बिजनेस स?टैंडर?ड - जानिए भारत में उपभोग का अतीत
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जानिए भारत में उपभोग का अतीत
पुस्तक समीक्षा
अरविंद सिंघल /  April 06, 2010

भारत में बढ़ते उपभोग का स्तर न केवल इस देश में लोगों का ध्यान खींच रहा है बल्कि इस वजह से दुनिया भर की निगाहें भारत पर लगी हैं।

पिछले दस साल में देश में उपभोग के स्तर में बेहद तेजी आई है। यह रफ्तार इतनी तेज हुई कि इसने दुनिया को हैरत में डाल दिया। भारतीय ग्राहकों और रिटेल कारोबार ने दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया है।

भारत में इस कारोबार के विस्तार का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि देश में इस साल तक प्राइवेट रिटेल उपभोग का स्तर 475 अरब डॉलर (तकरीबन 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक) के आंकड़े को पार कर जाएगा। अगले पांच साल में इसके दोगुना होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

इस बाजार के आकार को देखते हुए टाटा, बिड़ला, अंबानी और मित्तल जैसे देसी कारोबारी और वॉल-मार्ट, टेस्को, कार्फू और मेट्रो जैसी वैश्विक दिग्गज रिटेल कंपनियां भारत में इस कारोबार में जमने पर ध्यान लगा रही हैं।

इस परिदृश्य के आलोक में यह देखना जरूरी हो जाता है कि भारत में उपभोग के स्तर का इतिहास कैसा रहा है। खासतौर से अंग्रेजी राज के दिनों में भारत में क्या उपभोग किया जाता था और कैसे किया जाता था।

इस विषय पर तो कई किताबें मिल जाएंगी कि 20वीं सदी में भारत में राजपरिवार किस तरह से उपभोग करते थे लेकिन इनमें से कुछ ही किताबें ऐसी हैं जिनके लिए उच्च स्तरीय शोध किया गया है। ऐसी किताबें भी गिनी चुनी हैं जिनमें पिछली कुछ सदियों में भारत में उपभोग विषय पर बेहतरीन जानकारियां दी गई हैं।

'टूवड्र्स ए हिस्ट्री ऑफ कंजंप्शन इन साउथ एशिया' इस पैमाने पर  खरी उतरती है। करीब दस उद्भट विद्वानों ने इस किताब के लिए निबंध लिखे हैं। हर एक निबंध अपने आप में उत्कृष्टता की मिसाल है। विषयों में भी काफी विविधता है और वे दिलचस्प भी उतने ही हैं।

मसलन आप इस किताब में पढ़ सकते हैं कि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरुआती दिनों में ब्रिटेन से कैसी वस्तुएं आयात की जाती थीं। बीसवीं सदी में भारत में कुटीर उद्योगों का विकास। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दौर में मुंबई में मध्यम वर्ग की हालत। साथ ही 1920 के दशक में (बॉम्बे में) सिनेमा और संस्कृति के बारे में पढ़ सकते हैं।

इसके अलावा बीसवीं सदी में भारतीय महिला खरीदारों की मनोवृत्ति और शुरुआती दौर के विज्ञापनों का भी अध्ययन कर सकते हैं। प्रत्येक निबंध आपको उस कालखंड में ले जाता है और उससे जुड़ी कुछ दिलचस्प जानकारियां देता है। जैसे कि भारत में आयातित सामान का प्रभाव और 19वीं सदी के कुलीन वर्ग से जुड़े कुछ पहलू। 21वीं सदी की शुरुआत में चीजें बहुत ज्यादा बदली हुई नहीं हैं।

एक के बाद एक दिग्गज ब्रांड भारत में दस्तक दे रहे हैं। लेकिन उन्हें यह बात भी अच्छी तरह मालूम है कि भारतीय उनके हैंडबैग तो खरीदेंगे लेकिन जेवर नहीं। इसी तरह की बात आईवियर और रिस्ट वियर के बारे में भी कही जा सकती है कि उन्हें भारतीय हाथों हाथ ले सकते हैं लेकिन कपड़ों के बारे में कुछ अपवादों को छोड़कर जेवरों वाली बात ही लागू होती है।

किताब में एक अध्याय बीसवीं सदी की शुरुआत में कुटीर उद्योग के विकास पर भी दिया गया है। इसमें बताया गया है कि कैसे रूई की धुनाई मशीनों, तेल निकालने की मशीनों ने क्रांतिकारी बदलाव लाने का काम किया। लगातार बढ़ती घरेलू मांग ने भी इसमें मददगार भूमिका अदा की।

21वीं सदी में इतिहास अपने आप को दोहराता दिख रहा है जब भारत में जबरदस्त घरेलू मांग विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के लिए नए रास्ते खोल रही है। इससे निवेश में भी तेजी आ रही है। किताब में एक दिलचस्प अध्याय भारत में मध्यमवर्ग के अभ्युदय का भी हाल बयां करता है। इसके जरिये आप जान पाते हैं कि कैसे देश में वेतनभोगी तबके ने हालात बदल दिए।

एक अन्य अध्याय में मुंबई के 1920 के फिल्मी माहौल और संस्कृति का जिक्र है। इसमें से उध्दृत एक अंश यहां दे रहे हैं, 'जमीनी स्तर पर सार्वजनिक जीवन की अगुआई युवा कर रहे थे। इनमें से कई लेखक, कलाकार, कारोबारी और राजनीतिक शिल्पी थे।

उद्योगपतियों में जे आर डी टाटा, घनश्याम दास बिड़ला और जमनालाल बजाज प्रमुख थे जबकि राजनीतिक हस्तियों में मोहम्मद अली जिन्ना, सरोजिनी नायडू और सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाम सामने आ रहा था। जब कांग्रेस ने 1920 के दशक में राष्ट्रवादी आंदोलन का सूत्रपात किया तो इसे विद्यार्थियों, उद्योगपतियों, पेशेवर लोगों और महिलाओं का भरपूर साथ मिला।'

क्या हम इस दशक में वही सब घटित होता देख रहे हैं? इसमें 20वीं सदी में उपभोग करने वाले प्रमुख परिवारों और महिला खरीदारों से भी रूबरू कराया गया है। 2020 के दशक में भी भारतीय परिवारों और महिलाओं के रुख में जबरदस्त बदलाव देखने को मिल रहा है। इस लिहाज से यह पढ़ने में बेहद दिलचस्प लगेगा कि आखिर एक सौ साल पहले किस तरह का माहौल या रुझान था।

किताब की विषयवस्तु बेहद समृद्ध है और इसकी शैली भी उतनी ही खूबसूरत है। इसमें मौजूद रेखाचित्र भी काफी लुभावने हैं। जो पाठक इस विषय की तह तक जाना चाहते हैं या जिनकी इसमें कुछ  ज्यादा दिलचस्पी है, उनके लिए भी लेखकों ने खास इंतजाम किया है। प्रत्येक निबंध के बाद उससे जुड़ी कुछ अन्य जानकारियां दी गई हैं और संदर्भ पुस्तकों और अन्य ग्रंथों की सूची भी दी गई है। यह जानकारी इस तरह के पाठकों के लिए बेहद अमूल्य साबित होगी।

जैसे कि हर चीज में बेहतरी की कुछ न कुछ गुंजाइश जरूर होती है यह किताब भी इस पैमाने से इतर नहीं है। अगर इसमें 18वीं, 19वीं और स्वतंत्रता पूर्व 20वीं सदी में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार और दक्षिण एशिया की आर्थिकी में इसके हिस्से की चर्चा, सरकारी और निजी खर्चे का ब्यौरा सहित कुछ अन्य चीजों को समेटा गया होता तो यह और भी बेहतर बन पाती।

उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में आने वाले इस पुस्तक के संस्करणों में इस पर भी ध्यान दिया जाएगा। वास्तव में किताब बेहद दिलचस्प है। खासतौर से उन लोगों के लिए तो है ही जिनकी भारत के उपभोक्ता कारोबार में रुचि है। लेकिन जो लोग पिछली दो सदियों का गैर राजनीतिक इतिहास जानने के ख्वाहिशमंद हैं, उनके लिए भी यह पठनीय है।

पुस्तक समीक्षा

टुवड्र्स ए हिस्ट्री ऑफ कंजंप्शन इन साउथ एशिया
लेखक  : डगलस ई हेंस
प्रकाशक : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस 
कीमत :   750 रुपये
पृष्ठ :   300

Keyword: book review, towards a history of consumption in south asia, douglas e hens, oxford university press,
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