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टि्वटर और फेसबुक के आगे गूगल के बज़ का बज गया बाजा
लेस्ली डिमोंटी और प्रियंका जोशी /  April 07, 2010

इंटरनेट जगत की महारथी कंपनी गूगल ने फरवरी में जब गूगल बज़ की शुरुआत की थी तब करीब 18 करोड़ जी मेल इस्तेमाल करने वालों ने अपने दोस्तों को पिंग (इंटरनेट की भाषा में हैलो करना) करना शुरू कर दिया।

जाहिर है ऐसे में टि्वटर जैसी माइक्रो ब्लॉगिंग साइट और फेसबुक और माई स्पेस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट की परेशानी बढ़नी ही थी। शुरुआत से ही गूगल को करोड़ों पोस्ट और कमेंट मिलने लगे। हर एक 11 सेकंड में 'गूगल बज़' को लेकर टि्वट होने लगा और रोजाना तकरीबन 1,000 टेक्नोलॉजी फोरम गूगल बज़ पर चर्चाएं करने लगीं।

आखिर केवल एक क्लिक पर ही आखिर इतने सारे उपभोगकर्ता कैसे बनाए जा सकते हैं? लेकिन गूगल ने इसे अंजाम दिया अपनी लोकप्रिय ई मेल सेवा जी मेल के जरिये। जी मेल पर गूगल बज़ का लिंक देने से जी मेल के उपभोक्ताओं तक इसकी पहुंच अपने आप ही हो गई।

हालांकि अभी शुरुआती दिन ही हैं और कोई आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं लेकिन इस तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं कि बज़ उम्मीद के मुताबिक हिट नहीं हो पाई। मिसाल के तौर पर जी मेल इस्तेमाल करने वालों का एक बड़ा तबका अपनी जी मेल अकाउंट पर बज़ के संदशों को भाव नहीं देते। कुछ उपभोक्ताओं को इसमें कोई दिलचस्पी भी नजर नहीं आती।

बेंगलुरु में एक प्रोफेसर प्रेमा कश्यप का टि्वटर पर कहना है, 'मैं पहले से ही फेसबुक और टि्वटर पर हूं और कभी-कभार लिंकडिन का इस्तेमाल भी हो जाता है। ऐसे में मुझे किसी अन्य सोशल नेटवर्किंग माध्यम की जरूरत नहीं है। जी मेल पर तो बिलकुल नहीं जिसे मैं अपने निजी संचार माध्यम के तौर पर इस्तेमाल करती हूं।'

पुणे की मीडिया स्फेयर कम्युनिकेशंस के निदेशक आदित्य कुबेर कहते हैं, 'गूगल बज़ काफी देर में आया और किसी भी लिहाज से टि्वटर बेहतर है। बज़ पर लोगों की मौजूदगी भी काफी कम है।' बोरिंग ब्रांड्स नाम से सलाहकार फर्म चलाने वाली आकृति भार्गव का भी मानना है कि बज़ ने गलत राह पकड़ ली।

वह कहती हैं, 'ग्राहकों के बीच टि्वटर को लेकर दीवानगी है और बज़ को वहां तक पहुंचने के लिए लंबा रास्ता अख्तियार करना होगा।' वह यह भी मानती हैं कि बिना अलग इंटरफेस के ई मेल को सोशल नेटवर्किंग के साथ जोड़ना इसे उलझाऊ बना देता है।

आई 9 कम्युनिकेशंस के प्रमुख सुभाष पाइस कहते हैं, 'मुझे लगता है कि गूगल खुद इस बात को लेकर भ्रम का शिकार थी कि उसे बज़ के साथ क्या करना है।' वह कहते हैं, 'मेरे लिए भी बज़ 'टि्वटर' की तरह ही आया। मुझे लगता है कि जब फेसबुक, टि्वटर और यूटयूब जैसे माध्यम पीढ़ीगत पहचान बन चुके हैं ऐसे में बज़ को स्थापित करने में गूगल को काफी संघर्ष करना होगा।'

दिल्ली में डिजिटल मार्केटिंग के काम में लगी कुंतल शुक्ला का भी यही मानना है। वह मानती हैं कि देश में मौजूद तकरीबन 5 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं के बीच बज़ पिछड़ता गया। इसकी एक वजह लचर विपणन अभियान भी रही जिसकी कमान गूगल के हाथों में थी। साथ ही साथ यह वजह भी है कि ज्यादातर इंटरनेट उपभोक्ता टि्वटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर फिदा हैं।

उनका कहना है, 'निजता से जुड़े मुद्दों ने बज़ का खेल बिगाड़ने का काम किया। इसमें जब तक सुधार किया जाता तब तक काफी देर हो चुकी थी।' हालांकि गूगल बज़ के मुरीद भी कम नहीं हैं। जैसे कि पेशेवर इंजीनियर राहुल ऋषि इसके काफी बड़े प्रशंसक हैं।

टि्वटर पर अपने संदेश में वह कहते हैं, 'मैं बज़ का इस्तेमाल करता हूं और इसे पसंद करता हूं। यह किसी दूसरी नेटवर्किंग साइट की तरह ही है। अगर इस साइट पर आपके मित्र मौजूद हैं तो आप जरूर इस पर मजा उठा पाएंगे।' उनका कहना है कि जैसे फेसबुक ने 40 करोड़ ग्राहकों को बनाने में वक्त लिया। बज़ में भी काफी संभावनाएं हैं।

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