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क्या विनिर्माण क्षेत्र बनाना आदर्श विचार है?
जिरह
बीएस संवाददाता /  April 07, 2010

रफ्तार बढ़ाने का सही मौका
धर्मकीर्ति जोशी
मुख्य अर्थशास्त्री, क्रिसिल

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपनी रफ्तार से दुनिया भर को चौंकाया है।

मंदी से पहले 9 फीसदी की विकास दर हासिल करने में कामयाबी और उसके बाद मंदी से निपटने के उपायों की वजह से भारत दुनिया की नजरों में चढ़ गया है। बचत और निवेश की  दरें 35 फीसदी से भी अधिक हैं और उछाल के दौर में तो यह और भी ज्यादा थीं।

लेकिन विकास की इस रफ्तार के साथ देश का विनिर्माण क्षेत्र कदमताल नहीं मिला सका। वैसे, इसे विकास की गाड़ी का इंजन होना चाहिए था लेकिन यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की रफ्तार के साथ बस घिसटता ही नजर आया।

1990 के दशक में जब भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधारों का सूत्रपात किया गया था तब यह देश के जीडीपी के 15 फीसदी के बराबर था। दो दशक बीत जाने के बाद भी जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी जस की तस है और मामूली रूप से बढ़कर 15.8 फीसदी तक पहुंची है। 

यह भी सही है कि देश में विनिर्माण क्षेत्र के तहत आने वाले कुछ उद्योगों ने जबरदस्त प्रदर्शन किया है, जैसे वाहन और वाहन कलपुर्जा उद्योग। इससे जुड़े उद्योगों में भारत दुनिया में तेजी से उभरता देश बनता जा रहा है। हालांकि कुछ छिटपुट क्षेत्रों के बढ़िया प्रदर्शन के बावजूद जो अपेक्षाएं विनिर्माण क्षेत्र से थीं, वे पूरी नहीं हो सकी हैं।

भारत एक ऐसा देश है जिसकी 60 फीसदी से भी ज्यादा आबादी युवा है। देश में करीब 65 करोड़ लोग 15 से 59 वर्ष की आयु के हैं। यह आबादी का वह तबका है जिसको कामकाज चाहिए। भारत के पास अवसर है कि वह इस विशेषता का फायदा उठाते हुए उत्पादन और उपभोग में अपना विस्तार करे। लेकिन अगर इतनी बड़ी आबादी के लिए रोजगार नहीं मुहैया हो पाया तो यही आबादी देश पर भारी बोझ साबित होगी।

रोजगार सृजन का एक बढ़िया माध्यम विनिर्माण क्षेत्र में श्रम आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना साबित हो सकता है। बुनियादी ढांचे की कमी, बेवजह की लंबी प्रक्रिया और अड़ियल श्रम कानूनों जैसी कुछ वजहें हैं जिन्होंने देश में विनिर्माण क्षेत्र की रफ्तार को कुंद करने का काम किया है।

जब तक भारत में सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी चीजों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक विनिर्माण क्षेत्र में तेजी लाना मुश्किल होगा। इसके अलावा कई विभागों से अनापत्तियां हासिल करने में भी उद्यमियों के पसीने छूट जाते हैं और यह लालफीताशाही बहुत भारी पड़ती है।

बाकी की कोर कसर कड़े और अड़ियल श्रम कानून पूरी कर देते हैं। विश्व बैंक के एक हालिया अध्ययन के मुताबिक भारत उन देशों में शामिल है जहां भर्तियों और लोगों को नौकरी से निकालने के मामले काफी जटिल होते हैं। अब वक्त आ गया है कि इन सभी मुश्किलों से पार पाकर विकास को बढ़ावा दिया जाए।

कारोबारियों का ही होगा फायदा
एम के पंधे
सदस्य- पोलित ब्यूरो
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी

देश की राष्ट्रीय विनिर्माण नीति पर तैयार डीआईपीपी का परामर्श पत्र देश में उद्योगों को बढ़ावा देने के बजाय अराजकता का माहौल पैदा करेगा।

इसके तहत प्रस्तावित राष्ट्रीय विनिर्माण और निवेश क्षेत्र (एनएमआईजेडएस) के तले बनने वाले 500 विशेष आर्थिक क्षेत्र उद्योगपतियों के लिए ही फायदे का सौदा साबित होंगे। घोषित तौर पर तो इस कवायद का मकसद जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र के मौजूदा योगदान 15 फीसदी को वर्ष 2022 तक बढ़ाकर 25 फीसदी करने का है।

इसको अंजाम देने के लिए विनिर्माण क्षेत्र को कई अनैतिक छूट दिए जाने की तैयारी भी की जा रही है। निवेश को बढ़ावा देने और कारोबार के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने के लिए कारोबारियों को 10 वर्षों तक स्थानीय करों और स्थानीय निकायों द्वारा लगाए जाने वाले करों से छूट दिए जाने की बात है, ब्याज दरों में रियायत मिलेगी, आयकर की दरों में भी आकर्षक छूट का प्रावधान है।

सरकार ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत बुनियादी ढांचे का सहयोग भी मुहैया कराने का वादा किया है। कुल मिलाकर सरकार जिन रियायतों को देने की मंशा जता रही है, बहुत संभव है कि इनका फायदा कारोबारी अपने फायदे के लिए उठाएं लेकिन इनसे उत्पादन इकाइयों को कोई फायदा नहीं होगा।

मसौदे में स्पेशल पर्पज व्हीकल के सीईओ को जो अधिकार पृदत्त किए गए हैं, उससे वह काफी शक्तिशाली हो सकता है जिससे भ्रष्टाचार में तेजी आ सकती है और लाइसेंस राज की पुनरावृत्ति हो सकती है। एक प्रावधान सरकार पर भारी पड़ेगा वह है पेटेंट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत कराना। सरकार ने कहा है कि इसमें जो खर्च आएगा, उसका आधा वह वहन करेगी।

इससे पेटेंट से होने वाला फायदा तो कंपनी उठाएगी जबकि खर्चा सरकार को करना पड़ेगा। क्या पेटेंट विकसित करने वाले इतने गरीब होंगे कि वे पेटेंट पंजीकरण शुल्क का भुगतान करने की हालत में नहीं होंगे! जबकि पेटेंट से पूरा मुनाफा वही कमाएंगे।

अब बात आती है श्रम कानूनों की। इस मसौदे में कंपनियों को 'श्रम कानूनों में छूट' देने की बात की गई है। देश में पहले से ही श्रम कानून पूरी तरह से लागू नहीं हैं और प्रमुख मजदूर संगठन इस मसले पर देश भर में आंदोलन भी करते रहते हैं। इस मामले में और छूट दिए जाने का मतलब होगा कि श्रम कानूनों का क्रियान्वयन नहीं होगा।

श्रमिकों के उत्पीड़न के मामले पहले ही बढ़ रहे हैं। पिछले साल के आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात का जिक्र किया गया था कि साप्ताहिक कामकाजी घंटों की संख्या 48 से बढ़ाकर 60 कर दी जाए। इसका मतबल यही हुआ कि श्रमिकों को रोजाना करीब 2 घंटे ज्यादा काम करना पड़ेगा।

Keyword: debate, jirah, manufacturing sector, D K Joshi, M K Pandhe,
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