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पॉलिसीधारक नियुक्त कर सकते हैं स्वतंत्र सर्वेक्षक
पर्सनल फाइनैंस
नेहा पांडेय /  April 06, 2010

अश्विन त्रिवेदी को एक गंभीर कार दुर्घटना का सामना करना पड़ा और बीमा कंपनी ने एक सर्वेक्षक इस दुर्घटना का मुआयना करने को भेजा।

मुआयने के बाद सर्वेक्षक का कहना था कि अश्विन को 75 फीसदी वाहन बीमा मिलना चाहिए। अश्विन सर्वेक्षक के इस फैसले के बाद बेहद संतुष्ट हुए। लेकिन बीमा कंपनी बहुत खुश नहीं थी। इसके बाद कंपनी ने एक दूसरे सर्वेक्षक को भेजा और उसने इस बीमा को कम करके 60 फीसदी कर दिया।

उसके बाद तीसरे सर्वेक्षक ने इसे कम करके 40 फीसदी कर दिया और बीमा कंपनी इसका भुगतान करने के लिए तैयार थी। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अलग-अलग सर्वेक्षको के आने से त्रिवेदी थोड़े परेशान हो गए। उनका कहना है, 'मेरा बोनट पूरी तरह से बर्बाद हो गया। उसके बाद भी बीमा कंपनी भुगतान नहीं करना चाहती।'

त्रिवेदी जैसे लोगों के लिए बेहतर खबर है। बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष जे हरि नारायण ने बिजनेस इंश्योरेंस राउंड टेबल में कहा कि अगर कोई कंपनी के सर्वेक्षक के मुआयने से संतुष्ट नहीं है तो वे स्वतंत्र सर्वेक्षक को नियुक्त कर सकते हैं।

लेकिन यहां भी बहुत बाधाएं हैं। उद्योग के अधिकांश लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है। वास्तव में कई एजेंट भी इस बात को नहीं जानते। एक बीमा एजेंट का कहना है, 'हम यही जानते हैं कि केवल बीमा कंपनी ही सर्वेक्षक नियुक्त कर सकती है। हमें इस बात की जानकारी नहीं है कि बीमा के लिए दावा करने वाला व्यक्ति भी स्वतंत्र सर्वेक्षक नियुक्त कर सकता है।'

सर्वेक्षक स्वतंत्र प्रोफेशनल होते हैं जिन्हें बीमा कंपनियां किसी नुकसान या दुर्घटना का मूल्यांकन करने के लिए रखती है। जब वाहन दुर्घटना, आग, चोरी या किसी और दुर्घटना के लिए कोई दावा किया जाता है तो वे अपना विचार रखते हैं।

जब कोई पॉलिसी धारक बीमा कंपनी के सामने दावा करता है तो एक सर्वेक्षक को नुकसान का मूल्यांकन करने के लिए नियुक्त किया जाता है। बीमा कंपनी दावे का निपटान सर्वेक्षक के द्वारा जमा किए गए रिपोर्ट के आधार पर करती है। अगर बीमा कंपनियां सर्वेक्षक के दिए गए रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हैं तो वे इसे नजरअंदाज करती हैं।

उद्योग के एक विशेषज्ञ का कहना है, 'सर्वेक्षक स्वतंत्र माने जाते हैं लेकिन कई बार बीमा कंपनियां उन पर अपना नियंत्रण रखती हैं।' जब स्वतंत्र सर्वेक्षकों की नियुक्ति की जाती है तो कंपनियों के पास यह विकल्प होता है कि वे सर्वेक्षकों को तब तक दुबारा नियुक्त करती रहती हैं जब तक वे अपना मनचाहा रिपोर्ट नहीं पा लेती।

दावेदार के पास सर्वेक्षक रखने का विकल्प भी होता है। बीमाकर्ता यह चाहते हैं कि उनके विश्वस्त लोग ही कोई फैसला करें। मुंबई के एक सर्वेक्षक का कहना है, 'नियामक ने बीमा कंपनी और दावेदार दोनों को सर्वेक्षक रखने का प्रावधान किया है लेकिन ज्यादातर कंपनियां दावेदार द्वारा नियुक्त किए गए सर्वेक्षक के मूल्यांकन को स्वीकार नहीं करती हैं।'

आंशिक नुकसान के मसले में ज्यादातर कंपनियां दावा किए गए रकम का 40-50 फीसदी की मंजूरी देती हैं जबकि पूरे नुकसान के दावे का निपटान दावा किए गए रकम के 75 फीसदी तक ही हो पाता है। सर्वेक्षक का कहना है, 'जो रिपोर्ट इससे ज्यादा बीमा की बात कहती हैं उनको तवाो नहीं मिलती है।'

दूसरी ओर उद्योग का कहना है कि ज्यादा सर्वेक्षक होने से चीजें बेहद जटिल हो जाती हैं। फ्यूचर जेनराली इंडिया इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी के जी कृष्णामूर्ति का कहना है, 'दावे के निपटान की प्रक्रिया थोड़ी जटिल होगी अगर कंपनी और ग्राहक एक-एक सर्वेक्षक नियुक्त करते हैं। दावेदार को कंपनी को यह सूचना देनी चाहिए कि वह सर्वेक्षक से संतुष्ट नहीं है तो कंपनी दूसरे सर्वेक्षक को नियुक्ति कर सकती है।'

अलग-अलग सर्वेक्षकों के मूल्यांकन के बाद भी अगर दावेदार संतुष्ट नहीं है तो उसे बीमा कंपनी के शिकायत निपटान विभाग से संपर्क करना चाहिए। अगर कंपनी यह कहती है कि ग्राहक का दावा पॉलिसी के नियमों के अनुरूप नहीं है तो दावेदार कंज्यूमर कोर्ट में संपर्क कर सकते हैं। लेकिन उसके बाद भी अगर दावे का निपटान नहीं होता है तो मध्यस्थों से संपर्क किया जा सकता है।

Keyword: car accident, surveyor, inspection, insurance, policyholder,
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