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इंडियन प्रीमियर लीग का रॉयल चैलेंज
पैनी नजर
सुनील जैन /  April 19, 2010

इंडियन प्रीमियर लीग पर पड़ा आयकर छापा और आईपीएल के चेयरमैन ललित मोदी के पर कतरने की बीसीसीआई की योजना को देखते हुए यह समझना मुश्किल नहीं है कि मोदी-थरूर की कथा में चीजें किस तरह से प्रकट होंगी।

थरूर की सलाह से कोच्चि फ्रैंचाइजी को मिले फायदे के बारे में वास्तविक तौर पर पता लगाना काफी मुश्किल काम है, लिहाजा उनको थोड़ी बहुत झिड़की देकर छोड़ा जा सकता है। बीसीसीआई-आईपीएल के अहम व्यक्तियों ने पहले ही कहा है कि वे सभी फ्रैंचाइजी के मालिकों के नाम घोषित करेंगे।

शायद वे मोदी को इस बात के लिए बाध्य करेंगे कि हर काम के लिए वह आईपीएल की संचालन परिषद से संपर्क स्थापित करें - निश्चित तौर पर आईटी जांच उनकी वाहवाही पर लगाम कसने का काम करेगी। यह हालांकि साफ-सफाई की प्रक्रिया की शुरुआत भर ही होगी, न कि उसकी समाप्ति।

सबसे पहले उस तर्क को सामने रखते हैं। चूंकि कोच्चि फ्रैंचाइजी ने आईपीएल के इतिहास में सबसे बड़ी बोली (10 साल के लिए 333.33 मिलियन डॉलर) लगाई थी, लिहाजा कयास नहीं लगाया जा सकता कि थरूर ने उसकी मदद की होगी।

इसके उलट यह तर्क दिया जाता है कि एक फ्रैंचाइजी (राजस्थान रॉयल्स) में मोदी के संबंधी की बड़ी हिस्सेदारी है और इसे सभी फ्रैंचाइजी के मुकाबले सबसे कम कीमत (साल 2008 में 67 मिलियन डॉलर में) में बेची गई थी। यह थरूर का शायद सबसे बड़ा बचाव है। लेकिन इस छोटे से अंश की जांच से बहुत कुछ नहीं मिल सकता है।

जो सवाल पूछे जाने की दरकार है, वह यह कि क्या फ्रैंचाइजी के पास वित्तीय ताकत होती है कि उसने जितनी रकम की बोली लगाई हो उसका भुगतान कर सके - हम नहीं जानते कि यह सच है या नहीं, लेकिन मोदी कहते हैं कि जब मैंने फ्रैंचाइजी के वास्तविक मालिक केबारे में जानना चाहा तो थरूर ने उन्हें फोन किया था और कहा था कि इस बाबत वह ज्यादा सवाल न पूछें।

बैंकों व मोबाइल फोन कंपनियों के लिए नो योर कस्टमर्स के बारे में गड़बड़ी को देखते हुए यह पचने लायक बात नहीं है कि फंड का स्रोत जाने बिना फ्रैंचाइजी को बोली लगाने की अनुमति दी जाती हो। वास्तव में, मोदी ने कहा है कि बीसीसीआई अध्यक्ष शशांक मनोहर ने भी उनसे मालिकाना ढांचे के बारे में पूछा था। पाठकों को बेसबॉल क्लब टैक्सस रेंजर्स के बारे में याद होगा, जिसे जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 1988 में खरीदा था।

1990 में जब उनके पिता अमेरिका के राष्ट्रपति थे तब बुश ने अर्लिंगटन शहर को एक स्टेडियम की साजसाा की बाबत फंडिंग के लिए मना लिया था जबकि टिकट की बिक्री से मिलने वाली करीब-करीब पूरी रकम रेंजर्स के खाते में चली गई। इस तरह बुश का निवेश कई गुना हो गया। ऐसे में महत्त्वपूर्ण यह है कि विभिन्न राजनेता ऐसी स्थिति में हैं और यही वजह है कि खेल को राजनीति से अलग किया जाना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

जाहिर तौर पर सवाल है और उम्मीद की जानी चाहिए कि उसका जवाब मिलेगा कि क्या मोदी के सहयोगियोंसंबंधियों ने आईपीएल की डील में काफी कुछ पाया है, इस बात में काफी कम संदेह है कि आईपीएल पारदर्शी तरीके से संचालित हो रहा है - बीसीसीआई-आईपीएल ने इस सच्चाई से वैधता हासिल की है कि सरकार ने उन्हें देश में क्रिकेट का संरक्षक नियुक्त किया है, लेकिन इसके राजनेता-प्रशासक इसे निजी कंपनी के तौर पर संचालित कर रहे हैं।

थरूर का मामला उजागर होने से काफी पहले मोदी ने बोली लगाने वाले नए खिलाड़ियों के लिए नेटवर्थ की कसौटी 1 अरब डॉलर करकेसबको चौंका दिया था, प्रभावी रूप से इससे सुनिश्चित किया गया था कि सिर्फ दो फर्म ही दो शहरों केलिए बोली लगा सके - इसे बदला गया और आईपीएल संचालन परिषद को ज्यादा बोलियां मिलीं। लेकिन किसी ने इसे संदिग्ध नहीं माना क्योंकि मोदी पदभार संभाले रहे और यहां तक कि इतना कुछ होने के बाद भी।

द इंडियन एक्सप्रेस अखबार में शेखर गुप्ता ने इस बात को रेखांकित किया है कि आईपीएल को किस तरह से संचालित किया जा रहा है जहां इंडिया सीमेंट के मालिक बीसीसीआई के सचिव भी हैं और चेन्नई सुपर किंग फ्रैंचाइजी के मालिक भी। सीएसके का ब्रांड एंबेसडर देश की क्रिकेट टीम का मुख्य चयनकर्ता था।

बीसीसीआई ने सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री को कमेंटेटर केतौर पर अनुबंधित किया था और आईपीएल सीरीज के लिए प्रसारण अधिकार जीतने वाले के पास बीसीसीआई द्वारा नियुक्त कमेंटेटर होना जरूरी है। किसी फ्रैंचाइजी के राजस्व का महत्त्वपूर्ण हिस्सा चंदा है, ऐसे में विचित्र यह है कि बीसीसीआई-आईपीएल के सेटअप में किसी ने यह नहीं पूछा कि कोच्चि फ्रैंचाइजी के लिए कोई भी बोली कैसे लगा सकता है जबकि उस शहर में एक भी स्टेडियम नहीं है।

जब तक स्टेडियम बनेगा, कोच्चि टीम को देश भर के विभिन्न स्टेडियम विभिन्न मैचों के लिए आवंटित किए जाएंगे - लेकिन यह जाने बिना कि ये कौन से हैं और कितने बड़े, साथ ही बोली कैसे लगाई जाएगी? या फिर मल्टी मीडिया स्क्रीन (पूर्व में सोनी) के साथ हुए आईपीएल के समझौते पर नजर डालिए। सोनी ने साल 2008 में 10 साल तक मैचों के कवरेज के लिए 1.02 अरब डॉलर में बोली जीती थी।

अगले साल आईपीएल ने अनुबंध रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि प्रसारण की गुणवत्ता ठीक नहीं थी। सोनी ने आईपीएल को कोर्ट में खींचा, आईपीएल ने दूसरे प्रतिद्वंद्वियों से बातचीत शुरू की और फिर नौ साल का अनुबंध एक बार फिर सोनी के साथ 1.64 अरब डॉलर में किया। इससे आईपीएल को और ज्यादा रकम मिल गई, लेकिन ऐसी कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं है जो कि यह सुनिश्चित करे कि दोबारा बातचीत निष्पक्ष तरीके से हो।

इस सभी चीजों के लिए मोदी पर आरोप लगाना फायदेमंद है, लेकिन बीसीसीआई-आईपीएल के सेटअप में कुछ अन्य भी हैं जिन्होंने इसमें कुछ किया हो - उदाहरण के तौर पर किसी ने विरोध नहीं किया है, बीसीसीआई ने ज़ीटीवी के इंडियन क्रिकेट लीग में शामिल होने वाले खिलाड़ियों पर पाबंदी लगाने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया।

अगर इस मौके का इस्तेमाल भारतीय क्रिकेट के कूड़ेदान की साफ-सफाई के लिए किया जाए तो फिर हम थरूर के ऋणी होंगे जो अनिच्छापूर्वक ही सही, ये सभी चीजें सामने लेकर आए। फिलहाल बीसीसीआई-आईपीएल के कामकाज का स्वतंत्र अंकेक्षण कराया जाना चाहिए।

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