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उनकी हालत पर आखिर उनको भी तरस आया
अदालती आईना
एम. जे. एंटनी /  April 08, 2010

सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) का चित्रण अक्सर एक ऐसे सुस्त विशालकाय हाथी के तौर पर किया जाता है, जिसे नाहक राज्य का संरक्षण मिला हुआ है।

अब जबकि उनमें से कई का स्वरूप बदल दिया गया है या फिर उनका आकार घटा दिया गया है तो उनकी दयनीय हालत पर सहानुभूति के साथ कुछ शब्द कहे जाते हैं। ऐसे में जब कभी उनके लिए तरस के शब्द अप्रत्याशित रुप से सुनाई पड़ते हैं तो फिर कोई भी इन्हें सावधानीपूर्वक सुनने के लिए बाध्य हो जाता है।

खुद सुप्रीम कोर्ट ने बीएसएनएल बनाम टेलिफोन केबल्स लिमिटेड के मामले में दिए अपने हालिया फैसले में इस विषय पर कई पेज लिखे हैं। यह मामला सार्वजनिक कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) द्वारा अपनाई गई टेंडर प्रक्रिया पर उठे विवादों से संबंधित था। इन दिनों अगर एक सरकारी कंपनी टेंडर जारी करती है तो फिर मुकदमेबाजी भी इसी के साथ चली आती है।

इस तरह के मुकदमे नियामक प्राधिकरण, इसके अपीलीय प्राधिकरण, उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट का सफर तय करते हैं। राज्य के तहत आने वाले संसाधन चाहे वह बिजली हो, या फिर तेल, स्पेक्ट्रम, खनन पट्टा या फिर कोई और संसाधन, इन मुद्दों पर हर चरण में तीखी मुकदमेबाजी होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने पॉलिथीन-इंसुलेटेड केबल्स की बोली के लिए जारी टेंडर प्रक्रिया पर अपनी टिप्पणी दी थी। यह विवाद नौ साल में तीन बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और इस मामले में एक बार मध्यस्थता की कोशिश हुई। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पाया कि प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। इसने बीएसएनएल से बोली लगाने वाले प्रतिद्वंद्वियों के लिए फिर से रेटिंग करने को कहा।

इसने निजी कंपनी को भी मुआवजे के लिए मुकदमा दायर करने की अनुमति दे दी। इससे मुकदमेबाजी का दूसरा दौर शुरू हो गया। जब कंपनी को लगा कि सबकुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है तो उसने फिर मध्यस्थता की गुहार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता से इनकार करके इस लंबी कहानी का अंत कर दिया।

इस लंबी अवधि में बीएसएनएल कठिन परिस्थितियों से गुजरा। लिहाजा उससे  अदालत को सहानुभूति हुई। अदालत ने सरकारी कंपनी की कमजोर स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि ज्यादातर पीएसयू अपने आपको इसी स्थिति में पाते हैं।

उसने कहा - इन्हें जटिल किस्म की मुकदमेबाजी जैसी मुश्किल का सामना करना पड़ता है जो कि निजी क्षेत्र के प्रतिद्वंद्वियों को सामान्यत: नहीं झेलनी पड़ती है। जब सार्वजनिक उपक्रमों का एकाधिकार हुआ करता था और वे अपने सार्वजनिक कर्तव्यों का निर्वहन करते थे तो सार्वजनिक हितों की सुरक्षा और पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उस पर सरकार और विधायिका का नियंत्रण और न्यायपालिका द्वारा न्यायिक समीक्षा आवश्यक थी।

लेकिन जब सार्वजनिक उपक्रमों को वाणिज्यिक क्षेत्र में निजी क्षेत्र के साथ प्रतिद्वंद्विता की जरूरत होती है तो फिर कार्यपालिका व विधायिका के साथ-साथ न्यायिक समीक्षा उनके कार्यकलाप को पंगु बना देते हैं, जिससे उनकी प्रगति में बाधा पहुंचती है।

सार्वजनिक उपक्रमों की व्यथा संविधान में उनकी स्थिति से जाहिर होती है। अपने दायित्वों की वजह से उन्हें राज्य मान लिया जाता है। अदालती व्याख्या के मुताबिक, राज्य या उसकी भुजाएं मनमानेपन और भेदभाव से मुक्त होनी चाहिए और अपने सभी तरह की व्यवहार में उन्हें निष्पक्षता सुनिश्चित करनी चाहिए। निजी कंपनियां कानूनी तौर पर इस तरह की शुध्दता के लिए बाध्य नहीं है।

फैसले में इस इस मामले की व्याख्या इस तरह से है : सार्वजनिक उपक्रमों को अपनी सौदेबाजी व फैसला लेने की प्रक्रिया में निष्पक्षता, गैर-भेदभाव और गैर-मनमानेपन को अपनाने की दरकार होती है। उनकी कार्रवाई न्यायिक समीक्षा व सूचना के अधिकार के तहत जांच के लिए खुली होती है।

उन्हें विज्ञापन निकालने और चयन की लंबी प्रक्रिया अपनाने की दरकार होती है, चाहे वह सामग्री की खरीद की बात हो या कॉन्ट्रैक्टर को शामिल करने की हो या फिर नियुक्ति करने की बात हो। यह सुनिश्चित करने केलिए कि हर किसी को स्वतंत्र व समान मौका उपलब्ध हो, टेंडर प्रक्रिया के लिए सार्वजनिक उपक्रमों को बड़ी रकम और काफी समय खर्च करना पड़ता है।

उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा कि 10 लाख रुपये की सामग्री की खरीद के प्रस्ताव में विज्ञापन व टेंडर के मूल्यांकन लागत पर दो लाख रुपये खर्च हो सकते हैं और इसमें तीन से छह महीने का वक्त लग सकता है। प्रतिद्वंद्वी निजी कंपनी सीधे बाजार जा सकती है और इस बाबत सीधे बातचीत कर सकती है और उतनी ही सामग्री सिर्फ एक हफ्ते के अंदर पांच लाख रुपये में खरीद सकती है। वह भी बिना किसी अन्य खर्च के।

फैसले में कहा गया है कि पूर्वाग्रह या मनमानेपन आदि के आरोपों से बचने के लिए सार्वजनिक उपक्रम अपना ज्यादातर वक्त व ऊर्जा विकास व प्रगति की बजाय अपने पीठ ढंकने के लिए करते हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि जब अदालत स्टे दे देती है तो फिर पूरी परियोजना या कारोबार थम जाता है या फिर उसमें देरी हो जाती है।

अगर स्टे हटा दिया जाता है और गलत होने पर शिकायत खारिज कर दी जाती है तो उस समय तक हुआ नुकसान काफी बड़ा होता है क्योंकि तब तक लागत बढ़ चुकी होती है और काफी समय खर्च हो चुका होता है। निजी क्षेत्र के मामले में इस तरह की कोई जांच अदालत की तरफ से नहीं होती। जब सार्वजनिक क्षेत्र अपने ही वाद व नियंत्रण से बंध जाता है तो कई बार निजी क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र की कीमत पर ही आगे निकल जाता है।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि वह न्यायिक समीक्षा में कमी की वकालत नहीं कर रही है। हम सिर्फ यह रेखांकित कर रहे हैं कि अगर सार्वजनिक क्षेत्र को अपना अस्तित्व बरकरार रखना है और फलना-फूलना है तो फिर उसें समान मौका उपलब्ध कराया जाना चाहिए। पर सवाल है कि यह कैसे और कब होगा और कौन इसे करेगा, इसका जवाब खोजा जाना बाकी है।

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