाले कई केरलवासी खुशी से निवेश करना चाहेंगे।

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