बिजनेस स?टैंडर?ड - छोटी आईटी कंपनियों के लिए 'पार्क' की टेढ़ी राह
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छोटी आईटी कंपनियों के लिए 'पार्क' की टेढ़ी राह
एसटीपीआई के तहत कर छूट अवधि नहीं बढ़ी तो छोटी-मझोली आईटी कंपनियां पर बढ़ेगा कर का भार
लेस्ली डीमोंटी और शिवानी शिंदे / मुंबई April 06, 2010

चेन्नई की मझोले आकार की आईटी कंपनी पोलारिस सॉफ्टवेयर के अध्यक्ष (वित्त) और सीएफओ श्रीकांत आर के चेहरे पर चिंता साफ झलक रही है।

एक ओर जहां श्रीकांत उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार भारतीय सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी पार्क (एसटीपीआई) योजना को 2011 के बाद भी एक-दो साल के लिए बढ़ाएगी, वहीं दूसरी ओर वह कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं।

पोलारिस की 90 फीसदी कमाई निर्यात से होती है। वित्त वर्ष 2009-10 तक कंपनी ने विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) में जगह खरीदने की रणनीति पर अच्छे से नहीं सोचा। हालांकि श्रीकांत मानते हैं कि संभवत: अब उनके पास कोई विकल्प नहीं है।

उनका कहना है, 'कुछ साल पहले तक हमने तरक्की के लिए सेज को विकल्प के तौर पर नहीं देखा। मगर अब अगर सरकार एसटीपीआई कानून को 31 मार्च 2011 के बाद आगे नहीं बढ़ाती है तो हमें एक सेज के रूप में ही विस्तार करना होगा। हम पुणे सेज में कुछ जगह ले सकते हैं।'

दरअसल 2011 के बाद सेज में ज्यादा कर चुकाने की मजबूरी के आगे घुटने टेकने वाली पोलारिस अकेली कंपनी नहीं है। कई छोटी व मध्यम आकार की आईटी कंपनियां अभी भी आस लगाए हुए है कि सरकार एसटीपीआई योजना को एक या दो साल के लिए बढ़ाएगी, लेकिन ये कंपनियां इसके विपरीत होने की परिस्थितियों की भी तैयारी कर रही है। इनका डर वाजिब भी है।

एसटीपीआई योजना में शामिल कंपनियों का निर्यात 2008-09 के दौरान 2,02,580 करोड़ रुपये को छू गया। पिछले साल के मुकाबले इसमें 12.4 फीसदी की बढ़ोतरी आई है। ऐसे ही एक लाभार्थी इन्फ्रासॉफ्ट टेक्नोलॉजिज के सीईओ और प्रबंध निदेशक हनुमान त्रिपाठी हैं।

इनकी कंपनी की 80 फीसदी कमाई एसटीपीआई इकाइयों से होती है। हालांकि कर विशेषज्ञ, ब्रोकरेज हाउस और उद्योग पर्यवेक्षक मानते हैं कि एसटीपीआई जैसी रियायतें प्रत्यक्ष कर कोड की मूल भावना के अनुरूप नहीं है और इसलिए इसे जाना होगा।

मगर एटीपीआई कानून को 2011 में ही चलता कर दिया गया तो आईटी एसएमबी के लिए कर दर बढ़ कर 22-28 फीसदी पर आ जाएगी। इससे उनके मार्जिन भी आहत होंगे और कुछ कंपनियां कारोबार से ही बाहर हो जाएंगी। अभी यह कर दर 15-18 फीसदी के करीब है।

इकॉनोमिक लॉज प्रैक्टिस में भागीदार प्रणय भाटिया बताते हैं, 'मिड-केप और विशेषकर जो सेज से बाहर परिचालन नहीं कर रही है उनके लिए एसटीपीआई हट जाने से बड़ा कर दायित्व पैदा हो जाएगा। न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) के बजाय कंपनियों को 30 फीसदी कॉरपोरेट कर चुकाना होगा।'

भारतीय आईटी-आईटीईएस (आईटी आधारित सेवाएं) क्षेत्र फिलहाल सेज में भारी जमीन खरीद रहा है। अभी करीब 574 सेज में से आईटी-आईटीईएस क्षेत्र की हिस्सेदारी 62 फीसदी है। बडी आईटी कंपनियों की 20 फीसदी कमाई सेज से ही होती है।

वित्त वर्ष 2009 में सेज इकाइयों द्वारा अनुमानत: 17,697 करोड़ रुपये के आईटी निर्यात किए गए, जबकि एक साल पहले यह निर्यात 5,618 करोड़ रुपये का रहा था। यह आंकडा और बढ़ेगा। जोंस लासेल मेघराज के प्रमुख (रियल एस्टेट इंटेलिजेंस सर्विस) अभिषेक किरण गुप्ता मानते हैं कि सेज की मांग में साधारण तेजी आई है।

वह बताते हैं, 'हमने उन आईटी कंपनियों की सेज में रुचि देखी है, जो या तो तैयार नहीं है या जिनका कार्य समाप्ति पर नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि नए डेवलपरों के बीच नए सेज बनाने को लेकर भागदौड़ मची है।'

जमीन की लागत भी ज्यादा होती है और इससे कंपनियों का पूंजीगत व्यय भी बढ़ जाता है। ऐसे में मुख्यत: बड़ी आईटी कंपनियां ही बिना किसी परेशानी के सेज में जमीन खरीद सकती हैं। कई बड़ी कंपनियां अपना ज्यादातर कारोबार सेज से बाहर ही करती हैं, ऐसे में एसटीपीआई कानून को आगे नहीं बढाए जाने पर भी उन पर इसका असर नहीं पडेग़ा।

मसलन, इन्फोसिस टेक्नोलॉजिज अभी 22 फीसदी कर देती है। वित्त वर्ष 2012 में एसटीपीआई कानून को आगे नहीं बढ़ाए जाने पर यह दर 24 से 25 फीसदी तक जा सकती है।

...कर राहत की दरकार

एसटीपीआई रियायतें जाने पर छोटी, मध्यम आकार की आईटी कंपनियों के लिए कर 7-10 फीसदी तक बढ़ेगा
सेज में कारोबार वाली बड़ी आईटी कंपनियों पर नहीं होगा खास असर
लेकिन नए कारोबार उठाएंगे लाभ

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